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Ayodhya Ram Mandir: राम मंदिर के लिए दान या चंदा नहीं, भारत ने समर्पित की निधि

Fri, 29 Dec 2023 08:16 PM IST
अमर शर्मा रवि पाराशर
रवि पाराशर Published by: अमर शर्मा Updated Fri, 29 Dec 2023 08:16 PM IST
सार

अयोध्या में भव्य राम मंदिर राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जागृत करने वाला है। प्रश्न उठा कि इसके लिए हर आस्थावान भारतीय को यथायोग्य सहयोग करना है, तो क्या सनातन समाज सबके द्वार पर याचक की भूमिका में जाए? भारतीय चेतना की सर्वश्रेष्ठ संज्ञा राम का मंदिर बनाने के लिए तो सहयोग स्वत: स्फूर्तभाव से दिया जाना चाहिए। भगवान दाता हैं, तो दाता को भला दान कौन दे सकता है? भगवान विष्णु के अवतार नर श्रेष्ठ पुरुषोत्तम राम की प्रतिष्ठा की स्थापना के लिए दान नहीं, सहयोग करना होगा, निधि समर्पित करनी होगी। यही भावना हर सनातनी भारतीय की रही।

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala India dedicated Samarpan Nidhi not donations for Ram temple
रवि पाराशर का आलेख - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

उल्लेखनीय है कि अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर में सरकारी धन का प्रयोग नहीं हुआ। साथ ही सिर्फ धन्ना सेठों और साहूकारों का पैसा भी राम मंदिर निर्माण में नहीं लगा। श्री रामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने निर्णय किया कि मंदिर का निर्माण भगवान राम में आस्था रखने वाले देश भर के सभी लोगों के सहयोग से ही किया जाएगा। मंदिर के लिए जुटाई जा रही धनराशि को ‘समर्पण निधि’ का नाम दिया गया। भारत में दान की श्रेष्ठ परंपरा सदियों से चली आ रही है। राजनैतिक चेतना के उदय के साथ ही चंदा जैसा शब्द भी अब प्रचलित है। लेकिन राम मंदिर के लिए जुटाई गई राशि के लिए दान या चंदा जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते हुए ‘समर्पण निधि’ शब्द युग्म का प्रयोग किया गया।
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दान भारत की श्रेष्ठ परंपराओं में से एक है। भारतीय संस्कृति में दान और त्याग का विशेष महत्व है। लेकिन दान क्रिया याचक को खाली हाथ नहीं जाने देने से जुड़ी है। प्राचीन काल में भिक्षाटन की परंपरा थी। गृहस्थों का कर्तव्य था कि द्वार पर भिक्षा के लिए आए किसी विप्र या किसी भी व्यक्ति का यथोचित सम्मान करें और खाने-पीने का सामान दान दें। पौराणिक साहित्य में बहुत से महादानी नायकों का उल्लेख मिलता है। राजा बलि, हरिश्चंद्र और कर्ण ऐसे कुछ नाम हैं, जिन्होंने दान की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वाह करते हुए जो मांगा गया, बिना हिचके दान में दे दिया था।
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कुल मिलाकर दान शब्द याचना का भी बोध कराता है। यही कारण है कि दान की परंपरा में प्रत्यक्ष दान की अपेक्षा गुप्त दान को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। दान देने वाला सक्षम और संपन्न माना जाता है, जबकि दान लेने वाला अक्षम और विपन्न। प्रत्यक्ष दान में कहीं न कहीं अहं भी छुपा होता है। भले ही वह नकारात्मक नहीं हो, लेकिन दाता के मन में आत्मतुष्टि का भाव तो जगाता ही है। असल में दान निरपेक्ष भाव से दिया ही नहीं जा सकता। हां, अगर किसी को बिना बताए, बिना प्रचार किए अगर किसी नेक काम के लिए गुप्त दान दिया जाता है, तो भले ही इसमें आत्मतुष्टि का भाव जागृत होता हो, लेकिन आत्म-प्रचार का भाव नहीं होने से वह कृत्य संतुलित रूप से उदासीन (न्यूट्रल) हो जाता है। इसी कारण निस्पृह भाव से दिया गया गुप्त दान श्रेष्ठ दान होता है।
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यज्ञ की क्रिया में अग्नि को हव्य दान किया जाता है। यज्ञ किसी न किसी कामना से ही किए जाते हैं। अगर कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक कारण न भी हो, तो समाज के भले की कामना में भी अंतिम रूप से याचना का ही भाव आता है। यहां दान देने वाला यजमान ही कल्याण की कामना के याचक की भूमिका में आ जाता है। प्रश्न उठा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जागृत करने वाला है। इसके लिए हर आस्थावान भारतीय को यथायोग्य सहयोग करना है, तो क्या सनातन समाज सबके द्वार पर याचक की भूमिका में जाए? भारतीय चेतना की सर्वश्रेष्ठ संज्ञा राम का मंदिर बनाने के लिए तो सहयोग स्वत:स्फूर्त भाव से दिया जाना चाहिए। भगवान दाता हैं, तो दाता को भला दान कौन दे सकता है? भगवान विष्णु के अवतार नर श्रेष्ठ पुरुषोत्तम राम की प्रतिष्ठा की स्थापना के लिए दान नहीं, सहयोग करना होगा, निधि समर्पित करनी होगी। यही भावना सभी सनातनी भारत वासियों की रही।

जहां तक चंदा जैसे शब्द का सवाल है, तो राजनैतिक पार्टियों ने इस शब्द को बहुत बदनाम कर दिया है। इसलिए अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए दान या चंदा देने जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया। इसके लिए सहयोग समर्पण निधि से किया गया, ताकि राम मंदिर राष्ट्र निर्माण और सामाजिक समरसता की भावना को और प्रगाढ़ बनाने का सर्वाधिक शक्तिशाली प्रतीक बन सके। हर अमीर-गरीब आस्थावान भारतीय को राम मंदिर समान रूप से अपना लगे, यह भाव जागृत होना बहुत आवश्यक था।

अयोध्या में भव्य राम मंदिर बना है। बहुत से लोग प्रश्न उठाते हैं कि मंदिर निर्माण पर अकूत धन खर्च करने की क्या आवश्यकता थी? राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले भी इस तरह का विमर्श खड़ा करने का प्रयास बड़े पैमाने पर किया गया कि विवादित स्थल पर अस्पताल बनवा दिया जाए या फिर कुछ ऐसा, जिससे सभी धर्मों के लोग लाभ ले सकें। वही लोग अब भी खुसफुसा रहे हैं कि मंदिर पर व्यय से अच्छा तो यह हो सकता था कि गांवों की हालत सुधारने पर खर्च किया जाए, अस्पताल बनवाए जाएं, स्कूल-कॉलेज खोले जाएं। सही है कि सरकारों और समाज को ये सारी व्यवस्थाएं बनाने पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन यह भी सही है कि समाज की शिक्षा, उपचार और दूसरी सुख-सुविधाओं पर पर्याप्त ध्यान दिया भी जा रहा है।

देश में हर स्तर पर टिकाऊ बुनियादी ढांचे की जरूरत अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन इस ओर ध्यान दिए जाने के साथ ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर की भी उतनी ही आवश्यकता थी। भौतिक विकास के साथ ही आध्यात्मिक विकास भी उतना ही आवश्यक है। भारतीय ज्ञान परंपरा ने विश्व भर को आकर्षित और चमत्कृत किया है। भारत अपने भौतिक विकास के लिए अगर सोने की चिड़िया कहा जाता था, तो अपने ज्ञान के कारण ही भारत को विश्व गुरु माना गया। परतंत्रता के लंबे कालखंड में किए गए षड्यंत्रों के कारण धीरे-धीरे भारतीय ज्ञान परंपरा पर धूल की मोटी परतें चढ़ गईं। अब अगर हमें दोबारा विश्व गुरु बनना है, तो धूल की इन पर्तों को हटाने की आवश्यकता है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर इसका प्रारंभ साबित होगा।

देश को चलाने के लिए संविधान बनाया जाता है। मनुष्य तो सभी देशों में एक जैसे ही हैं, लेकिन भौगोलिक स्थितियां, वातावरण, इतिहास, परंपराएं, संस्कृति के अनुसार ही विधान तैयार किए जाते हैं। यही कारण है कि सभी देशों के अपने-अपने संविधान हैं। कहीं बांए चलने का नियम है, तो कहीं दाएं चलने का। कहने का अर्थ यह है कि किसी भी धर्म में आस्था रखने वालों को विशिष्ट स्थान की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि सनातन समाज के अस्तित्व की रक्षा के लिए मंदिर बहुत जरूरी हैं।

आस्था जताने और प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए मूर्ति पूजा यानी साकार की अर्चना की परंपरा विश्व की कई सभ्यताओं में प्रचलित रही है। पद्मश्री प्रभाशंकर ओ सोमपुरा की पुस्तक प्रतिमा कलानिधि के अनुसार ध्यानस्थ एकाग्रता की सफलता के लिए मूर्ति को उपयोगी उक्ति माना गया है। विश्व के अन्य भागों, जैसे यूरोप, मध्य पूर्व, अरब, मिस्र, बेबीलोन, ईरान, इराक आदि में मूर्ति पूजा की जाती थी। पर मुहम्मद के आविर्भाव और इस्लाम के जन्म के बाद इन प्रतिमाओं पर प्रतिबंध लग गया।

प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का वर्णन करने वाली पुस्तक प्रासाद मंजरी के अनुसार मूर्ति पूजा का प्रारंभ निराकार लिंग की पूजा के साथ हुआ। आर्यावर्त में इसे शिव और शक्ति की पूजा कहा गया। बाद में साकार मूर्तियों की कल्पना की गई और ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। प्रासाद मंजरी में कहा गया है कि प्रतिमा या मूर्ति की स्थापना को मान्यता मिलने के बाद देवालयों या मंदिरों की आवश्यकता पड़ी।

विभिन्न राजाओं ने विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग शैलियों में देवी-देवताओं के भव्य मंदिरों का निर्माण देश भर में कराया। लेकिन लोकतंत्र में तो लोक ही सर्वोच्च है, तंत्र की डोर लोक के हाथ में ही है, प्रजा ही राजा है, इसलिए अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए समर्पण निधि के माध्यम से जन-सहयोग लिया गया।


- रवि पाराशर 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्क्रिप्ट राइटर और साहित्यकार हैं। प्रिंट और टीवी न्यूज चैनलों में विभिन्न पदों पर रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।)
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