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Ayodhya Ram Mandir: राम के विचारों के अनुसार रामराज्य की नींव भरत ने रखी थी

Tue, 09 Jan 2024 11:12 PM IST
अमर शर्मा सर्जना शर्मा
सर्जना शर्मा Published by: अमर शर्मा Updated Tue, 09 Jan 2024 11:12 PM IST
सार

राम भरत से पूछते हैं- “कोई भी गुप्त मंत्रणा दो से चार कानों तक ही गुप्त रहती है। अत: मैं पूछता हूं कि तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत सारे लोगों के साथ बैठकर मंत्रणा तो नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी मंत्रणा शत्रु तक फैल जाती हो? तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जाने पर अथवा पूर्णता के समीप पहुंचने पर ही दूसरे राजाओं को ज्ञात होते हैं न? तुम्हारे कार्यक्रम वे पहले ही तो नहीं जान लेते? तुमको और तुम्हारे अमात्यों को दूसरों के गुप्त विचारों का पता लगता रहता है न?” 

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Foundation of Ramrajya was laid by Bharat According to Lord Ram's idea
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- सर्जना शर्मा
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गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि ने राम-कथा का वर्णन किया है। हालांकि और ग्रंथ भी रचे गए हैं, लेकिन रामचरित मानस और रामायण के राम को ही अधिकतर लोग जानते हैं। तुलसी ने रामराज्य की कल्पना रामचरित मानस में साकार की, तो वाल्मिकि ने रामराज्य के तत्वों का वर्णन राम से ही कराया। ननिहाल से लौटकर भरत को सारा हाल पता चला, तो उन्होंने वन जाकर राम को मनाने का निर्णय लिया। राम ने भरत को समझाया कि माता-पिता की आज्ञा का पालन रघुकुल की रीति है। भरत से भेंट के समय राम ने उन्हें राजपाट से जुड़ी नीतियों के बारे में बताया। वाल्मीकि रामायण में इसका विस्तार से वर्णन है।

राम सुशासन के बारे में बताते हैं, लेकिन वे उपदेश या आज्ञा देते हुए प्रतीत नहीं होते। उन्होंने भरत से पूछा- “क्या तुम धर्म में तत्पर रहने वाले विद्वान, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकु कुल के आचार्य महातेजस्वी वशिष्ठ जी की पूजा करते हो? उत्तम कुल में उत्पन्न, विनय संपन्न, बहुश्रुत, किसी के दोष न देखने वाले तथा शास्त्रोक्त धर्मों पर निरंतर दृष्टि रखने वाले पुरोहितों का तुमने पूरी तरह सत्कार किया है? क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सम्मान करते हो?”
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उन्होंने भरत को अपने प्रश्न के माध्यम से ही समझाया कि मंत्रिमंडल कैसा होना चाहिए। उन्होंने पूछा- “भरत!  क्या तुमने अपने समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेंद्रिय, कुलीन तथा मन की बात समझने वाले सुयोग्य व्यक्तियों को मंत्री बनाया है? अच्छी मंत्रणा ही राजाओं की विजय का मूल कारण है। वह भी तब सफल होती है, जब नीति शास्त्र निपुण मंत्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें। यदि एक मंत्री भी मेधावी, शूरवीर, चतुर और नीतिज्ञ हो, तो वह राजा या राजकुमार को बड़ी संपत्ति दिला सकता है। यदि राजा दस हज़ार मूर्खों को भी अपने पास रख ले, तो भी उनसे अवसर पड़ने पर कोई सहायता नहीं मिल सकती। राजा, अमात्य शिरोमणि और मंत्रियों के बीच मंत्रणा गुप्त रहनी चाहिए और बड़ा कार्य पूरा होने पर ही अन्य राजाओं को पता चलना चाहिए।”
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राम भरत से पूछते हैं- “कोई भी गुप्त मंत्रणा दो से चार कानों तक ही गुप्त रहती है। अत: मैं पूछता हूं कि तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत सारे लोगों के साथ बैठकर मंत्रणा तो नहीं करते?  कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी मंत्रणा शत्रु तक फैल जाती हो?  तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जाने पर अथवा पूर्णता के समीप पहुंचने पर ही दूसरे राजाओं को ज्ञात होते हैं न? तुम्हारे कार्यक्रम वे पहले ही तो नहीं जान लेते? तुमको और तुम्हारे अमात्यों को दूसरों के गुप्त विचारों का पता लगता रहता है न?”  

राम भरत से पूछते हैं- “क्या तुमने संतुष्ट रहने वाले, शूरवीर, धैर्यवान, बुद्धिमान, पवित्र, कुलीन एवं स्वयं में अनुराग रखने वाले रण कर्म दक्ष पुरुष को ही सेनापति बनाया है? तुम्हारे प्रधान योद्धा बलवान, युद्धकुशल और पराक्रमी तो हैं न?  क्या तुम उनका सम्मान करते हो? सैनिकों को समुचित वेतन-भत्ता तुम समय पर देते हो न? यदि समय पर वेतन-भत्ता न दिया जाए, तो सैनिक अति-कुपित होते हैं और इससे भारी अनर्थ हो जाता है।” 

वे कहते हैं- “तुमने जिसे राजदूत नियुक्त किया है, वह अपने ही देश का निवासी, विद्वान, कुशल और प्रतिभाशाली है न? जैसा कहा जाए, वैसी ही बात दूसरों के सामने कहने वाला और सद्विवेक युक्त है न?” उन्होंने भरत से कहा कि न केवल शत्रु पक्ष पर, बल्कि अपने राज्य के सेनापति, द्वारपाल, अंत:पुराध्यक्ष, कारागार अध्यक्ष, धनाध्यक्ष, राजा की आशा से सेवकों को काम बताने वाले वादी, प्रतिवादी से मामले की पूछताछ करने वाला अधिवक्ता, न्यायाधीश, सेनानायक, कर्मचारियों का काम पूरा होने पर वेतन देने के लिए राजा से धन लेने वाला, नगरअध्यक्ष, राष्ट्र सीमापाल तथा वनरक्षक, दुष्टों को दंड देने का अधिकारी तथा जल, पर्वत, वन एवं दुर्गम भूमि की रक्षा करने वाले, इन सब पर राजा की दृष्टि रहनी चाहिए। इसी तरह शत्रुपक्ष के उपरोक्त सब पर गुप्तचरी की जानी चाहिए। उनके मंत्री, पुरोहित और युवराज भी गुप्तचरों की दृष्टि में रहने चाहिए।

राम बताते हैं कि राजा को कृषकों और व्यापारियों का ध्यान रखना चाहिए। वे भरत से पूछते हैं- “तात ! कृषि और गोरक्षा से आजीविका चलाने वाले सभी वैश्य तुम्हारी प्रीति के पात्र हैं न? राजाओं को अपने राज्य में रहने वाले सब लोगों का धर्मानुसार पालन करना चाहिए।” राम भरत से पूछते हैं- “तुमने प्रधान व्यक्तियों को प्रधान, मध्यम श्रेणी को मध्यम, छोटी श्रेणी के लोगों को छोटी श्रेणी के ही कामों में नियुक्त किया है न? जो घूस न लेते हों, निश्छल हों, बाप-दादा के समय से काम करते आ रहे हों, बाहर-भीतर से पवित्र और श्रेष्ठ हों, तुम ऐसे अमात्यों को ही उत्तम कार्यों में नियुक्त करते हो न? कठोर दंड से उद्विग्न हो कर प्रजा तुम्हारे मंत्रियों का तिरस्कार तो नहीं करती? कठोरतापूर्वक अधिक कर लेने पर प्रजा तुम्हारा अनादर तो नहीं करती? क्या मंत्री और समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिए एकचित्त होकर अपने प्राणों का त्याग करने को उद्धत रहते हैं? संपूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण, पुरवासी, जनपदवासी मनुष्यों के साथ मिल कर तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं न?”   

राम भरत से पूछते हैं- “ कभी ऐसा तो नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी श्रेष्ठ, निर्दोष और शुद्धात्मा पर भी दोष लगा दे तथा शास्त्र ज्ञान में कुशल विद्वानों द्वारा उसके विषय में विचार किए बिना ही लोभवश उसे आर्थिक दंड दिया जाता हो? जो चोरी करते हुए पकड़ा गया हो, जिसे किसी ने चोरी करते देखा हो, पूछताछ से जिसके चोर होने का प्रमाण मिल गया हो, चोरी का माल बरामद हो गया हो, ऐसे चोर को तुम्हारे राज्य में धन के लालच में छोड़ तो नहीं दिया जाता? धनी और निर्धन में कोई विवाद छिड़ गया हो और न्याय के लिए राज्य के न्यायालय में आया हो, तो तुम्हारे मंत्री धन आदि के लोभ को छोड़ कर उस मामले पर विचार करते हैं न?” वे निरपराधों को दंड दिए जाने का भी विरोध करते हैं।    

राम कहते हैं- “क्या तुम प्रतिदिन वस्त्राभूषणों से विभिषूति होकर प्रधान सड़क पर जाकर नगरवासियों को दर्शन देते हो? क्या तुम्हारे सभी दुर्ग धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यंत्र, शिल्पी तथा धनुर्धर सैनिकों से भरे पूरे रहते हैं?  क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? क्या तुम वृद्ध पुरुषों, बालकों, प्रधान वैद्यों का आंतरिक अनुराग, मधुर वचन और धन-दान से सम्मान करते हो? गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणों को नमस्कार करते हो?  तुम अर्थ के द्वारा धर्म को अथवा धर्म के द्वारा अर्थ को हानि तो नहीं पहुंचाते?  क्या तुम धर्म, अर्थ, काम का योग्य समय में सेवन करते हो?”  


राम भरत को राजाओं की असफलताओं के कारण भी बताते हैं- “नास्तिकता, असत्य भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषों का संग न करना, आलस्य, पांचों इंद्रियों के वशीभूत होना, राजकार्यों के विषय में अकेले ही विचार करना, प्रयोजन न समझने वाले विपरीतदर्शी मूर्खों से सलाह लेना, निश्चित किए हुए कार्यों को शीघ्र न करना, गुप्त मंत्रणा को सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, मांगलिक कार्यों का अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओं पर एक साथ ही चढ़ाई कर देना, ये राजा के 14 दोष हैं।” राम के सिद्धांतों के आधार पर रामराज्य की नींव भरत ने ही रखी थी।
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