फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Ram Mandir ›   Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Dakshin Kosal Chhattisgarh is land of Ram Leela

Ayodhya Ram Mandir: राम की लीला भूमि रहा है दक्षिण कोसल यानी छत्तीसगढ़

Mon, 15 Jan 2024 11:12 AM IST
अमर शर्मा रेखा पांडेय
रेखा पांडेय Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 15 Jan 2024 11:12 AM IST
सार

दक्षिण कोसल की सिहावा की पहाड़ियों में मुचकुंद, अगस्त्य, अंगिरा, श्रृंगी, कंक, शरभंग, गौतम, इन सप्त ऋषियों के आश्रम थे। इनके विषय में विभिन्न स्रोतों एवं जनमान्यताओं में जानकारी मिलती है। ॠषि मुनियों के आश्रम एवं ॠषि संस्कृति विषय बहुत ही विस्तृत है। इस आलेख में रामायणकालीन ऋषियों के अतिरिक्त पूर्व और परवर्ती ऋषि-मुनि भी सम्मिलित हैं। मान्यता है कि महरमंडा ऋषि का आश्रम सरगुजा जिले के अंबिकापुर से बनारस मार्ग पर महान नदी के तट पर था। जमदग्नि ऋषि का आश्रम सरगुजा संभाग के देवगढ़ नामक स्थान एवं अंबिकापुर से 45 किलोमीटर दूर उदयपुर ब्लॉक में रेंड नदी के तट पर था।

विज्ञापन
Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Dakshin Kosal Chhattisgarh is land of Ram Leela
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- रेखा पांडेय
विज्ञापन

भारत की पावन भूमि सदैव ही ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है। विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में भारत की ऋषि संस्कृति भी सम्मिलित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने युग दृष्ट्रा होने के कारण अपने तप, बल और ज्ञान से आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर सनातन काल से समस्त चराचर जगत का मार्गदर्शन किया है।

ब्रह्मा के मानस पुत्रों से प्रारंभ होने वाली पुराणोक्त सृष्टि में मरीचि, अंगिरा, पुल्ह, क्रतु, पुलस्त्य, वशिष्ठ सप्त ऋषि प्रमुख हैं। दक्षिण कोसल अर्थात वर्तमान छत्तीसगढ़ की सीमा सरगुजा से बस्तर तक फैली है। वहां की प्राकृतिक सुंदरता, वन आच्छादित क्षेत्र, विशाल नदियां सदैव ही आकर्षण का केंद्र रही हैं। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं साधना के लिए वहां अनेक आश्रम स्थापित किए। यह सुदीर्घ परंपरा महर्षि अंगिरा से लेकर संत गहिरा गुरु एवं महर्षि महेश योगी जी तक रही है। जो आज भी लोक में दिखाई देती है।
विज्ञापन


रामायण काल में दक्षिण कोसल (दंडकारण्य) ही ऐसा स्थान है, जहां श्री राम ने सीता एवं भ्राता लक्ष्मण के साथ वनवास का सर्वाधिक समय व्यतीत किया और ऋषि-मुनियों के आश्रम गए। उनका आशीर्वाद प्राप्त कर उन्हें अनुग्रहीत करते हुए उनका कल्याण भी किया। यह भूमि राम की लीला भूमि के साथ ऋषि संस्कृति का प्रमुख केंद्र भी रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दक्षिण कोसल की सिहावा की पहाड़ियों में मुचकुंद, अगस्त्य, अंगिरा, श्रृंगी, कंक, शरभंग, गौतम, इन सप्त ऋषियों के आश्रम थे। इनके विषय में विभिन्न स्रोतों एवं जनमान्यताओं से जानकारी प्राप्त होती है। ॠषि मुनियों के आश्रम एवं ॠषि संस्कृति विषय बहुत ही विस्तृत है। इस आलेख में रामायणकालीन ऋषियों के अतिरिक्त पूर्व और परवर्ती ऋषि-मुनि भी सम्मिलित हैं।
मान्यता है कि महरमंडा ऋषि का आश्रम सरगुजा जिले के अंबिकापुर से बनारस मार्ग पर महान नदी के तट पर था। जमदग्नि ऋषि का आश्रम सरगुजा संभाग के देवगढ़ नामक स्थान एवं अंबिकापुर से 45 किलोमीटर दूर उदयपुर ब्लॉक में रेंड नदी के तट पर था। वे भृगुवंशीय ऋचीक के पुत्र थे। उनकी पत्नी रेणुका थीं, जो नदी के रूप में प्रवाहित हो रही हैं। वे भगवान परशुराम जी के पिता थे।

श्रीराम दंडकवन में प्रवेश के साथ सोनहत की पहाड़ियों से निकली हसदो नदी के तट से अमृत धारा पहुंचे। वहां विश्रवा ऋषि के आश्रम की मान्यता है। वाल्मीकि रामायण में विश्रवा मुनि का उल्लेख मिलता है। मतंग भी रामायण कालीन ऋषि थे। बिलासपुर के शिवरीनारायण में जोंक, शिवनाथ, महानदी के संगम पर उनका आश्रम माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार कोरबा जिले के मतरेंगा में भी एवं सरगुजा जिले के मैनपाट में रेणुका नदी के उद्गम मतिरंगा में उनके आश्रम की मान्यता है।

वे शबरी के गुरु थे। इसका उल्लेख रामायण एवं रामचरित मानस में है। परम तपस्वी शरभंग ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद में शरभ नाम से मिलता है। छतीसगढ़ के सरगुजा जिले के रामगढ़ रामगिरि में उनके आश्रम की मान्यता है। साथ ही मैनपाट के मछली प्वॉइंट के समीप शरभंजा ग्राम उनके नाम की प्रतिध्वनि देता है। तुलसीदास ने लिखा है-

पुनि आए जंह मुनि सरभंगा
सुंदर अनुज जानकी संगा।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा,
राम कृपा बैकुंठ सिधारा।

शरभंग ऋषि राम के दर्शन के पश्चात उनके सम्मुख ही योगाग्नि से स्वयं को भष्म कर बैकुंठ चले गए।

वाल्मीकि रामायण में लिखा है-
ततोSग्निं स समाधाय हुत्वां चाज्येन मंत्रवत।
शरभंगो महातेजा: प्रविवेश हुताशनम।।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से 39 किलोमीटर दूर बैतलपुर के समीप शिवनाथ की धाराओं के बीच मंदकू द्वीप में मंडूक ऋषि के आश्रम की जनमान्यता है। उन्होंने मुंडकोपनिषद की रचना की थी। कसडोल जनपद के बालुकिनी पहाड के समीप तुरतुरिया ग्राम में वाल्मीकि आश्रम था। वहां बालमदेई नदी प्रवाहित होती है। मान्यता है कि सीता ने वहीं लव-कुश को जन्म दिया था। रामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण में इनका उल्लेख मिलता है। जे, डी, बेगलर और कनिंघम ने तुरतुरिया में वाल्मीकि आश्रम की जनमान्यता का उल्लेख अपने लेख में किया है।

अत्रि मंत्रदृष्टा ऋषि थे। ऋग्वेद के पांचवें मंडल आत्रेय मंडल के ऋषि हैं। उसमें 87 सूक्त हैं। पंचकोशीय यात्रा का महत्वपूर्ण स्थान कोपरा के समीप पांडुका के अतरमरा में उनके आश्रम की जनमान्यता है। उनके आश्रम से दंडकारण्य का क्षेत्र प्रारंभ होता है। किवदंती है कि कोरबा के समीप सीतामढ़ी में सुतीक्ष्ण ऋषि की तपोभूमि थी। साथ ही मैनपाट के केसरी वन में और मैनी नदी के तट पर काराबेल ग्राम के समीप मांड नदी के संगम पर उनके आश्रम की मान्यता है। प्रसिद्ध तीर्थस्थल राजिम की त्रिवेणी के संगम में कुलेश्वर महादेव के समीप महानदी के तट पर लोमश ऋषि का आश्रम था। उनके शरीर पर अत्यधिक बाल होने के कारण इनका नाम लोमश पड़ा। रामचरित मानस के उत्तर कांड में इनका वर्णन है।

सप्त ऋषियों में प्रमुख ऋषि थे श्रंगी ऋषि। मान्यता है कि सिहावा क्षेत्र में नगरी से आगे भीतर रास ग्राम में उनका आश्रम था। श्रृंगी पर्वत को महानदी का उद्गम स्थल माना जाता है। उनका विवाह राम की बहन शांता से हुआ था। राजा दशरथ का पुत्रयेष्ठि यज्ञ उन्होंने ही संपन्न कराया था। अंगिरा ऋषि ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और सप्त ऋषियों में सबसे वरिष्ठ थे। उन्होंने सर्वप्रथम अग्नि को उत्पन्न किया था। देवगुरु बृहस्पति उनके पुत्र थे। उन्होंने वेदों की ऋचाओं के साथ अंगिरा स्मृति की रचना की। सिहावा क्षेत्र में श्रृंगी ऋषि के आश्रम से दक्षिण दिशा में रतवा ग्राम पंचायत के समीप पर्वत को अंगिरा की तपोभूमि कहा जाता है।

गंगरेल बांध के समीप नगरी स्थित देवखुंट नामक ग्राम में मंदिरों का समूह था। ये बांध क्षेत्र में आने के कारण डूब गया। मान्यता है यहां कंक ऋषि का आश्रम था और कांकेर नगर का नाम कंक ऋषि के आश्रम के कारण पड़ा। उनके नाम का पर्वत भी विद्यमान है। अगस्त्य मंत्र दृष्ट्रा वैदिक ऋषि थे। ऋषि संस्कृति के प्रचार के लिए देवताओं के अनुरोध पर उन्होंने काशी छोड़ कर दक्षिण की यात्रा की और वहीं बस गए। उनका आश्रम बस्तर के दक्षिण पूर्व में माना जाता है। उनकी पत्नी लोपा मुद्रा थीं। इनके सूक्त ऋग्वेद में मिलते हैं।

मुचकुंद ऋषि सप्त ऋषियों में प्रमुख ऋषि थे। सिहावा के नगरी मुख्यालय के पास मेचका ग्राम में मुचकुंद पहाड़ी पर उनका आश्रम था। वे इक्ष्वाकु वंशीय नरेश मांधाता के पुत्र थे। सिहावा क्षेत्र में सप्त ऋषियों में गौतम ऋषि का आश्रम एवं गौतम पर्वत है। उनकी पत्नी देवी अहिल्या थीं। मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने अपने गुरु के साथ राम उनके आश्रम गए थे।

जगदलपुर की केशकाल की घाटी के समीप टाटामारी सुरडोंगर अर्थात देवताओं की पहाड़ी को अखंड ऋषि की तपोभूमि माना जाता है। बस्तर के भानपुरी के समीप मांडकर्णी नदी के तट पर चपका ग्राम में मांडकर्णी ऋषि का आश्रम था। वहां नदी की धाराएं एक कुंड में प्रवाहित होती हैं, जो अप्सराओं का स्वरूप है। इस प्रकार ऋषि परंपरा में चलकर कबीर और संत शिरोमणि गुरु घासीदास भी ऋषियों की श्रेणी को प्राप्त हुए। 


दक्षिण कोसल की ऊर्जा का प्रभाव वहां की संस्कृति में आज तक बना हुआ है, जिसे छत्तीसगढ़ के निवासियों ने बड़ी सहजता, सरलता के साथ वसुधैव कुटुंबकम की भावना के साथ आत्मसात कर लिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed