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Ram Mandir: सुप्रीम फैसले से मिल गया जन्मस्थान, विवादों से मुक्त हो गई अयोध्या; जानिए संघर्ष की दास्तां...

Wed, 17 Jan 2024 08:12 AM IST
शाहरुख खान अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, अयोध्या
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, अयोध्या Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 17 Jan 2024 08:12 AM IST
सार

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या को रामलला का जन्मस्थान मानते हुए पूरी जमीन रामलला विराजमान को सौंपने का फैसला किया। इसमें केंद्र सरकार को रिसीवर बनाया गया और उसे तीन महीने में मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने को कहा गया था। मस्जिद के लिए इस स्थान से अलग पांच एकड़ भूमि देने को कहा गया। सरयू से जानिए अयोध्या की मुक्ति के संघर्ष की दास्तां।

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Ayodhya Ram Mandir Birthplace got back by supreme decision Ayodhya became free from disputes
Ram Mandir - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ईकोर्ट के रामलला को विराजमान रखने और विवादित भूमि का दो तिहाई हिस्सा मंदिर पक्ष के पैरोकारों को देने के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में 14 अपीलें हो गईं। वह भी तब जब 1961 में बाबरी की ओर से पहला और मूल मुकदमा दायर करने वाले हाशिम अंसारी ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील से इन्कार कर दिया था। 
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मेरे प्रभु राम का जन्मस्थान एक बार फिर अदालती दांव-पेच में उलझ गया। सर्वोच्च न्यायालय ने मई, 2011 में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। फिर वही पुराना हाल, कभी आंदोलन तो कभी वार्ता से समाधान की बात।
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लगभग छह साल बीतने के बाद मार्च, 2017 में सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने दोनों पक्षों को आपसी बातचीत से इस मसले को न्यायालय के बाहर सुलझाने की सलाह दी। प्रस्ताव किया कि दोनों पक्ष चाहें तो वे भी न्यायालय से बाहर मध्यस्थता कर सकते हैं।
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जस्टिस खेहर से पहले मस्जिद पक्ष के प्रमुख मुद्दई हाशिम ने 2012 में हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास के साथ मिलकर समझौते से समाधान खोजने की कोशिश की। वर्ष 2016 में अखाड़ा परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने हाशिम से बातचीत से समाधान का प्रस्ताव किया। पर, कोई प्रयास सफल नहीं हुआ। 
 

न्यायालय की व्यस्तता और दस्तावेजों के अनुवाद के सवाल से गुजरते हुए खेहर के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति दीपक मिश्र भी सेवानिवृत्त हो गए। जुलाई 2018 और अक्तूबर 2018 में तकनीकी कारणों से जल्दी सुनवाई की अपील खारिज कर दी गई। इसी सबमें उच्च न्यायालय से फैसला आए लगभग आठ साल बीत गए। 

 

मेरा मन उद्विग्न होने लगा...क्षोभ बढ़ रहा था और साधु-संतों में आक्रोश। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सत्ता बदल चुकी थी। केंद्र में 2014 में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बन चुकी थी। प्रदेश में भी 2017 में ही अयोध्या आंदोलन के सूत्रधारों और किरदारों में प्रमुख रही गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बन चुकी थी।

 

इस बीच, शिवसेना ने 24 नवंबर, 2018 को अयोध्या में सभा की। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मंदिर में देरी को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा। इसके अगले दिन संतों और विश्व हिंदू परिषद की अयोध्या में धर्मसभा हुई। इसमें अब बहुत इंतजार न कर पाने की चेतावनी गूंजी। पीएम मोदी ने इस मांग पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन एक जनवरी, 2019 को साक्षात्कार में कहा कि उन्हें लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया अंतिम चरण में है। उसके पूरी होने के बाद वह कोई कदम उठाएंगे। 
 

विवादों से मुक्त हो गई अयोध्या
सर्वोच्च न्यायालय ने 8 मार्च, 2019 को समाधान के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कलीफुल्ला की अध्यक्षता में आध्यात्मिक गुरु श्रीश्रीरविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पांचू का तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल बनाया। पर, यह भी कोई समाधान नहीं निकाल पाया। आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय की तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अगस्त से रोजाना सुनवाई कर 40 दिन में 16 अक्तूबर को इसे पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया। मैं उतावली होकर फैसले की प्रतीक्षा कर रही थी। 
 

आखिर वह घड़ी आ ही गई। तारीख थी 9, नवंबर 2019। सूरज अपनी चमक बिखेर रहा था। मेरी तरह तमाम लोग मेरे तट पर फैसले की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ ही देर बाद भीड़ ने जयकारा लगाया जय सियाराम। पता चला कि सभी पांच जजों ने एकमत से अयोध्या को रामलला का जन्मस्थान  मानते हुए पूरी भूमि रामलला विराजमान को सौंपने का फैसला किया है। केंद्र सरकार को रिसीवर बनाया गया और उसे तीन महीने में मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने को कहा गया।

मस्जिद के लिए इस स्थान से अलग 5 एकड़ भूमि देने को कहा गया। मैं आनंद से हिलोरें लेने लगी। सदियों बाद मेरे रामलला का जन्मस्थान विवादों से मुक्त हो गया। मेरी अयोध्या को संघर्ष से मुक्ति भी मिल गई। अब जब रामलला अपने जन्मस्थान पर प्रतिष्ठित होने जा रहे हैं, तो मैं भी अतीत के काले अध्यायों को यहीं छोड़ रामराज्य के सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों का केंद्र बनने जा रही अयोध्या की विकास यात्रा देखने को उत्सुक हूं।
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