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Ram Mandir: DM पर हुई थी गोलीकांड की जिम्मेदारी मढ़ने की कोशिश, तत्कालीन जिलाधिकारी ने किताब में बयां किया सच
Thu, 18 Jan 2024 01:59 PM IST
शाहरुख खान
राजेंद्र कुमार पांडेय, अमर उजाला, अयोध्या
राजेंद्र कुमार पांडेय, अमर उजाला, अयोध्या
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 18 Jan 2024 01:59 PM IST
सार
श्री राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद डीएम पर गोलीकांड की जिम्मेदारी मढ़ने की कोशिश हुई थी। 1990 में अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी। 1992 में विध्वंस की घटना के बाद 49 एफआईआर दर्ज हुई थीं।
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बाबरी ढांचा विध्वंस के दौरान की फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद विवाद में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद तत्कालीन डीएम और कप्तान को सस्पेंड कर दिया गया था। घटना को लेकर कुल 49 एफआईआर दर्ज की गई थीं। वर्ष 1990 में गोली चलवाए जाने का आरोप तत्कालीन डीएम पर मढ़ने की कोशिश की गई थी।
22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा समारोह के कुछ साल पहले का अतीत अयोध्या में सभी के लिए कष्टदायी रहा है। वह जो कथित मस्जिद को ढहाने में आरोपी थे, नागरिक थे, और वह भी जो उस समय यहां अहम पदों पर थे। दो अक्तूबर और 30 नवंबर 1990 का मंजर किसी दूसरे राष्ट्र के साथ युद्ध जैसा था।
वर्ष 1990 में विहिप ने 30 अक्तूबर को देशभर से कारसेवकों को अयोध्या बुलाया था। लाखों कारसेवक पहुंच गए। प्रशासन ने अयोध्या को आबाद क्षेत्र का टापू बना दिया था। सवाल-जवाब के बजाय कारसेवकों को गोली मारने का आदेश कर दिया गया था।
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परिंदा पर नहीं मार सकता कि चुनौती को हवा में उड़ाने के लिए सुरक्षा घेरे को ध्वस्त कर जुनूनी कारसेवक विवादित ढांचे के पास तक पहुंचने में कामयाब हो गए। झंडा फहराने की कोशिश की। सुरक्षा बलों ने जगह-जगह ताबड़तोड़ फायरिंग की। आखिरकार कई कारसेवकों की मौत हो गई। कई घायल हो गए। मौत से कारसेवक उग्र हो गए थे। उन्हें रोक पाना अब किसी के वश की बात नहीं रह गई थी।
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22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा समारोह के कुछ साल पहले का अतीत अयोध्या में सभी के लिए कष्टदायी रहा है। वह जो कथित मस्जिद को ढहाने में आरोपी थे, नागरिक थे, और वह भी जो उस समय यहां अहम पदों पर थे। दो अक्तूबर और 30 नवंबर 1990 का मंजर किसी दूसरे राष्ट्र के साथ युद्ध जैसा था।
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वर्ष 1990 में विहिप ने 30 अक्तूबर को देशभर से कारसेवकों को अयोध्या बुलाया था। लाखों कारसेवक पहुंच गए। प्रशासन ने अयोध्या को आबाद क्षेत्र का टापू बना दिया था। सवाल-जवाब के बजाय कारसेवकों को गोली मारने का आदेश कर दिया गया था।
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परिंदा पर नहीं मार सकता कि चुनौती को हवा में उड़ाने के लिए सुरक्षा घेरे को ध्वस्त कर जुनूनी कारसेवक विवादित ढांचे के पास तक पहुंचने में कामयाब हो गए। झंडा फहराने की कोशिश की। सुरक्षा बलों ने जगह-जगह ताबड़तोड़ फायरिंग की। आखिरकार कई कारसेवकों की मौत हो गई। कई घायल हो गए। मौत से कारसेवक उग्र हो गए थे। उन्हें रोक पाना अब किसी के वश की बात नहीं रह गई थी।
तत्कालीन जिलाधिकारी ने किताब में बयां किया सच
72 घंटे के अंतराल में दो नवंबर को एक बार फिर कारसेवकों ने धावा बोला। सुरक्षा में लगी रोडवेज बस को हाईजैक कर वहां तक पहुंच गए। अयोध्या की गलियों में गोलियों की बरसात कर दी गई। कई और कारसेवकों की मौत हुई। कई घायल हो गए। पुलिस ने अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ राम जन्मभूमि चौकी के जरिये रिपोर्ट दर्ज कराई।
72 घंटे के अंतराल में दो नवंबर को एक बार फिर कारसेवकों ने धावा बोला। सुरक्षा में लगी रोडवेज बस को हाईजैक कर वहां तक पहुंच गए। अयोध्या की गलियों में गोलियों की बरसात कर दी गई। कई और कारसेवकों की मौत हुई। कई घायल हो गए। पुलिस ने अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ राम जन्मभूमि चौकी के जरिये रिपोर्ट दर्ज कराई।
आरोप था कि रामनामी पहन सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की, अराजकता फैलाई। मजबूरन गोली चलानी पड़ी। तीन एजेंसियों से जांच की बात बताई गई। फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी राम शरण श्रीवास्तव और एसएसपी सुभाष जोशी थे। गोली चलाने का आदेश तो नहीं था, लेकिन इसका आरोप तत्कालीन डीएम पर मढ़ने का प्रयास हुआ। श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक एक दृष्टिकोण: राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद में साफ लिखा कि कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश उन्होंने नहीं दिया था।
पर यह उनके मत्थे मढ़ने के तमाम प्रयास किए गए। स्वीकार न करने पर उनकी उपेक्षा हुई। उत्पीड़न की हद तक घेराबंदी की गई। कार में आग लगवा दी गई। सूचना पर एसएसपी मौके पर नहीं पहुंचे। अंत में 30 नवंबर 1990 को उनका तबादला कर दिया गया। सीबीआई ने जांच शुरू की। पांच अक्तूबर 1993 को जांच के बाद 49 अभियुक्तों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।
वर्ष 1992 में स्थिति दूसरी थी। प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार थी। एक बार विहिप ने कारसेवकों का आह्वान किया। लाखों की संख्या में कारसेवक यहां पहुंचे। रामकथा कुंज में सभा का आयोजन था। भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, जय भान सिंह पवैया, संतोष दूबे जैसे नेता यहां पहुंचे थे। शांति की कोशिश के बावजूद कारसेवक जबरदस्त कंटीली बैरीकेडिंग को तोड़ ढांचे तक पहुंचे गए। दिनभर में देखते-देखते ढांचा खत्म कर दिया। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया।
केंद्र की तत्कालीन नरसिंहाराव सरकार ने कार्रवाई शुरू की। तत्कालीन डीएम आरएन श्रीवास्तव और एसएसपी डीबी राय को दूसरे ही दिन सात दिसंबर 1992 को सस्पेंड कर दिया गया। रिपोर्ट दर्ज करने का सिलसिला शुरू हुआ। कुल 49 प्रथम सूचना रिपोर्टें दर्ज की गईं। घटनाओं को लेकर पहली रिपोर्ट तत्कालीन राम रामजन्मभूमि थानाध्यक्ष प्रियंवदा नाथ शुक्ला ने दर्ज कराई। दूसरी रिपोर्ट गंगा प्रसाद तिवारी ने। पत्रकारों और फोटोग्राफरों ने रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन दर्ज नहीं हुई। केंद्र सरकार ने 16 दिसंबर 1992 को मनमोहन सिंह लिब्राहन की अध्यक्षता में लिब्राहन आयोग का गठन कर दिया। 399 बैंठकों के बाद आयोग ने 30 जून 2009 को 1029 पेज की रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी। इसमें 68 लोगों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था।