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गोहत्या-भीड़ हिंसा पर बोले आरएसएस नेता- किसी को दूसरे धर्म की आस्था से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं
Thu, 04 Apr 2019 02:57 PM IST
अमर शर्मा
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Thu, 04 Apr 2019 02:57 PM IST
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इंद्रेश कुमार
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‘पॉलिटिक्स ऑफ परफॉरमेंस’ की बात करने वाली भाजपा अब हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे जनता के बीच उठा रही है। क्या एक बार फिर आम चुनाव जनहित के जमीनी मुद्दों की बजाय इन भावनात्मक मुद्दों पर लड़ा जाएगा? इन्हीं सवालों को लेकर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के नेता इन्द्रेश कुमार से हमारे विशेष संवाददाता अमित शर्मा ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है वार्ता के प्रमुख अंश-
सवाल: केंद्र सरकार पहले अपने काम के आधार पर जनता से वोट मांगने की बात कर रही थी, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान अब पीएम मोदी हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और पाकिस्तान के मुद्दे उठाने लगे हैं। क्या ये चुनाव अब ‘काम’ की बजाय इन्हीं मुद्दों पर लड़ा जाएगा?
जवाब: भाजपा ने तो पीएम के काम के आधार पर ही वोट मांगने की पहल की थी, लेकिन अगर विपक्ष देशद्रोह कानून को खत्म करने की बात करेगा तो क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं कि हम देश को बताएं कि उनके इरादे क्या हैं? और इस कदम के भविष्य में क्या घातक परिणाम देश को भुगतने पड़ सकते हैं?
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सवाल: लेकिन हिंदुत्व का मुद्दा तो सबसे पहले आपकी तरफ से ही उठाया गया? पीएम ने राहुल पर अल्पसंख्यक बहुल सीट से चुनाव लड़ने पर तंज कसा।
जवाब: बिलकुल नहीं। शुरुआत भी उन्हीं की तरफ से हुई। आखिर वायनाड से ही चुनाव लड़ने का चयन क्यों किया गया? क्या कांग्रेस अध्यक्ष की उस मंशा के बारे में लोगों को जानकारी नहीं होनी चाहिए? अब जब उनकी कलई खुल रही है तो मीडिया इसे सांप्रदायिक रंग क्यों करार दे रहा है?
सवाल: कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में अफस्पा कानून में बदलाव करने और देशद्रोह कानून को खत्म करने की बात कही है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की इस पर क्या राय है?
जवाब: इसी के साथ यह भी जोड़िए कि नेशनल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री होने की मांग की है। देखिए, शेख अब्दुल्ला और प्रधानमंत्री नेहरू की गलतियों का खामियाजा आज भी देश भुगत रहा है।
अगर कांग्रेस अपने मकसद में कामयाब होती है तो इससे देश के विभाजन का रास्ता तैयार होगा। ये देश अब दोबारा ऐसी गलती नहीं करेगा और अपनी मंशा कामयाब करने का कोई अवसर उन्हें नहीं देगा।
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सवाल: केंद्र सरकार पहले अपने काम के आधार पर जनता से वोट मांगने की बात कर रही थी, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान अब पीएम मोदी हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और पाकिस्तान के मुद्दे उठाने लगे हैं। क्या ये चुनाव अब ‘काम’ की बजाय इन्हीं मुद्दों पर लड़ा जाएगा?
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जवाब: भाजपा ने तो पीएम के काम के आधार पर ही वोट मांगने की पहल की थी, लेकिन अगर विपक्ष देशद्रोह कानून को खत्म करने की बात करेगा तो क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं कि हम देश को बताएं कि उनके इरादे क्या हैं? और इस कदम के भविष्य में क्या घातक परिणाम देश को भुगतने पड़ सकते हैं?
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सवाल: लेकिन हिंदुत्व का मुद्दा तो सबसे पहले आपकी तरफ से ही उठाया गया? पीएम ने राहुल पर अल्पसंख्यक बहुल सीट से चुनाव लड़ने पर तंज कसा।
जवाब: बिलकुल नहीं। शुरुआत भी उन्हीं की तरफ से हुई। आखिर वायनाड से ही चुनाव लड़ने का चयन क्यों किया गया? क्या कांग्रेस अध्यक्ष की उस मंशा के बारे में लोगों को जानकारी नहीं होनी चाहिए? अब जब उनकी कलई खुल रही है तो मीडिया इसे सांप्रदायिक रंग क्यों करार दे रहा है?
सवाल: कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में अफस्पा कानून में बदलाव करने और देशद्रोह कानून को खत्म करने की बात कही है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की इस पर क्या राय है?
जवाब: इसी के साथ यह भी जोड़िए कि नेशनल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री होने की मांग की है। देखिए, शेख अब्दुल्ला और प्रधानमंत्री नेहरू की गलतियों का खामियाजा आज भी देश भुगत रहा है।
अगर कांग्रेस अपने मकसद में कामयाब होती है तो इससे देश के विभाजन का रास्ता तैयार होगा। ये देश अब दोबारा ऐसी गलती नहीं करेगा और अपनी मंशा कामयाब करने का कोई अवसर उन्हें नहीं देगा।
अनुच्छेद 370 में बदलाव पर पीडीपी की धमकी पर क्या कहेंगे?
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती
- फोटो : ANI
सवाल: पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने धमकी दी है कि अगर अनुच्छेद 370 से कोई छेड़छाड़ हुई तो कश्मीर हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं रहेगा। क्या कहेंगे?
जवाब: संविधान के अनुच्छेद 370 के बनते समय इस पर अपनी राय देने के लिए उन्नाव के मौलाना हसरत मोहानी को भेजा गया था। अपने अध्ययन के बाद उन राष्ट्रवादी मुसलमान ने कहा था कि यह कानून एक दिन देश की अखंडता के लिए खतरा बन सकता है।
यही कारण था कि संविधान निर्माता बाबा साहब आंबेडकर ने भी इस अनुच्छेद पर अपना हस्ताक्षर नहीं किया। आज उन दूरदर्शी नेताओं की बात अक्षरश: सत्य साबित हो रही है। देखिए, देश 1947 में आजाद हुआ और ये कानून 1950 और 1954 में लागू हुए। यानी इनका कश्मीर के भारत में विलय पर कोई असर नहीं हुआ। इसकी समीक्षा होनी चाहिए।
सवाल: पीएम मोदी के शासनकाल में भीड़ हिंसा की घटनाएं बढीं। मुस्लिमों में उनके लिए रोष बढ़ा?
जवाब: क्या इस काल में एक भी बड़ी सांप्रदायिक घटना घटी? इसी नरेंद्र मोदी के काल में हज कोटा दुनिया में सबसे ज्यादा दो लाख तक हुआ। इसी काल में 850 कैदियों को सऊदी अरब ने छोड़ा। मदरसों के आधुनिकीकरण के ऐतिहासिक काम हुए।
मुस्लिम बच्चों की मदद दोगुनी कर दी गई। इसी नरेंद्र मोदी के शासनकाल में लाखों मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दर्द से छुटकारा मिला। जरा उनके परिवारों से पूछिए कि वे नरेंद्र मोदी के शासनकाल में ज्यादा खुशी महसूस करते हैं या कांग्रेस के शासन में?
जहां तक भीड़ हिंसा वाली बात है, मैं इतना ही कहूंगा कि किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य की धार्मिक आस्थाओं का मजाक उड़ाने का अधिकार नहीं है। अगर यह कानून बनाया जाए तो कोई विवाद खड़ा नहीं होगा।
जवाब: संविधान के अनुच्छेद 370 के बनते समय इस पर अपनी राय देने के लिए उन्नाव के मौलाना हसरत मोहानी को भेजा गया था। अपने अध्ययन के बाद उन राष्ट्रवादी मुसलमान ने कहा था कि यह कानून एक दिन देश की अखंडता के लिए खतरा बन सकता है।
यही कारण था कि संविधान निर्माता बाबा साहब आंबेडकर ने भी इस अनुच्छेद पर अपना हस्ताक्षर नहीं किया। आज उन दूरदर्शी नेताओं की बात अक्षरश: सत्य साबित हो रही है। देखिए, देश 1947 में आजाद हुआ और ये कानून 1950 और 1954 में लागू हुए। यानी इनका कश्मीर के भारत में विलय पर कोई असर नहीं हुआ। इसकी समीक्षा होनी चाहिए।
सवाल: पीएम मोदी के शासनकाल में भीड़ हिंसा की घटनाएं बढीं। मुस्लिमों में उनके लिए रोष बढ़ा?
जवाब: क्या इस काल में एक भी बड़ी सांप्रदायिक घटना घटी? इसी नरेंद्र मोदी के काल में हज कोटा दुनिया में सबसे ज्यादा दो लाख तक हुआ। इसी काल में 850 कैदियों को सऊदी अरब ने छोड़ा। मदरसों के आधुनिकीकरण के ऐतिहासिक काम हुए।
मुस्लिम बच्चों की मदद दोगुनी कर दी गई। इसी नरेंद्र मोदी के शासनकाल में लाखों मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दर्द से छुटकारा मिला। जरा उनके परिवारों से पूछिए कि वे नरेंद्र मोदी के शासनकाल में ज्यादा खुशी महसूस करते हैं या कांग्रेस के शासन में?
जहां तक भीड़ हिंसा वाली बात है, मैं इतना ही कहूंगा कि किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य की धार्मिक आस्थाओं का मजाक उड़ाने का अधिकार नहीं है। अगर यह कानून बनाया जाए तो कोई विवाद खड़ा नहीं होगा।
देश के चुनाव में पाकिस्तान इतना अहम मुद्दा क्यों?
राम मंदिर मुद्दे की सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई (सांकेतिक)
सवाल: हिन्दुस्तान के चुनाव में पाकिस्तान अहम मुद्दा बनकर उभरा है। क्या हिन्दुस्तान जैसे देश के चुनाव में पाकिस्तान इतना अहम मुद्दा होना चाहिए?
जवाब: किसी भी राष्ट्र के लिए सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा होता है। चूंकि भारत पर सुरक्षा से जुड़ा जो भी खतरा है, वह चाहे आंतरिक खतरा हो या बाहरी, सबकी जड़ें पाकिस्तान में हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह मुद्दा बनेगा।
खासकर जब हमने पुलवामा आतंकी हमले का जवाब बालाकोट एयर स्ट्राइक से दिया हो तो जनता में इसे लेकर सवाल तो उठेगा ही।
सवाल: पीएम नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जबकि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने ये मुद्दा बार-बार उठाया। दोनों संगठनों में कुछ वैचारिक मतभेद तो नहीं?
जवाब: बिल्कुल नहीं। कहीं कोई मतभेद नहीं है। जनता यह देख रही है कि अयोध्या मसले के हल के लिए सरकार ने कई सकारात्मक प्रयास किए। लेकिन बार-बार कांग्रेसी पक्ष के अवरोध के कारण प्रक्रिया में देरी हुई।
सरकार तो गैर विवादित भूमि, राममंदिर निर्माण न्यास को सौंपने की पहल भी कर चुकी। लेकिन कुछ जजों की गलत सोच के कारण इस मुद्दे का हल नहीं निकल सका। वर्ना इस मुद्दे का ऐतिहासिक हल निकल गया होता।
जवाब: किसी भी राष्ट्र के लिए सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा होता है। चूंकि भारत पर सुरक्षा से जुड़ा जो भी खतरा है, वह चाहे आंतरिक खतरा हो या बाहरी, सबकी जड़ें पाकिस्तान में हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह मुद्दा बनेगा।
खासकर जब हमने पुलवामा आतंकी हमले का जवाब बालाकोट एयर स्ट्राइक से दिया हो तो जनता में इसे लेकर सवाल तो उठेगा ही।
सवाल: पीएम नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जबकि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने ये मुद्दा बार-बार उठाया। दोनों संगठनों में कुछ वैचारिक मतभेद तो नहीं?
जवाब: बिल्कुल नहीं। कहीं कोई मतभेद नहीं है। जनता यह देख रही है कि अयोध्या मसले के हल के लिए सरकार ने कई सकारात्मक प्रयास किए। लेकिन बार-बार कांग्रेसी पक्ष के अवरोध के कारण प्रक्रिया में देरी हुई।
सरकार तो गैर विवादित भूमि, राममंदिर निर्माण न्यास को सौंपने की पहल भी कर चुकी। लेकिन कुछ जजों की गलत सोच के कारण इस मुद्दे का हल नहीं निकल सका। वर्ना इस मुद्दे का ऐतिहासिक हल निकल गया होता।