उत्तरप्रदेश में बुआ-भतीजे की दोस्ती कराने में जुटीं दीदी

विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Updated Fri, 10 Mar 2017 04:11 PM IST
mamta banerjee is trying for a grand alliance is uttar pradesh
अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, मायावती
प.बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी बुआ और भतीजे के बीच सियासी पुल बनाने की कोशिश कर रही हैं। गुरुवार की शाम एग्जि़ट पोल्स के नतीजे आते ही ममता बनर्जी ने अखिलेश यादव और मायावती दोनों से फोन पर बात करके उनसे अपने सियासी रिश्तोंं मेंं जमी बर्फ को पिघलाने की सलाह दी। उसके बाद ही अखिलेश का जरूरत पडऩे पर बसपा से भी हाथ मिलाने का चौंकाने वाला बयान आया।
यह जानकारी देने वाले सूत्रोंं के मुताबिक उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्योंं के चुनाव नतीजे आने से पहले ही पुराने राजनीतिक समीकरणों को बदलकर नए सियासी रिश्ते बनाने की कवायद शुरु हो गई है। एग्जि़ट पोल्स के नतीजों से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि वो जरूरत पडऩे पर बसपा से हाथ मिला सकते हैं। अखिलेश के इस बयान पर हालाकि फौरी तौर पर बसपा अध्यक्ष मायावती खामोश हैं, लेकिन उनकी चुप्पी को भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। 

बताया जाता है कि विधानसभा चुनावों के नतीजे कुछ भी आएं राष्ट्रीय राजनीति में अब गैर भाजपा और मोदी विरोधी मोर्चा बनाने की कवायद में ममता बनर्जी जुट गई हैं। अगर उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा आती है तो सपा बसपा और कांग्रेस का नया गठबंधन बनवाने केलिए ममता अखिलेश और मायावती दोनों से फिर बात करेंगी। यह जानकारी देते हुए ममता बनर्जी केएक करीबी सूत्र ने अमर उजाला को बताया कि अगर विधानसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत मिल जाता है तो इस मोर्चे की संभावनाएं और तेज हो जाएंगी और फिर ममता दिल्ली में आकर सभी गैर भाजपा नेताओंं और दलों से बात करेंगी। और अगर सपा कांग्रेस गठबंधन को सरकार बनाने लायक सीटें मिलती हैं तो भी बनर्जी की कोशिश होगी कि मायावती को अलग थलग न रखा जाए और उन्हें भी गैर भाजपा मोर्चे के एक अहम सदस्य केरूप में साथ रखा जाए। 

ममता की कोशिश है कि जिस तरह भाजपा पूरे देश मेंं आगे बढ़ रही है, उसकी सबसे बड़ी वजह विपक्षी वोटों का बंटवारा है। इसलिए बड़ी जरूरत उसे उसी तरह रोकने की है, जैसे बिहार में नीतीश लालू और कांग्रेस केगठबंधन ने रोका है। ममता के रणनीतिकार चाहते हैं कि दीदी अब राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी राजनीति की धुरी बनकर उभरें। इसलिए चुनाव नतीजों केबाद दिल्ली में उनकी सक्रियता बढ़ जाएगी। 

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