'चाय पे चर्चा' से 'चौकीदार से चर्चा' तक, हमलों को हथियार में बदलने की रणनीति 2019 में होगी कामयाब?
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Fellow Indians,
Happy that #MainBhiChowkidar has ignited the Chowkidar within all of us. Great fervour!विज्ञापन
Ecstatic to see the passion and commitment to protect India from corrupt, criminal and anti-social elements.
Let us keep working together for a developed India. — Chowkidar Narendra Modi (@narendramodi) March 17, 2019
इसी के साथ 2019 के सबसे बड़े संग्राम का सबसे बड़ा चुनावी अभियान औपचारिक तौर पर लॉन्च हो चुका है। ये भाजपा की चुनावी रणनीति के तरकश का एक खास तीर है। जब कोई आप पर पत्थर फेंके तो उससे भी गुलदस्ता बनाने की कोशिश करो। हालांकि, ऐसी कोशिशें हमेशा कामयाबी में ही बदलती हों, ये भी सच नहीं।
बीते कुछ समय में शायद ही कोई रैली हो जिसमें राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए 'चौकीदार चोर है' नारे का इस्तेमाल न किया हो। ये नारा अब उनके भाषणों का हिस्सा बन चुका है। वो जनता से आह्वान करते हैं और एक शब्द हवा में उछालते हैं- चौकीदार...जिसके बाद इंतजार होता है उसमें जनता के '...चोर है' जोड़ने का।
राहुल गांधी ने एक नारे को सैकड़ों मंच से सैकड़ों बार दोहराकर भाजपा के खेमे में कुछ तो हलचल मचा ही दी। लेकिन भाजपा ने क्या किया। क्या वो घबरा गई? क्या उसकी बेचैनी उसके नेताओं के बयानों के जरिए बाहर आई।
नहीं। ऐसा नहीं हुआ। बल्कि, भाजपा ने इंतजार किया, ठोस रणनीति पर काम किया और एक अभियान जिस तरह गाजे-बाजे के साथ लॉन्च होता है, वो कर दिखाया।
क्या इससे भाजपा को कोई फायदा भी होगा?
इसका जवाब हां और न दोनों में हो सकता है। यह 2014 के चाय वाला अभियान की तरह तो बिल्कुल नहीं होने वाला। वो क्यों, इस पर थोड़ी तफसील से बात आगे करेंगे।
लेकिन, मुद्दों के महासंग्राम को भटकाने में ये अभियान जरूर कारगर साबित हो सकता है। कहां किसान और बेरोजगारी के बड़े सवालों का जवाब दिया जाए। क्यों इस सवाल में उलझा जाए कि 2 करोड़ लोगों को हर साल रोजगार के वादे पर अमल नहीं हो पाया। क्यों नोटबंदी और जीएसटी के 'मुर्दों' को कब्र खोदकर बाहर निकलने का मौका दिया जाए।
इस लिहाज से देश भर में बड़े पैमाने पर, बड़ी मशीनरी के साथ 'मैं भी चौकीदार' अभियान के सहारे बाकी मुद्दों पर हावी होने की रणनीति ज्यादा सटीक, ज्यादा फायदेमंद मालूम होती है।
चलिए 2014 में चलते हैं
अय्यर ने कहा,
"मैं आपको वादा करता हूं...वादा करता हूं कि इस इक्कीसवीं सदी में नरेंद्र मोदी कभी भी देश के प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे, नहीं बनेंगे, नहीं बनेंगे। यहां आकर चाय का वितरण करना चाहते हैं तो हम उनके लिए कुछ जगह बना देंगे।"
ये 16 जनवरी का दिन था। उसके बाद भाजपा को महज 3 से 4 दिन लगे और पूरा खेल खड़ा हो गया। चुनावी बहसें, चुनावी भाषण सबमें 'चाय' का उबाल खुद-ब-खुद आने लगा।
नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस से गुजरात तक, तमिलनाडु से जम्मू तक चाय के स्टॉल लगने लगे। 500 शहर में हजार से ज्यादा टी स्टॉल, चाय पे चर्चा, नमो टी स्टॉल...जैसे बाकी सब गौण हो गया हो।
2014 और 2019 में क्या फर्क हुआ?
फर्क है और बहुत बड़ा है। वो एक स्वत:स्फूर्त और ताजगी से भरा अभियान था। नरेंद्र मोदी पहली बार चुनाव मैदान में थे। पहली बार वे गुजरात से बाहर देश के एक बड़े भू-भाग में घूम-घूमकर जनता के सामने थे। उनके गुजरात विकास मॉडल की अपनी कहानियां थीं। नेता को तौलने के लिए जनता के पास पैमाने ज्यादा नहीं थे। कांग्रेस 10 साल सत्ता में रह चुकी थी। देश हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार की खबरों के बीच एक 'गरीब' नेता ढूंढ़ रहा था। और शायद 'चायवाले' प्रतीक में वो प्यास खत्म हुई।
मैं भी चौकीदार अभियान 2019 के जरिए एक बार फिर भाजपा ने अपने तुरुप के पत्ते यानी नरेंद्र मोदी को आगे किया है। अमित शाह की भाजपा बखूबी जानती है कि नरेंद्र मोदी पर राहुल गांधी या कांग्रेस के व्यक्तिगत हमले अक्सर पलट कर उन्हीं को नुकसान पहुंचाते रहे हैं लेकिन 2019 के रण में भी ऐसा ही होगा ये भी जरूरी नहीं।