चुनावी विश्लेषण: धोया, निचोड़ा और सुखा डाला
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कुछ होती है इच्छाएं, कुछ होती है कामनाएं, कुछ कामनाएं और भविष्यवाणियां और बाकी होता है यथार्थ। मोदी की विफलता की कामना से जिन लोगों ने अपनी इच्छाएं, कामनाएं, भविष्यवाणियां बुन ली थीं उन्हें जबर्दस्त धक्का लगा है। वे यथार्थ का आशय अपने निर्मित संदर्भों से नए व्याकरण में उगलना शुरू हो गए हैं। लेकिन आंखे मूंद लेने से तूफान गायब नहीं हो जाता।
यह गहरा राजनीतिक दिशा-संकेत है। इसके परिणाम मध्यमवर्गी राजनीति के दिखावटी वामपंथी आभूषणों की पड़ताल की नई प्रक्रिया शुरू करेंगे। दक्षिण पंथी राजनीति के उदात्त और स्वीकार्य स्वरूप के विस्तार के उपक्रम को रास्ता देंगे। और, भारतीय राजनीति के 'कांग्रेस तत्व' का फिर से परीक्षण होगा। कांग्रेस पार्टी जो झूठ-मूठ ही आजादी के पहले भारतीय जन आंदोलनों की रॉयल्टी उठाती रही है, वस्तुतः उन तत्वों की वंशवादी प्रतिष्ठा के प्रदर्शन मात्र से काम चलाती रही है। वक्त के साथ जनकल्याण के साम्यवादी आभूषणों से उसने मध्यवाम का एक चालू फॉर्मूला भी तैयार कर लिया। इसी फॉर्मूले पर कालांतर में धर्मनिरपेक्षता की राजनीतिक जुमलेबाजी का कारोबार शुरू हुआ। गैर-कांग्रेसवाद का समाजवादी प्रयोग इसके उत्तर ढूंढने का महत्वपूर्ण प्रयास था।
अब साफ है कि दक्षिणपंथ ने समय के साथ उन आभूषणों का अपना सांस्कृतिक उत्तर तैयार कर लिया है और परंपरा के साथ समकालीन आर्थिकी पर नजर डाली है। भयंकर भ्रष्टाचार के संस्थागत रूप से उत्पन्न बेचैनी की परख कर ली है। अब छद्म धर्मनिरपेक्षता शब्द मुस्लिम समुदाय की ऐसी तरफदारी के तौर पर देखा जाता है, जिसमें खुद उस संप्रदाय के प्रगतिशीलत्व भी अपना दम घुटता पाते हैं। इस्लामिक आतंकवाद की वैश्विक उपस्थिति ने इस विमर्श को और तीखा कर दिया है।
वे खुले हैं और मंदिरों में पूजा करने को पाखंड नहीं कहते
नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक महानायक के गुणों को अपनी छवि के साथ संयुक्त करके वांछित दृढ़ता के लोकप्रिय मॉडल में रूपांतरित करने की कोशिश की है। इस वजह से कांग्रेस की शुरू की बाजार व्यवस्था का वास्तविक लाभांश उठाने के वे वास्तविक हकदार बन कर उभरे। वे खुले हैं और मंदिरों में पूजा करने को पाखंड नहीं कहते। जोकि यज्ञ-अभिषेक करने दरगाहों पर चादर चढ़ाने तथा तांत्रिकों के चक्कर चलाने वाले कांग्रेसी , प्रगतिशीलता के ऊंचे बाजार में भी धड़ल्ले से ये मुद्राएं चलाते रहे हैं। सबसे उत्कृष्ट तमाशा समाजवादी यादवों का रहा है।
धुर जातिवादी सांप्रदायिक फॉर्मूले से खानदानी सत्ता का समाजवादी संस्करण बिहार में लालू यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने खड़ा किया। अभी जब अखिलेश और शिवपाल प्रहसन चला तो प्रस्तुत ऐसा हुआ जैसे पवित्र अखिलेश के हाथों धर्मयुद्ध चल रहा हो। परिवार में सत्ता के बंटवारे के घृणित संघर्ष को भ्रष्ट तथा ईमानदार के बीच की लड़ाई का रंग दे दिया गया। जनता को मोदी की उपस्थिति इस रंग को चुनौती देने के लायक लगी।
मोदी ने राजनीतिक साहस, कड़ाई, व्यक्तिगत ईमानदारी तथा रात-दिन की सक्रियता को प्रोजेक्ट किया। नीति आयोग, जनधन, आधार, सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के क्रम से क्रमिक बदलाव की इच्छाशक्ति एवं जोखिम लेने की ईमानदारी को जनता में पैठाया गया। अमेरिकी दौरे में नींबू-पानी ब्रांड नवरात्रि किसी सफल फिल्म के सर्वाधिक तालीबजाऊ दृश्य से कम नहीं थी, तो नोटबंदी के शब्द 'सिर्फ पचास दिन मित्रो' गरीबों का अमीर -विरोधी ताबीज बन गए।
मोदी स्थापित हुए, क्योंकि ऐसा नहीं है कि जिस पूंजीपति को उनका कृपापात्र कहा जाता है, वह कांग्रेस को कोई कम चंदा देता था बल्कि फोन पर बाकायदा आवाज चली थी जिसमें वह कहता है, 'कांग्रेस तो अपनी दुकान है।'
विरोधी अपनी कामना तथा यथार्थ का फर्क भूल जाते हैं
मोदी मैदान की रणनीति, जमीनी यथार्थ, व्यक्तिगत प्रदर्शन, दूरगामी एजेंडे तथा फलश्रुति का मिश्रण बनाने वाले कीमियागर हैं। यह भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की अजब विडंबना है कि उनके विरोधी, 'सिर्फ उनके विरोधी' हैं और भयाक्रांत होते हुए ऊपरी वैचारिक जुमलों से उन्हें पीटना चाहते हैं। जितना वे ऐसा करते हैं, मोदी और बड़े हो जाते हैं। विरोधी अपने विचार और इच्छा को जनमत बताते-बताते खुद ही अपनी कामना तथा यथार्थ का फर्क भूल जाते हैं।
जब यथार्थ सामने आ जाता है, तो वे स्वप्न के नष्ट होने के पीछे की कथित साजिश की सैद्धांतिकी बघारना शुरू कर देते हैं। मोदी की पराजय उनकी कामना हो सकती है, लेकिन उसे जन-यथार्थ कैसे प्रचारित किया जा सकता है? मार्केटिंग, मीडिया मैनेजमेंट, ब्रांडिंग, सोशल मीडिया, भक्त-तंत्र सब मिथ हैं। क्योंकि ये सभी को उपलब्ध हैं। प्रशांत किशोर ने मोदी से शुरू की यात्रा वाया नीतीश कांग्रेस तक कर ली। यदि आपको साबुन बेचना है, तो आप प्रचार से पत्थर को साबुन के खाते में नहीं बेच सकते, कम से कम साबुन तो चाहिए ही।
मोदी ने यदि सबको धोया, निचोड़ा और तार पर सुखा दिया है, तो यह रेत को वॉशिंग पाउडर के विज्ञापन से बेच खाने का करिश्मा भर नहीं है, यह तो स्वीकार कर ही लेना चाहिए।
अब नीतीश, ममता, केजरीवाल, अखिलेश, मायावती का दलित-धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाकर नया शगूफा खड़ा करने से नहीं, वास्तविक राजनीतिक प्रत्याख्यान से ही उत्तर मिल सकते हैं। वर्ना मोदी की विफलता की प्रतीक्षा में ही जाप करते रहिए। और याद रखें, जनता का धैर्य, आपके महान वैचारिक एहसानों की बारिश की प्रतीक्षा नहीं करता।