क्या दुनिया भर की सरकारें फेल हो चुकी हैं
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हर देश की सरकार दावा करती है कि वो बेहतरीन है। जनता की भलाई के लिए बहुत से अच्छे काम कर रही है। उनके राज में समाज के हर तबके की सुनवाई होती है। हर वर्ग की उम्मीदें पूरी की जाती हैं। मगर, हकीकत ये है कि दुनिया के कमोबेश हर देश की सरकारें आउटडेटेड हो चुकी हैं। यानी उनके काम-काज का ढर्रा पुराना पड़ गया है। वो न तो आज के दौर से तालमेल बिठा पा रही हैं। न ही जनता की उम्मीदें पूरी कर पा रही हैं।
प्रशासन का जो रूप हम आज देख रहे हैं, उसने उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी देशों में शक्ल ली थी। तब न तो संचार के ज़रिए इतने ज़्यादा थे। न ही आंकड़ों का ढेर था। ऐसे में जो प्रशासनिक ढांचा उस वक़्त तैयार किया गया, उसमें दर्जे और पायदानों पर ज़ोर दिया गया।
सरकारें बंद दरवाज़ों के भीतर काम करती थीं। जनता न उनके काम करने का तरीक़ा जान पाती थी, न ही फ़ैसलों में साझेदार थी। उस दौर में सरकारों की ज़िम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और उन्हें इंसाफ़ देने तक सीमित थी।
बदलते दौर के हिसाब से बदलें सरकारें
आज, दुनिया के लोग एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। जानकारी बड़ी तेजी से धरती के एक कोने से दूसरे छोर तक पहुंच जाती है। जनता के पास सोशल मीडिया से लेकर संचार के कई और माध्यम हैं। उसके पास आंकड़े हैं। लेकिन, सरकारें उसी उन्नीसवीं सदी के ढर्रे पर चले जा रही हैं।
दावोस में होने वाली विश्व आर्थिक मंच की बैठक ने दुनिया के कई काबिल लोगों को मिलाकर ग्लोबल फ्यूचर काउंसिल ऑन इनोवेशन ऐंड आंत्रप्रेन्योरशिप बनाई है। इसके प्रमुख ज्योफ मुलगन कहते हैं कि आज की सरकारें बेहद पुरानी पड़ चुकी हैं। वो उस दौर की उपज हैं, जो बहुत पीछे छूट चुका है।
आज, जबकि संचार के इतने माध्यम मौजूद हैं, फिर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पब्लिक की भागीदारी बहुत सीमित है। लोग बस एक तयशुदा वक्त पर वोट देकर सरकार चुनने के हकदार होते हैं। इसके बाद अगले चुनाव तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनका कोई दखल नहीं होता।
जानकार कहते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में फौरी और इंकलाबी बदलाव की सख्त जरूरत है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नएफ अल-रोधन कहते हैं कि लोकतंत्र एक बदलाव और सुधार का नाम है। अगर सरकारें बदलते दौर के हिसाब से नहीं बदलतीं, तो वो लोगों की उम्मीद पूरी करने में अक्सर नाकाम होने लगती है। लोग अपनी सरकारों से नाखुश होते हैं। उन्हें पूरा हक नहीं मिलता।
अमीर देशों में भी बिगड़ रहे हालात
अब अमरीका को ही लीजिए। दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क है। मगर यहां आज 14 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। जबकि 1973 में ये आंकड़ा 11 प्रतिशत था। अल-रोधन कहते हैं कि ये स्थिति खतरनाक है। समाज के हाशिए पर पड़े लोग सिस्टम के लिए ही खतरा बन जाते हैं। वो बागी हो जाते हैं। सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करते हैं।
आज कमोबेश हर लोकतांत्रिक देश चुनावी राजनीति पर चलता है। तय वक्त पर चुनाव होते हैं। ऐसे में इन देशों के नेता और अफसर सिर्फ अगले कुछ सालों के हिसाब से ही नीतियां बनाते हैं। वो लंबी दूरी के टारगेट पर काम नहीं करते।
नतीजा ये होता है कि अमीर देशों में भी हालात बिगड़ रहे हैं। जैसे कि जर्मनी में बुनियादी ढांचा बिखर रहा है। इसी तरह अमरीका ने एक खरब डॉलर की टैक्स रियायतें अपनी जनता को दीं। इससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ गया। वहीं, इंडोनेशिया में लगातार खुद से उगने वाले जंगल जलाकर बाग लगाए जा रहे हैं। इससे कुदरती चक्र को नुकसान हो रहा है।
स्कूल सिखा रहा फर्जी खबरों की पहचान
वर्ल्ड एनर्जी काउंसिल की एंजेला विल्किंसन कहती हैं कि आप ऐसी नीतियों पर कुछ साल तो चल सकते हैं। मगर बुरे हालात जल्द ही आप पर हावी हो जाएंगे। वैसे, हमारे कहने का ये मतलब नहीं कि हम मौजूदा सरकारों को, आज के लोकतांत्रिक सिस्टम को तोड़कर फेंक दें।
ज्योफ मुल्गन कहते हैं कि हमें मौजूदा सिस्टम में ही सुधार लाकर इसे ज्यादा जवाबदेह बनाने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि अगर हम मौजूदा सरकारी ढांचे को उखाड़ फेंकेंगे, तो हालात दक्षिणी सूडान जैसे हो जाएंगे। जहां पुराने निजाम को एक झटके में खत्म कर दिया। आज वहां पूरी तरह से अराजकता फैल चुकी है।
आज सरकारों को ज्यादा तेज-तर्रार और लोगों से संवाद करने वाली बनना होगा। उन्हें ताजा आंकड़ों की बुनियाद पर फैसले लेने होंगे। तकनीक के इस्तेमाल से जनता से नजदीकी बढ़ानी होगी।
कुछ सरकारों ने ये काम शुरू भी कर दिया है। जैसे कि स्वीडन में छात्रों को स्कूल में ही सिखाया जाता है कि वो फर्जी खबरों को कैसे पहचानें। इसके बरक्स, अमरीका के राष्ट्रपति ही झूठी खबरों को बढ़ावा देते रहते हैं।
मुट्ठी भर लोग ही तय कर रहे देश का मुस्तकबिल
एक तरफ स्पेन, ताईवान और आइसलैंड जैसे देश हैं, ऐसे तरीके तलाश रहे हैं जिसमें लोकतांत्रिक फैसले मिल-जुलकर लिए जाएं। जनता की अक्ल का बेहतर इस्तेमाल हो। वहीं, रूस और तुर्की जैसे देशों में एक नेता की तानाशाही बढ़ती जा रही है।
इन छोटे-मोटे सुधारों को छोड़ दें तो अमरीका, यूरोप और एशिया की ज्यादातर हुकूमतें बेकार हैं। पुरानी हैं। जनता खुद को निजाम में साझीदार नहीं महसूस करती। उसे लगता है कि मुट्ठी भर लोग ही देश का मुस्तकबिल तय कर रहे हैं। आम लोगों को लगता है कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही है।
अक्सर सरकारों में इतनी जड़ता आ जाती है कि वो बदलाव के लिए राजी ही नहीं होते। तभी तो अरब क्रांति नाकाम हो गई। दक्षिण अफ्रीका, नेल्सन मंडेला के ख्वाबों वाला इंद्रधनुषी देश नहीं बन सका।
एंजेला विल्किंसन कहती हैं कि अफसर बदलाव के सबसे बड़े विरोधी होते हैं। निजी क्षेत्र तो कुछ नए आइडिया पर काम भी करता है। मगर, सरकारें उनको अपनाने में भी इतनी देर कर देती हैं, कि जब तक उन पर अमल होता है, वो विचार भी पुराने पड़ चुके होते हैं।
नए तजुर्बे कर रहे हैं कुछ देश
वैसे, कुछ देशों ने अपने यहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बदलाव के छोटे-छोटे कदम उठाए हैं। जैसे, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूड्यू ने तय किया है कि वो कुछ फैसले पूरी तरह से आंकड़ों के आधार पर लेंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने बजट का एक हिस्सा इस बात की रिसर्च के लिए निकाला है, जो सरकार के बेहतर काम करने पर रिसर्च करेगा। इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात की सरकार अपने बजट का 1 फीसद नए तरीके तलाशने में खर्च करेगा।
ज्योफ मुल्गन इसे सही दिशा में उठा कदम मानते हैं। वो कहते हैं कि सरकारें अक्सर प्रयोग करने से डरती हैं। उन्हें लगता है कि जैसे ही प्रयोग का नाम लिया, ये संदेश जाएगा कि इस नए कदम को लेकर वो खुद आश्वस्त नहीं। लेकिन, किसी भी नई चीज को छोटे पैमाने पर आजमाना ठीक होता है। काम किया तो अच्छा, वरना कुछ और नया करें।
यूरोपीय देश स्लोवेनिया की सरकार यही तजुर्बा कर रही है। उसने लोगों के सामने विजन ऑफ स्लोवेनिया को 2015 में पेश किया था। जनता से कहा गया कि वो प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए नए सुझाव दें। ताकि लोग ज्यादा खुशहाल हो सकें। उन्होंने इसके लिए 2050 का टारगेट रखा है।
मिलकर फैसला लें, गलतियां होंगी कम
एंजेला विल्किंसन कहती हैं कि एक केंद्रित सरकार बहुत कारगर नहीं होती। आज जरूरी है कि फैसले लेने में ज्यादा से ज्यादा लोग भागीदार हों। कई लोग मिलकर फैसले लें। किसी एक की दादागीरी न चले। इससे गलतियां कम होने के आसार बढ़ जाएंगे।
अल-रोधन कहते हैं कि सरकार जनता की सुने इसके लिए जरूरी है कि समाज के हर तबके को सम्मान दिया जाए। किसी भी नागरिक को ये न लगे कि वो देश में दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहा है। उसे भी सुरक्षा का एहसास हो, बराबरी का मौका मिले। इंसाफ मिलने में देरी न हो। देश की तरक्की तभी है, जब हर नागरिक उसमें भागीदार हो।
बहुत से ऐसे देश हैं, जिन्होंने तरक्की तो खूब कर ली है, मगर जनता को बराबर की भागीदारी नहीं दे पाए। यूरोप का देश फिनलैंड ऐसी ही मिसाल है। जहां लोगों को लगता था कि उनके पास अपने देश में कुछ नया करने के बहुत कम मौके हैं। नतीजा, बड़ी तादाद में काबिल लोग अपना फिनलैंड को छोड़कर दूसरे देशों में जाकर बस गए।
ज्योफ मुल्गन कहते हैं कि सिंगापुर, कनाडा, चिली और ऑस्ट्रेलिया की सरकारें पब्लिक की भागीदारी बढाने के लिए छोटे-छोटे कदम उठा रही हैं। अगले 20-30 सालों में इसके नतीजे दुनिया के सामने होंगे।
भारत में ऐसा हो रहा है क्या?