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पितृपक्ष में करें यह व्रत तो यमलोक जाने से बच जाएंगे

Sun, 25 Sep 2016 06:52 PM IST
राकेश्ा झा / टीम डिजिटल, अमर उजाला, दिल्ली।
राकेश्ा झा / टीम डिजिटल, अमर उजाला, दिल्ली। Updated Sun, 25 Sep 2016 06:52 PM IST
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2016 indira ekadashi vrat katha
व‌िष्‍णु
हर साल आश्‍व‌‌िन कृष्‍णपक्ष यानी पितृपक्ष में आती है इंदिरा एकादशी। पितृपक्ष के दौरान आने के कारण यह एकादशी पितरों की मुक्ति के लिए उत्तम मानी गई। इस वर्ष यह पुण्यदायी एकादशी 26 स‌ितंबर सोमवार को है। इस एकादशी की महिमा का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।


 

प‌ितृपक्ष में करें यह व्रत तो यमलोक जाने से बच जाएंगे

2016 indira ekadashi vrat katha
व‌िष्‍णु

इस पुरण में भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा है कि आश्विन मास की कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान हृषिकेश की पूजा करता है वह मृत्यु के बाद यमलोक जाने से बच जाता है।

प‌ितृपक्ष में करें यह व्रत तो यमलोक जाने से बच जाएंगे

2016 indira ekadashi vrat katha
भगवान विष्‍णु

जिनके पूर्वज यानी पितर किसी पाप के कारण यमलोक में जाकर यम की यातना सह रहे हैं उन्हें भी यम के कोप से मुक्ति मिल जाती है और स्वर्ग जाने का अधिकारी बन जाते है। पितृपक्ष में इस एकादशी के आने का उद्देश्य भी यही है कि जिनके पितर यम की यातना सह रहे हैं उन्हें मुक्ति मिल जाए। राजा इन्द्रसेन के पिता को अपने जीवन काल मे किए किसी पाप के कारण यमलोक जाना पड़ा।

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प‌ितृपक्ष में करें यह व्रत तो यमलोक जाने से बच जाएंगे

2016 indira ekadashi vrat katha
नारद व‌िष्‍णु भगवान

एक दिन इन्द्रसेन के पिता ने सपने में आकर इन्द्रसेन से कहा कि मुझे मुक्ति नहीं मिली है, मैं यमलोक में आकर अपने कर्मों की सजा पा रहा हूं। मेरी मुक्ति के लिए कोई उपाय करो। पिता को तकलीफ में जानकर इन्द्रसेन परेशान हो गए। इसी बीच एक दिन नारद मुनि राजा इन्द्रसेन के दरबार में पधारे। नारद मुनि ने इन्द्रसेन से कहा कि आप आश्विन माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें, इस व्रत का पुण्य अपने पिता को दे दीजिए इससे आपके पिता यमलोक से मुक्त हो जाएंगे। राजा ने देवऋषि नारद के बताए विधि के अनुसार एकादशी का व्रत किया।

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प‌ितृपक्ष में करें यह व्रत तो यमलोक जाने से बच जाएंगे

2016 indira ekadashi vrat katha
भगवान विष्‍णु
अगले दिन इन्होंने ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा देकर प्रसन्न किया। इसके बाद एकादशी का पुण्य अपने पिता को दान दे दिया। एकादशी के पुण्य के प्रभाव से इन्द्रसेन के पिता बैकुण्ठ चले गए। मृत्यु के बाद इन्द्रसेन को भी वैकुण्ठ में स्थान प्राप्त हुआ।
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