यूरोप के देश न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न हैं। जिन्हें देश संभालते बमुश्किल दो साल और आठ महीने हुए हैं। लेकिन उनकी उपलब्धियां देश के इतिहास में सभी राष्ट्राध्यक्षों में सबसे अधिक है। 39 वर्षीय जेसिंडा ने अपने देश को कोरोना वायरस से मुक्त करवा लिया है और वो अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बटोर रही हैं। जेसिंडा ने पद संभालने के बाद से ही लोगों की तारीफें बटोरी हैं। लोग उनके नेतृत्व क्षमता की तुलना अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से करते हैं। क्योंकि इससे पहले मार्च 2019 में क्राइस्टचर्च में हुए हमले के बाद जेसिंडा की पीड़ित परिवारों से गले मिलते हुए तस्वीरों ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं। हमले के बाद जेसिंडा की प्रतिक्रिया और सकारात्मक रवैये के कारण टाइम मैग्जीन ने उन्हें पर्सन ऑफ द ईयर के लिए भी नॉमिनेट किया था।
इस देश की महिला प्रधानमंत्री हैं लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय, कोरोना से जंग जीतने वाला बना पहला राष्ट्र
जेसिंडा का जन्म 26 जुलाई 1980 को हुआ था किसी भी आम नागरिक की तरह उनका बचपन भी बहुत ही साधारण तरीके से बीता है। जेसिंडा के पिता रॉस पुलिस में काम करते थे और मां लॉरेल स्कूल के केटरिंग का काम करती थीं। उनकी परवरिश मॉरमॉन शहर में हुई। पुलिस की नौकरी के अलावा उनके पिता की फलों की दुकान थी। स्कूल से आने के बाद वह फल बेचतीं तो कभी पड़ोस में गोल्फ खेलने वाले लोगों को भी फल बेचने जाती थीं। इसके बाद उन्होंने एक बेकरी की दुकान में भी कुछ समय तक काम किया। एक इंटरव्यू में जेसिंडा ने बताया कि उनका बचपन एक आम कीवी बच्चे की तरह खेतों में बीता। उन्हें ट्रैक्टर चलाने का शौक था, लेकिन एक बार बड़ा एक्सीडेंट करने के बाद घरवालों ने उन्हें ट्रैक्टर देना बंद कर दिया था।
जेसिंडा न्यूजीलैंड में हुए पोल में दो बार 2008 और 2011 में देश की सबसे आकर्षक महिलाओं में भी चुनी जा चुकी हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके लेबर पार्टी प्रमुख बनने के साथ ही न्यूजीलैंड में "जेसिंडामेनिया'' ट्रेंड करने लगा था। अचानक ही लेबर पार्टी को मिलने वाली फंडिंग भी कई गुना बढ़ गई थी। 9 सालों से सत्ता से दूर लेबर पार्टी जेसिंडा के आने के बाद जीत गई थी।
जेसिंडा तीन बार चुनाव हार चुकी थीं। इसके साथ ही उन्होंने चीफ का पद सात बार ठुकराया लेकिन फिर भी वो आखिर में प्रधानमंत्री के पद पर पहुंच ही गईं। 2008 में जेसिंडा ने पहली बार चुनाव लड़ा, लेकिन हारने के बाद भी वह संसद पहुंचीं। न्यूजीलैंड में संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत लिस्ट कैंडिडेट (मिक्स्ड मेंबर प्रपोर्शनल, एमएमपी) व्यवस्था के तहत ऐसा मुमकिन है। 2011 और 2014 में भी वह चुनाव हार गईं, लेकिन फिर से लिस्ट कैंडिडेट के रूप में संसद गईं। 2017 में ऑकलैंड के माउंट अल्बर्ट सीट से वह चुनाव जीतीं। लेबर पार्टी के उपनेता के इस्तीफे के बाद वह पार्टी में नंबर दो बनीं। इसके बाद अगस्त 2017 में पार्टी प्रमुख बनीं और अक्टूबर में पीएम। हालांकि इससे पहले सात बार लेबर पार्टी प्रमुख बनने के प्रस्ताव को वह ठुकरा चुकी थीं।
जेसिंडा बताती हैं कि उनका इरादा राजनेता बनने का नहीं था। वो तो सबसे पहले प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क के ऑफिस में शोधार्थी के रूप में पहुंची थीं। यहीं नहीं उन्होंने दो साल से ज्यादा समय तक ब्रिटेन के प्रधानंत्री टोनी ब्लेयर के ऑफिस में भी रही हैं। जेसिंडा ने बहुत सारे अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है। सबसे पहले कॉलेज में लड़कियों के ट्राउजर पहनने की छूट के लिए कॉलेज प्रशासन से लड़ाई लड़ी थी। महज आठ साल की उम्र में वो मानवाधिकार संगठन से जुड़ गई थीं। यही नहीं उन्होने 17 साल की उम्र में लेबर पार्टी ज्वॉइन कर ली थी।

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