शिक्षाविदों को खेद है कि माफी पर नए शोध नहीं हो रहे। वजह यह है कि ऐसे शोध की रूपरेखा बनाना मुश्किल है। यह शायद उतना ही चुनौतीपूर्ण है जितना यह पता लगाना कि कहीं कठफोड़वा को सिरदर्द तो नहीं हो रहा। अमेरिका के ओहायो में ओबरलिन कॉलेज की मनोवैज्ञानिक सिंडी फ्रांट्ज ने इस दिशा में कोशिश की थी। वो कहती हैं,
'सॉरी' कहने का स्मार्ट तरीका क्या है, गलती करने पर आप कैसे माफी मांगते हैं?
इस विषय के शोधकर्ता अक्सर अपने बाल नोचने पर मजबूर हो जाते हैं। उनके सामने सवाल होता है कि वो अपने अध्ययनों में प्रतिभागियों के साथ ऐसा क्या गलत करें जो अनैतिक न हो और जिससे नाटकीय माफी की जरूरत पैदा हो?
ज्यादातर शोधकर्ता प्रतिभागियों से काल्पनिक सवाल पूछते हैं, जैसे- 'कल्पना करें कि सैम ने आपके पैरों पर कार चढ़ा दी हो।' या वे पुरानी यादों से जुड़े सवाल पूछते हैं जो पूर्वाग्रह से भरे और दोषपूर्ण हो सकते हैं। जैसे- 'मां से मांगी गई माफी के बारे में बताएं।'
माफी की सांस्कृतिक विशिष्टताएं इसे और जटिल बना देती हैं। इन कठिनाइयों के बावजूद इस विषय पर कुछ शोध हो रहे हैं। ऐसे ही एक शोधकर्ता हैं कोबे यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक योहसुके ओट्सुबो। उन्होंने माफी के बारे में 12 साल तक अध्ययन किया है। पिछले साल उन्होंने अपने छह शोधपत्रों में से पांचवां पेपर प्रकाशित कराया था, जिसमें माफी मांगने के कुछ निर्देश भी हैं।
कैसे मांगें माफी?
माफी मांगते समय सबसे अच्छा तरीका है एक ऐसा तोहफा देना जो कीमती हो। मिसाल के लिए, अगर किसी कंपनी को ग्राहक से माफी मांगनी हो तो वह महंगे गिफ्ट सर्टिफिकेट देकर दुख जता सकती है। या किसी व्यक्ति को सॉरी बोलना हो तो वह कह सकता है, "मैं इस वीकेंड अपना ट्रिप रद्द कर रहा हूं। शनिवार को मैं आपके साथ रहूंगा।"
माफी के तोहफे गलतियों जितने ही पुराने हैं। ओह्सुबो का कहना है कि ऐसे तोहफे पानेवाले को अमीर बनाने के लिए नहीं होते। वो कहते हैं, "गलती करने वाले को कितना मूल्य चुकाना पड़ा है ये मायने रखता है।" दूसरे शब्दों में, तोहफा देने वाले को अधिक दुख पहुंचता है, न कि लेने वाले को। यह निजी और सामूहिक दोनों तरह की माफियों में सही है। अकेले में और सार्वजनिक रूप से मांगी गई माफियों में भी।