दुनियाभर में कोरोना महामारी के शुरू होते ही सरकारों ने लॉकडाउन का ऐलान कर दिया था। लॉकडाउन के कारण काम और शिक्षा जैसी कई महत्वपूर्ण गतिविधियां वर्चुअल रूप से होनी शुरू हो गईं। लिहाजा लैपटॉप और मोबाइल फोन के बढ़े इस्तेमाल के कारण सभी आयु वर्ग के लोगों का स्क्रीन टाइम भी पहले से कहीं अधिक हो गया। सरल शब्दों में स्क्रीन टाइम का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा लैपटॉप, डेस्कटॉप, स्मार्टफोन और टेलीविजन जैसे स्क्रीन वाले डिवाइस पर बिताया जाने वाला अधिक समय होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो बढ़ा हुआ स्क्रीन टाइम कई प्रकार के गंभीर रोगों का कारण बन सकता है।
अध्ययन: लैपटॉप-मोबाइल पर बिताते हैं बहुत ज्यादा समय तो हो सकते हैं इस गंभीर रोग के शिकार
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युवाओं में बढ़ रही है मानसिक समस्या
महामारी के दौरान लोगों के बीच बढ़े हुए स्क्रीन टाइम को लेकर कई अध्ययनों में अलर्ट किया गया है। सेंट जेम्स स्कूल ऑफ मेडिसिन में किए गए एक हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बढ़े हुए स्क्रीन टाइम को युवाओं में मानसिक समस्याओं के कारक के रूप में बताया है। इस अध्ययन को प्रकाशित करने के लिए 20-24 जून के बीच वर्ल्ड माइक्रोब फोरम पर इसकी चर्चा की जा रही है। अध्ययन में विशेषज्ञों ने मानसिक रोग के खतरे के बारे में लोगों को सचेत करते हुए इसे नियंत्रित करने की अपील की है।
बढ़ रहे हैं अवसाद और चिंता के मामले
अध्ययन के लिए कई देशों से डेटा एकत्र कर उनका मूल्यांकन किया गया। यह शोध 18-24 साल की उम्र के 294 लोगों पर किया गया। अध्ययन के दौरान विशेषज्ञों ने आधे से अधिक प्रतिभागियों को हल्के से मध्यम स्तर के डिप्रेशन का शिकार पाया। इसके अलावा लगभग 30 प्रतिशत प्रतिभागियों में पीटीएसडी (पोस्ट स्ट्रेस ट्रॉमेटिक डिसऑर्डर) की समस्याओं का भी पता चला। विशेषज्ञों ने बढ़े हुए स्क्रीन टाइम के कारण लोगों में चिंता और तनाव के मामलों में भी पहले से ज्यादा इजाफा देखा है।
वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन क्लास
अध्ययन के प्रमुख लेखकों में से एक मिशेल विसियाक कहते हैं, "इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कोरोना महामारी ने न सिर्फ लोगों को शारीरिक रूप से, बल्कि भावनात्मक और मानसिक रूप से भी प्रभावित किया है। इसमें लगभग सभी आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। अध्ययन के निष्कर्ष में हम यह कह सकते हैं कि बढ़ा हुआ स्क्रीन टाइम लोगों के मानसिक सेहत के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है। वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन क्लास के चलते लोगों का ज्यादा समय डिवाइसों पर बीत रहा है, इस बारे में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
अमर उजाला से एक बातचीत में वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ सत्यकांत त्रिवेदी बताते हैं कि कोरोना से रिकवरी के बाद लोगों में अनिद्रा की समस्या भी देखने को मिल रही है। इसके लिए भी बढ़े हुए स्क्रीन टाइम को मुख्य कारक के रूप में देखा जा सकता है। इस तरह की दिक्कतों से बचने के लिए शाम 5 बजे के बाद किसी भी तरह के स्क्रीन जैसे मोबाइल, लैपटॉप, टीवी अदि से दूरी बना लेनी चाहिए। पेड़-पौधों और हरियाली को देखें, इससे आंखों को सुकून मिलता है और स्क्रीन के बढ़े हुए समय के साइड-इफेक्ट्स को कम किया जा सकता है।
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नोट: वर्ल्ड माइक्रोब फोरम की बैठक में अध्ययन के निष्कर्षों पर चर्चा की गई। अध्ययन को प्रकाशित करने की प्रक्रियाओं पर काम किया जा रहा है। यह लेख इसी आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।