फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Why government is helplessness dealing with monkeys

बंदरों से निपटने में बेबस क्यों है सरकार

Fri, 16 Nov 2018 12:10 AM IST
गुरप्रीत सैनी, बीबीसी संवाददाता
गुरप्रीत सैनी, बीबीसी संवाददाता Updated Fri, 16 Nov 2018 12:10 AM IST
विज्ञापन
Why government is helplessness dealing with monkeys
monkey shimla
"दिल्ली में बंदरों का आतंक बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों हमारे एक सांसद महोदय समिति की बैठक में इसलिए लेट हो गए, क्योंकि जब वो घर से निकले तो बंदरों ने उनपर हमला कर दिया। वो बाल-बाल बचे, लेकिन उनके बेटे को बंदरों ने काट लिया। मैं आपके माध्यम से सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि वह नागरिकों को बंदरों से बचाएं।"
विज्ञापन


राज्य सभा के सांसद राम कुमार कश्यप ने सभापति एम. वेंकैया नायडु से ये निवेदन 24 जुलाई 2018 को किया था। उस वक्त वेंकैया नायडु ने भी कहा था कि ये समस्या उपराष्ट्रपति निवास में भी है। ये समस्या न सिर्फ उपराष्ट्रपति निवास ही नहीं बल्कि पूरे लुटियन्स जोन, दिल्ली शहर और देश के कई इलाकों में है। कड़ी सुरक्षा वाली इमारतों में भी ये बंदर 'घुसपैठ' करते रहते हैं।
विज्ञापन


कई कोशिशों के बाद भी न तो बंदरों का आंतक कम हो रहा है और न ही उन पर लगाम लग पा रही है। ताजा कोशिश देश की संसद ने की है। लोकसभा सचिवालय की तरफ से आने वाले शीतकालीन सत्र में बंदरों के आतंक से निपटने के लिए एक एडवाइजरी जारी की गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन

Why government is helplessness dealing with monkeys
monkey shimla
ये निर्देश सांसदों, मंत्रियों और संसद आने वाले आम लोगों के लिए है। इस एडाइजरी में बंदरों से बचने के कुछ तरीके सुझाए गए हैं, जैसे:
-बंदरों से आंख न मिलाएं।
-बंदरिया और उसके बच्चे के बीच से न निकलें।
-बंदरों को परेशान न करें। आप उन्हें अकेला छोड़ दें, वो आपको अकेला छोड़ देंगे।
-बंदरों को देखकर भागे न।
-मरे हुए या घायल बंदर के पास न जाएं।
-बंदरों को खाना न दें।
-अगर बंदर आपकी गाड़ी (खासकर दो पहिया) से टकरा जाए, तो गाड़ी न रोकें।
-बंदर अगर आपको देखकर 'खो-खो' की आवाज करे तो डरें नहीं। वहां से शांति से निकल जाएं।

बंदर को कभी न मारें. बल्की डंडे को ज़मीन पर पटकें, जिससे वो आपके घर या बगीचे से बाहर चला जाएगा। हालांकि सब मानते हैं कि इन सुझावों में नया कुछ नहीं है। ये बहुत ही बेसिक बात है, लेकिन सवाल ये है कि एडवाइजरी जारी करने की नौबत ही क्यों आई? सरकार इतनी बेबस क्यों है।

Why government is helplessness dealing with monkeys
monkey shimla
बंदरों के उत्पात रोकने के उपाए
ऐसा नहीं है कि बंदरों को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर कोशिशें नहीं हुईं। जुलाई 2014 में राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में तत्कालीन शहरी विकास मंत्री एम. वेंकैया नायडु ने बंदरों से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में जानकारी दी थी।

उन्होंने बताया था कि एनडीएमसी ने चालीस प्रशिक्षित लोगों को बंदर भगाने का काम सौंपा है। मानव लंगूर कहलाने वाले ये लोग मुंह से लंगूर की आवाज निकालकर बंदर भगाते हैं। नायडु ने बताया था कि एनडीएमसी बंदरों को भगाने के लिए रबर की गोलियों का भी इस्तेमाल कर रही है। इससे पहले 2010 में बंदरों से निपटने के लिए असली लंगूरों को रखा गया था। कहते हैं कि इन लंगूरों को विशेष ट्रेनिंग दी गई थी। लेकिन इन लंगूरों को लाने वाले इन्हें रस्सी से बांधकर लाते थे।

पशु अधिकार कार्यकर्ता और तब विपक्षी पार्टी बीजेपी की नेता मेनका गांधी ने इसपर आपत्ति की थी। इसके बाद पर्यावरण और वन मंत्रालय ने दिल्ली और केंद्र के मंत्रियों को आगाह किया कि लंगूरों को रस्सी में बांधकर उनसे काम करवाना गैरकानूनी है। 

दरअसल, वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के तहत लंगूर एक संरक्षित प्रजाति है, जिसे खरीदा, बेचा या काम नहीं करवाया जा सकता। मेनका गांधी के विरोध के बाद शहरी विकास मंत्रालय ने लंगूर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

Why government is helplessness dealing with monkeys
monkey shimla
दिल्ली ही नहीं, देश के दूसरे इलाकों में भी आतंक
दिल्ली के अलावा देश के कई दूसरे इलाके भी बंदरों के आंतक की चपेट में हैं। आगरा में भी बंदरों ने लोगों को परेशान कर रखा है। छोटी-मोटी खाने की चीजे छीनने वाले बंदरों ने मंगलवार को एक मां की गोद से 12 दिन के बच्चे को छीन लिया। खबरों के मुताबिक बंदर बच्चे को गर्दन से पकड़कर भागा जिसकी वजह से बच्चे की मौत हो गई।


ताजमहल में आए पर्यटकों को काटने की खबरें भी अक्सर आती हैं। उत्तर भारत के पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में तो बंदर इतनी बड़ी समस्या है कि हर चुनाव में ये बड़ा मुद्दा होता है। नेता इस मुद्दे के दम पर वोट मांगते नज़र आते हैं। वो बंदरों की समस्या से निपटने के चुनावी वादे करते हैं।

वहां बंदरों से सबसे ज्यादा परेशान किसान है। बंदर खेतों में खड़ी फसलों को बर्बाद कर देते हैं, जिससे परेशान होकर कई किसानों ने खेती छोड़ने का फैसला कर लिया। साल 2014 में आई कृषि विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक बंदरों की वजह से फसलों को सालाना 184 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

बंदरों को मारने पर रखा इनाम
हिमाचल सरकार ने 2010 में बंदरों को देखते ही मारने का आदेश दिया था. लेकिन हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बाद में इस आदेश पर रोक लगा दी थी.

हाल में हिमाचल में बंदरों को मारना फिर कानूनन मान्य कर दिया गया है. इन्हें मारने पर इनाम भी रखा गया. हालांकि लोग धार्मिक कारणों समेत कई वजहों से अब भी इन्हें मारना नहीं चाहते.

 

Why government is helplessness dealing with monkeys
monkey in shimla
बंदरों के सामने क्यों है बेबस सरकार ?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने पशु अधिकार कार्यकर्ता और वकील नरेश कादयान से बातचीत की। उन्होंने इस समस्या का जिम्मेदार इंसान को ही बताया। नरेश कहते हैं "इंसान ने जानवरों के घर में घुसपैठ कर दी है, जंगलों को तबाह कर दिया है। जो जंगल हैं वहां फलदार पेड़ नहीं बचे हैं, यही वजह है कि बंदर इंसानी बस्ती की ओर आ गए हैं। "

"अब अगर बंदरों को इंसानी बस्ती से निकालना है तो, उनके लिए नेचुरल हैबिटेट विकसित करना होगा। उनके लिए फल वाले पेड़ लगाने होंगे, पानी की व्यवस्था करनी होगी। ये सब करने में बहुत वक्त लगेगा। दिल्ली की असोला भट्टी को ऐसी ही जगह बनाने के कोशिश की भी गई थी, लेकिन वो प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया।"

असोला भट्टी में बनाए गए हैबिटेट को इंसानी बस्ती से अलग करने के लिए 45 फीट लंबी दीवार बनाई गई थी। दिल्ली के करीब 1700 बंदरों को पकड़कर यहां छोड़ा भी गया था, लेकिन पर्याप्त सुविधाएं नहीं होने की वजह से वो दीवार लांघकर दोबारा इंसानी बस्ती की ओर चले गए। तो क्या कोई और तरीका है जिससे कम वक्त में बंदरों को शहरों-गावों से दूर किया जा सके?

इसपर नरेश कादयान कहते हैं एक ही तरीका है। सबसे पहले तो बंदरों को वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 से बाहर निकालना होगा। दरअसल बंदर इस एक्ट के तहत एक संरक्षित प्राणी है। उनका कहना है कि जो बंदर इंसानी बस्ती में पले-बढ़े होते हैं, वो दिखने में तो जंगली जानवर लगते हैं लेकिन उनमें वाइल्ड कैरेक्टर नहीं होते। इसलिए उन्हें संरक्षण की श्रेणी से बाहर कर देना चाहिए।

दरअसल ये एक्ट कहता है कि इसके तहत आने वाले जानवर को इलाके के मुख्य वन्य प्राणी संरक्षक की इजाजत से ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। नरेश कहते हैं कि अगर दिल्ली से बंदरों को भोपाल ले जाना होगा तो पहले दिल्ली के मुख्य वन्य प्राणी संरक्षक से इजाजत लेनी होगी और फिर भोपाल के संरक्षक से। भोपाल का संरक्षक बंदरों को अपने यहां छोड़ने की इजाजत देगा ही नहीं।

तो ऐसे में समस्या हल तभी होगी जब एक्ट से बंदर को बाहर कर दिया जाएगा। "संसद की एजवाइजरी, असली लंगूर, मानव लंगूर जैसे तरीके किसी काम के नहीं हैं। बंदरों की समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल करना होगा।"

बंदर अक्सर समूह में होते हैं। समूह का एक किंग होता है। वो किंग हमेशा पूछ उठाकर चलता है। बाकी चार-पांच बंदरियां और बच्चे होते हैं। आप किंग बंदर की पहचान करें। उसे वहां से हटाएंगे तो पूरा समूह खुद-ब-खुद हट जाएगा।

बंदरों का धार्मिक कनेक्शन
हिंदू धर्म में बंदरों को भगवान हनुमान का रूप माना जाता है। अक्सर लोग मंदिरों के इर्द-गिर्द झुंड में जमा बंदरों को केले और मुंगफली खिलाते दिखते हैं। कई बार यही लोग बंदरों पर कार्रवाई का भी विरोध करते हैं। नरेश कहते हैं कि बंदर अब लोगों से छीन-छीन कर खाने लगे हैं।

जो जानवर प्राकृतिक तौर पर फल और पत्ते खाता है, वो आज पका खाना, थैली बंद सामान जैसी चीजें खा रहा है। "इंसान और जानवर के इस टकराव को रोकने के लिए इंसानों को ही कोशिशें करनी होगी।"
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed