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Manipur Security Alert: म्यांमार से आतंकियों का मणिपुर में आना कितना खतरनाक?

Mon, 23 Sep 2024 03:55 PM IST
Amiya bhushan अमिया भूषण
Updated Mon, 23 Sep 2024 03:55 PM IST
सार

मणिपुर अस्थिर और अशांत है। दो समुदायों के आपसी विवाद से उभरी हिंसा का परिणाम है कि सुरक्षा बल आतंकी घुसपैठ की सूचना दे रहे हैं। हालिया घटनाओं का क्रम भले एक सितंबर से शुरू है। किंतु यह हिंसा चक्र पिछले वर्ष से अनवरत् जारी है।

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Manipur Security Alert: Intel Of 900 Kuki Militants Enters From Myanmar In Manipur
मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है। आवश्यकता प्राथमिकताओं के साथ इसके निराकरण की है। - फोटो : एएनआई

विस्तार

मणिपुर इन दिनों फिर एक बार खबरों में है। म्यांमार से तरफ से करीब नौ सौ आतंकियों के प्रवेश की खबरें चर्चा में है जबकि राजधानी इम्फाल में दिन- दहाड़े एक कैबिनेट मंत्री के सहयोगी का अपहरण हो गया है। राज्य के पूर्व मुख्य सचिव के घर पर गोलीबारी हुई है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री के घर से लेकर मंदिर एवं त्योहार इत्यादि सभी इससे निशाने पर हैं। दरअसल, ये सारा घटनाक्रम दो समुदायों के आपसी विवाद से उभरी हिंसा का परिणाम है। हालिया घटनाओं का क्रम भले एक सितंबर से शुरू है।

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एक तरह से देखा जाए तो यह हिंसा चक्र पिछले वर्ष से अनवरत् जारी है। इसे लेकर देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस केंद्र सरकार पर लगातार आक्रामक है। सवालों और आरोपों की यह झड़ी गृहमंत्री अमित शाह के एक वक्तव्य के बाद से कहीं अधिक बढ़ी है।
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दरअसल, मोदी सरकार के सौ दिन होने के उपलक्ष्य में गृहमंत्री मीडिया से मुखातिब थे। इस दौरान मणिपुर का जिक्र करते हुए उन्होंने बातचीत से समाधान की बात की है। वहीं जारी हिंसा को आतंकवाद नहीं अपितु जातीय हिंसा करार दिया है। इसके साथ ही स्थिति के नियंत्रण में होने का दावा करते हुए शांति बहाली के अपने संकल्पनाओं को भी पुनः दुहराया है।
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भारत म्यांमार सीमा पर तारबंदी का भी ब्यौरा दिया गया है। किंतु कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व अनुसार प्रधानमंत्री मोदी का अशांत मणिपुर में एक भी दौरा न करना जारी हिंसा और गतिरोध का सबसे बड़ा कारण है।

बहरहाल, सियासत से इतर की बात करे तो मणिपुर की हालात वाकई चिंतापूर्ण है। संभवतः इसी की अभिव्यक्ति आरएसएस प्रमुख के वक्तव्य में थी। लोकसभा चुनाव उपरांत संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसको लेकर एक टिप्पणी की थी, तब उन्होंने कहा था-

मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है। आवश्यकता प्राथमिकताओं के साथ इसके निराकरण की है।


दरअसल, पिछले साल मई से जारी हिंसा की आग ने मणिपुर में जान माल का व्यापक नुकसान किया है। बात तत्कालीन घटनाक्रम कि करें तो यह सिलसिला ड्रोन बम हमलों के बाद शुरू हुआ है। एक सितंबर से कुकी आतंकी समूहों ने सुनियोजित धमाकों, हमलों की नई शुरुआत की है। ये हमले राज्य के पर्वतीय जिले से लेकर राजधानी के निकटवर्ती जनपदों तक हुए हैं। वहीं राजधानी इम्फाल भी इसके जद में है।

सर्वाधिक दुखद बात ये है कि घातक हमले राजधानी इम्फाल के आसपड़ोस से हो रहे हैं। इस गणेश चतुर्थी को ऐसे ही हमले में मोइरांग अवस्थित एक मंदिर के पुजारी की मौत हो गई थी। वहीं मंदिर भी ध्वस्त हो गया। पुराने घटनाक्रमों को छोड़ भी दें तो भी हालिया घटनाएं बेहद दुखांत हैं। विष्णुपुर से लेकर जिरीबाम तक यह हिंसा जारी है। ये स्थान ऐतिहासिक होने के साथ आधारभूत ढांचा के विकास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

जिरीबाम मणिपुर रेल परियोजना का एक महत्वपूर्ण पड़ाव के साथ ही प्रखर स्वतंत्रता सेनानी रानीमां गाइदिन्ल्यू का जन्म स्थान है। वे इस क्षेत्र के नागा जनजाति से आती थी। ऐसे में यहां हो रहे हिंसा के नाते नागा समुदाय के भी इसमें सहभागी हो जाने की प्रबल आशंका है। विदित् हो कि ये समुदाय अब तक इस हिंसाचक्र से पूर्णतया पृथक रहा है। ऐसे ही विष्णुपुर में हो रहे ड्रोन हमले सेना संग्रहालय के लिए भी एक खतरा है। यहां आजाद हिंद फौज के स्मृतिचिन्ह संग ऐतिहासिक पुरातन विष्णु मंदिर समूहों के भी नष्ट होने की आशंका है।

दरअसल, राज्य में जारी हिंसा के बीच कुकी आतंकी संगठन सरेआम सैन्यबलों की वेशभूषा एवं कैस्पिर सैन्य वाहन के साथ घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे में राजधानी इम्फाल में भी आक्रोश अपने चरम पर है, जिसकी परिणति राज्यपाल के अधिकृत निवास पर हमले के रूप में सामने है।

वहीं मैतेई समुदाय के युवा एवं महिलाओं द्वारा हो रहे रोषपूर्ण प्रदर्शन भी कई बार हिंसक झड़पों में बदल जा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई बार नागरिक तो कई मौकों पर सुरक्षा बल के जवान घायल हो जा रहे हैं। इस नाते सरकार ने युवाओं से ऐसी रैलियों से दूर रहने को कहा है। बात वर्तमान घटनाक्रम कि करें तो इसे समझने के लिए हिंसा के मूल कारणों को जानना बेहद जरूरी है।

मणिपुर में हिंसा का सिलसिला पिछले वर्ष 3 मई को शुरू हुआ था। हिंसक घटनाक्रम के तत्कालीन कारण के तौर पर उच्च न्यायालय द्वारा मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने से संबंधित एक निर्णय को कारण बताया गया। राज्य के तीन में से दो समुदाय नागा एवं कुकी पूर्व से ही अनुसूचित जनजाति आरक्षण के लाभार्थी हैं।

यह पूर्वोत्तर की विशेष परिस्थिति एवं मणिपुर के कुछेक पुराने कानूनों के नाते भी अत्यंत आवश्यक है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के त्रिपुरा राज्य में भी त्रिपुरी जाति को ऐसे ही विशेष परिस्थितियों का हवाला देते हुए आरक्षित वर्ग में स्थान दिया गया है। जनजातीय दर्जा यहां सरकारी सेवा के साथ ही कर मुक्त होने का भी एक अस्त्र है।

Manipur Security Alert: Intel Of 900 Kuki Militants Enters From Myanmar In Manipur
मणिपुर में सुरक्षाबल अब भी अलर्ट मोड पर हैं। - फोटो : अमर उजाला

वहीं मणिपुर में यह मैतेई समुदाय को सम्पूर्ण राज्य में कही भी बसने का अधिकार प्रदान कर सकता है। वर्तमान के भेदभाव पूर्ण कानून के नाते ये अपने ही गृह प्रदेश में सिवाय इम्फाल घाटी के कही भी संपत्ति का क्रय विक्रय नही कर सकते हैं। जबकि ये आधी आबादी से कही अधिक है वही इस भूमि के सबसे पुराने निवासी भी मैतेई ही है। विदित हो की इम्फाल घाटी कुल क्षेत्रफल का करीब दस प्रतिशत है जिस पर जनसंख्या वृद्धि एवं घनत्व में परिवर्तन का भी अतिशय दबाव है।

यहां राजशाही एवं ब्रिटिश शासन के दौरान कुकी जनजाति एक छोटे से समुदाय के तौर पर मणिपुर के पहाड़ों में बसा करती थी। किंतु स्वतंत्रता उपरांत अदूरदर्शिता के नाते गलत तरीकों से नागरिकता लेकर सरकारी सुविधाओं के लाभार्थी कुकी लोगों की कुल वृद्वि दर करीब दो सौ प्रतिशत तक हो गयी है। म्यांमार से आने वाले इस समुदाय के ऊपर मादक पदार्थों के कारोबार से लेकर वन भूमि पर अवैध कब्जे तक के आरोप है।

वहीं पूरा राज्य नशा कारोबार की जद में है और इस अवैध व्यापार के संचालन में कुकी समुदाय की भूमिका प्रमुख और प्रभावी है। अतएव मैतेई आरक्षण के मुद्दे पर कुकी समुदाय द्वारा राज्यव्यापी हिंसक प्रदर्शन शुरू हुए। जिसके बाद राज्य सरकार ने न्यायालय के दिशानिर्देशानुसार इस मुद्दे को केंद्र के पास भेज दिया था।
 

दरअसल यह पूरा मसला गंभीरता पूर्वक विचार का भी है। वही मैतेई आरक्षण यहां के किसी दूसरे समुदाय के हितों पर चोट का मसला नहीं है। बल्कि यह विसंगतिपूर्ण कानून की मार झेल रहे आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर एक समुदाय विशेष के समुचित विकास का मुद्दा भर है। जिस पर सहानुभूति पूर्वक विचार की जरूरत थी। किंतु यहां समुदाय विशेष के हित ने सामुदायिक विद्वेष दुर्भावना का रूप ले लिया। कुकी समुदाय के बढ़ते अतिशय आबादी नाते भी यहां का वातावरण भय एवं आक्रोश से भरा है। 


इसी नाते मैतेई समुदाय द्वारा राष्ट्रीय नागरिक जनगणना वर्ष को सन् 1951 से ही करने की बात की जाती रही है। दरअसल यहां की जनसंख्या स्वरूप पूर्णतया बदल चुका है। यह भी विवादों का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा सुसंस्कृत वैष्णव मैतेई हिंदूओं के आसपास कुकी इसाई चर्च द्वारा जारी आक्रामक गतिविधि एवं धर्मांतरण संबंधित उपक्रम भी इसका एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है। ऐसे में इस हिंसा चक्र के प्रारंभ होने की पूरी संभावना थी। किंतु मणिपुर सरकार इसे रोक पाने में पूर्णतया असफल सिद्ध हुई है।

कुकी बनाम मैतेई का यह विवाद इतना बढ़ा की सत्तर हजार से कही अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। लोकसभा चुनावों की घोषणाओं के बाद से हिंसा महज छिटपुट वारदातों तक सीमित थी। किंतु राहुल गांधी के जुलाई दौरे के बाद से ये पुनः सुलगने लगा है।

दरअसल, इस यात्रा के दौरान उन्होंने केवल एक पक्ष विशेष कुकी समुदाय के साथ संवाद किया। वहीं स्वभाव के अनुरूप उनके द्वारा बोली गई गैरजिम्मेंदारी पूर्ण बातों ने भी समुदायों के बीच वैमनस्यता बढ़ाने का काम किया है, जिसका असर आने वाले उत्तर पूर्व के कई राज्यों में देखने को मिलेगा।

मैतेई हिंदुओं के संग जहां मणिपुर के पहाड़ों से लेकर मिजोरम एवं मेंघालय में पुनः उत्पीड़न शुरू होगा। वहीं असम के मैतेई बाहुल्य इलाके से लेकर मणिपुर के इम्फाल घाटी तक में इसकी कड़ी प्रतिक्रिया दिखेगी।

दरअसल, मैतेई समुदाय एक सुसंस्कृत संघर्षशील एवं वीर जाति है, जिसका वर्तमान लिखित इतिहास ही ई.सन् से प्रारंभ होता है। इन्होंने म्यांमार पर शासन किया है। चीन की विशाल सेना को सन् 1631 में युद्ध भूमि पर बुरी तरह हराया है। यही नहीं पराजय के बावजूद इन्होंने आंग्ल मणिपुर युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। वहीं इतिहास के बुरे वक्त में इनकी महिलाओं ने नुपी लेन युद्ध द्वारा अंग्रेजों से लेकर देशी व्यापारियों तक के खाट खड़े किए है।

ये वही लोग हैं जिनके दम पर आजाद हिंद फौज ने यहां स्वतंत्र भारत की सत्ता कायम की थी। यही नहीं यहां आईएनए का सैन्य मुख्यालय भी बना था। इसके साथ ही यह पूर्वोत्तर भारत में स्वतंत्रता पूर्व चले हिंदी प्रचार अभियान का शुरुआती केंद्र भी रहा है।

आखिर क्या कारण है कि यह समुदाय भी शासन व्यवस्था के खिलाफ हो चला है। एक तो राज्य सरकार दूसरा केंद्रीय गृह मंत्रालय का ढुलमुल रवैया कहीं न कहीं मणिपुर के इन हालात के लिए जिम्मेदार है। गृह मंत्रालय द्वारा मणिपुर समस्या को बेहद हल्के में लेना भी इसके भयावह होने का एक कारण नजर आता है।

कुकी आतंकी संगठनों संग प्रतिबंधित मैतेई संगठन भी माहौल बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। पुलिस बलों से लूटे गए हथियार अब भी इनके पास भी है, जिसके बल पर ये भी कुकी आतंकी संगठनों से हिंसक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। पिछले एक वर्ष में केवल कुकी संगठनों द्वारा ही चार हजार शस्त्रों की लूट हुई है।

ये हथियार सरकारी शस्त्रागार अथवा सुरक्षाकर्मियों से लूट के हैं। इस बीच नागरिक मैतेई संगठनों के निशाने पर प्रदेश के राजभवन संग प्रतिनियुक्त पर भेजे गए सुरक्षा सलाहकार हैं। इसके उलट इस हिंसा चक्र को रोक पाने में पूर्णतया असफल राज्य के मुखिया, मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह इनके निशाने पर बिल्कुल भी नहीं हैं।

इनकी एक प्रमुख मांगों में मुख्यमंत्री के अधीन एकीकृत कमान एवं असीमित अधिकार देने की है। वहीं मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को गुमराह करने एवं दबाब बनाने का भी प्रयास किया है। इसे उनके हालिया निर्णय एवं वक्तव्यों से भली-भांति समझा जा सकता है। इसमें वे पूरी तरह सफल भी रहे हैं, जिस नाते फिलहाल यहां नेतृत्व परिवर्तन अथवा राष्ट्रपति शासन की कोई संभावना दिख नहीं रही है। बात समस्याओं की करे तो तमाम विवादास्पद संगठन इस समय शांति एवं सामुदायिक हितों के नाम पर सड़कों पर है।

आमजनों की आर में मैतेई संगठन राजधानी इम्फाल की सड़कों पर हल्ला मचा रहे है। वही कुकी संस्थायें राहत बचाव संग सुरक्षा बलों द्वारा आतंकी गतिविधियों पर रोक हेतु जारी खोजी मुहिम के बीच अवरोध बन कर खड़ी है। जबकि चर्च एवं विदेशी शक्तियों से संबद्ध पृथकतावादी मैतेई संगठन भी कुकी आतंकी संगठनों से कतई कमतर नही है।

पिछले कुछ वर्षों से अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे ये संगठन आखिर अचानक फिर कैसे उठ खड़े हुए है। इसके लिए कुछ परिस्थितियां तो कुछ वर्तमान मुख्यमंत्री का नाकारापन भी दोषी है। इस नाते राज्य में आतंकी एवं पृथकतावादी संगठन के लिए उठ खड़े होने का यह एक दूसरा अवसर है। यह उनके फिर से फलने फूलने के लिए भी एक आदर्श स्थिति है। ऐसे में मणिपुर की तमाम परिस्थितियों का विचार करते हुए केंद्र सरकार की पहल के साथ कुछेक बड़े एवं कड़े फैसले लेने की आवश्यकता है।

इसमें सर्वाधिक आवश्यक है मणिपुर में सक्रिय हर आतंकी संगठन संग जारी शांति समझौतों को रद्द किया जाए। पृथकतावादी संगठनों को भी प्रतिबंध की श्रेणी में लाया जाए। वहीं शांति एवं राजव्यवस्था के विरुद्ध खड़े हर किसी पर बिना किसी किंतु परंतु के कठोर कारवाई होनी चाहिए।

इसके साथ ही यथाशीघ्र म्यांमार की खुली सीमा पर तारबंदी की गति को बढ़ाने तथा एनआरसी को भी यहां प्रभावी किए जाने की आवश्यकता है। वैसे ये तारबंदी उत्तर पूर्वी राज्यों में एक संवेदनशील विषय भी है। अतएव इस मुद्दे पर संबंधित प्रांतीय सरकारों संग कुकी नागा एवं मिजो जनजातीय समाज को भी विश्वास में लेने की आवश्यकता है।

वहीं मणिपुर में कुकी एवं मैतेई समुदायों के बीच पहल द्वारा मैतेईयों के अनुसूचित जनजाति दर्जे को लागू करने तथा एनआरसी वर्ष के निर्धारण तिथि को तय किये जाने की जरूरत है। तभी मणिपुर में चिर स्थायी शान्ति आएगी। अन्यथा ये विवाद चलता ही रहेगा।

पूर्वोत्तर भारत के माध्यम से पूर्वी एशियाई देशों संग सरोकार कारोबार एवं इस सम्पूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र के समुचित विकास की सोच भी बिना मणिपुर में शांति एवं सदभाव के पूरी नही हो पाएगी। यदि ऐसा नही होता है तो निश्चित ही लुक ईस्ट एक्ट ईस्ट की नीति भी असफल सिद्ध होगी। वहीं यह देश के आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा एवं उदाहरण बनकर रह जाएगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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