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शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही और पाठ्यक्रम विवाद

सार

कक्षा आठ के विद्यार्थियों के समक्ष यदि न्यायपालिका को भ्रष्टाचार के उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके साथ उसकी संवैधानिक भूमिका, नागरिक अधिकारों की रक्षा में योगदान तथा सुधारात्मक प्रयासों का उल्लेख भी अनिवार्य है।

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Accountability of educational institutions and curriculum controversy
एनसीईआरटी किताब विवाद - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

हाल के समय में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संबंधी उल्लेख को लेकर उत्पन्न विवाद ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और उत्तरदायित्व पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।



इस प्रकरण में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाना तथा केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण माँगा जाना यह संकेत करता है कि पाठ्यक्रम निर्माण अब केवल शैक्षणिक प्रक्रिया भर नहीं रह गया है, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं और संस्थागत संतुलन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय बन चुका है।

मूल प्रश्न न्यायपालिका की आलोचना का नहीं, बल्कि उसकी प्रस्तुति की संतुलित संरचना का है। लोकतंत्र में किसी भी संस्था की आलोचनात्मक समीक्षा स्वाभाविक और आवश्यक है; किंतु जब प्रस्तुति एकांगी हो, संदर्भ अपूर्ण हों और विद्यार्थियों की आयु-संबंधी संवेदनशीलता की उपेक्षा की जाए, तब समस्या उत्पन्न होती है।

कक्षा आठ के विद्यार्थियों के समक्ष यदि न्यायपालिका को भ्रष्टाचार के उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके साथ उसकी संवैधानिक भूमिका, नागरिक अधिकारों की रक्षा में योगदान तथा सुधारात्मक प्रयासों का उल्लेख भी अनिवार्य है। अन्यथा आलोचना शिक्षण का उपकरण न रहकर पूर्वाग्रह-निर्माण का माध्यम बन सकती है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य इस विमर्श को और गहराई प्रदान करता है। सन् 1975 में घोषित आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्न उठे थे। विशेषकर ‘जिला दंडाधिकारी जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ प्रकरण में दिए गए निर्णय की व्यापक आलोचना हुई।

यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका भी त्रुटिहीन नहीं है और उसकी समीक्षा संभव है। किंतु समय के साथ न्यायपालिका ने अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की और अपनी संस्थागत विश्वसनीयता को सुदृढ़ किया। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आलोचना का स्वर संतुलित ऐतिहासिक संदर्भ के साथ होना चाहिए।

किशोरावस्था में निर्मित धारणाएँ दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ती हैं। यदि किसी एक संस्था की छवि केवल नकारात्मक संदर्भ में प्रस्तुत की जाती है, तो विद्यार्थियों के मन में व्यापक संस्थागत अविश्वास जन्म ले सकता है। यहाँ यह प्रश्न भी विचारणीय है कि यदि न्यायपालिका को लेकर संशय उत्पन्न होता है, तो क्या विद्यार्थियों के मन में कार्यपालिका के आचरण और कार्यशैली को लेकर भी प्रश्न नहीं उठेंगे?

जब बच्चे पढ़ते हैं कि शासन की किसी संस्था में भ्रष्टाचार संभव है, तो वे स्वाभाविक रूप से यह सोच सकते हैं कि क्या प्रशासनिक तंत्र, मंत्रालयों या सरकारी विभागों में भी ऐसी स्थितियाँ विद्यमान हैं। इस प्रकार असंतुलित प्रस्तुति पूरे शासन-तंत्र के प्रति शंका को जन्म दे सकती है।

शिक्षा का उद्देश्य न अंधविश्वास उत्पन्न करना है और न अंध-अविश्वास, बल्कि विवेकपूर्ण समझ विकसित करना है, जिससे विद्यार्थी संस्थाओं की भूमिका, सीमाएँ और जवाबदेही को संतुलित दृष्टि से देख सकें।

उच्च शिक्षा के स्तर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। केवल दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन तथा सतत निगरानी भी आवश्यक है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को अनेक विश्वविद्यालयों ने अपनाया है; किंतु व्यवहारिक स्तर पर चौथे वर्ष की संरचना, शोध की गुणवत्ता तथा शैक्षणिक अनुशासन को लेकर प्रश्न उठे हैं। यदि नीतियों के क्रियान्वयन में स्पष्टता और कठोरता का अभाव रहेगा, तो सुधार की प्रक्रिया औपचारिकता तक सीमित रह सकती है।

पाठ्यक्रम विवादों का इतिहास भी नया नहीं है। सन् 2005 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा लागू किए जाने के पश्चात इतिहास और सामाजिक विज्ञान की सामग्री को लेकर व्यापक बहसें हुई थीं।

विभिन्न समूहों ने वैचारिक संतुलन और निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि पाठ्यक्रम निर्माण एक संवेदनशील और बहुस्तरीय प्रक्रिया है, जिसमें पारदर्शिता, विशेषज्ञता और उत्तरदायित्व—इन तीनों का समन्वय अनिवार्य है।

इस विषय पर देश के नेतृत्व द्वारा गंभीरता व्यक्त किया जाना शिक्षा तंत्र की व्यापक जवाबदेही की ओर संकेत करता है। जब यह प्रश्न उठता है कि पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा और निगरानी किस स्तर पर होती है, तो यह केवल एक संस्था की चर्चा नहीं रह जाती, बल्कि संपूर्ण शैक्षिक संरचना की पारदर्शिता से जुड़ जाती है। शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक आधार-निर्माण की प्रक्रिया भी है।

अतः आवश्यक है कि मतभेदों और बहसों को संस्थागत सुधार के अवसर के रूप में देखा जाए। पारदर्शी समीक्षा-तंत्र, उत्तरदायी विशेषज्ञ समितियां और प्रभावी निगरानी-व्यवस्था शिक्षा प्रणाली को अधिक सुदृढ़ बना सकती हैं।

निष्कर्षतः, शिक्षा व्यवस्था में सुधार अपरिहार्य है, परंतु वह संतुलन, पारदर्शिता और स्पष्ट जवाबदेही पर आधारित होना चाहिए। पाठ्यक्रम केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण-निर्माण का माध्यम है।

यदि इसमें असंतुलन होगा, तो उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों की लोकतांत्रिक समझ पर पड़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि शैक्षिक संस्थानों और संबंधित प्राधिकरणों के बीच समन्वित तथा उत्तरदायी तंत्र स्थापित किया जाए।

बच्चों का विश्वास उनकी बुनियादी शिक्षा व्यवस्था, उसकी पाठ्य-सामग्री और वहाँ अध्यापन करने वाले शिक्षकों पर आधारित होता है। यदि यह विश्वास सुदृढ़ और सकारात्मक बना रहता है, तो वही राष्ट्र की स्थायी प्रगति का आधार बनता है।

भारत भी शिक्षा में सुधार, अनुशासन और उत्तरदायित्व के माध्यम से ही आगे बढ़ सकता है। यही हमारी सांस्कृतिक तथा सामाजिक मजबूती का वास्तविक आधार है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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