शादी-ब्याह हो या पूजा-पाठ महिलाएं चाव से रेशम साड़ी पहनती हैं। हर किसी की अलमारी में सिल्क की साड़ी और कुर्ता होता ही है। मगर इन दिनों सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है कि जिस रेशम से बने कपड़े को पहनकर लोग शुभ कार्यों में हिस्सा लेते हैं, वह दरअसल नाले के गंदे पानी से बनता है। क्या यह सच है?
जिस रेशम की साड़ी को पहन पूजा करती हैं आप, क्या वो नाले के पानी से बनता है?
रेशम कीड़ों से बनता है। मादा कीट एक बार में सैकड़ों अंडे देती है। इन अंडों से कैटरपिलर बनते हैं। इन्हें शहतूत के पत्तों पर रखा जाता है। शहतूत के पत्ते खाकर ये बड़े होते हैं और धीरे-धीरे लार से अपने ईर्द-गिर्द धागों से बना घर बना लेते हैं जिन्हें ककून कहा जाता है। ककून पूरी तरह तैयार होने पर उसे उबाल दिया जाता है। इसके बाद धागों को अलग-अलग कर डाई किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान ककून के अंदर मौजूद कीड़ा मर जाता है।
भारत के किसान बारिश और नदी-नालों के पानी से ही खेती पर निर्भर हैं। पानी की कमी की वजह से बेंगलुरु के रहने वाले मुनीराजू शहतूत की खेती करने के लिए नाले के पानी का इस्तेमाल करते हैं। इसी शहतूत के पत्तों पर रेशम के कीड़ों को पाला जाता है। इन्हीं पत्तों को खाकर रेशम के कीड़े बड़े होते हैं और ककून बनाते हैं। इस तरह रेशम के धागों को बनाने की प्रक्रिया में नाले के गंदे पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
पानी की कमी की वजह से कई किसान नाले के पानी को अपने खेतों में डायवर्ट कर देते हैं। यह पानी जहरीला है। लिहाजा जिन खेतों को इस तरह के पानी से सींचा जाता है, वहां उगने वाले फल-सब्जियों को खाने से इंसानों को कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं। यही वजह है कि मुनीराजू ने फैसला किया कि वह लोगों की सेहत के साथ और खिलवाड़ नहीं करेगा। लिहाजा, उसने खाने वाली चीजें उगाने की जगह शहतूत की खेती करने का फैसला किया।