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घर बैठे कीजिए भगवान जगन्नाथ के दर्शन, इस सैंड आर्टिस्ट ने अपने हुनर से कर दिखाया है ऐसा कमाल
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Updated Sat, 14 Jul 2018 12:52 PM IST
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Jagannath Rath Yatra
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विश्व प्रसिद्ध सैंड आर्टिस्ट ने आपके लिए कुछ ऐसा कर दिखाया है कि अब आप घर बैठे भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर सकते हैं। जी हां, इस सैंड आर्टिस्ट का नाम सुदर्शन पटनायक है। इन्होंने अपनी कला का बेहतरीन जगह इस्तेमाल किया है। लाखों लोगों की आस्था को ध्यान में रखकर इन्होंने ऐसी कलाकृति बनाई की जिसे देखकर आप भी चकित हो उठेंगे। सुदर्शन पटनायक ने अपने हाथों के जादू से साक्षात भगवान जगन्नाथ की कलाकृति बनाई है। आज के दिन सभी भगवान जगन्नाथ के दर्शनाभिलाषी तो होंगे ही। दरअसल, आज ही के दिन से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का आरंभ होता है।
sand art
जी हां, पुरी रथ यात्रा 14 जुलाई यानी शनिवार से शुरू हो गई है। पुरी हिंदुओं का एक पवित्र धाम है, जो चार धामों में शामिल है। विश्व प्रसिद्ध सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक ने अपनी कला का उम्दा प्रदर्शन करते इस धार्मिक माहौल में पुरी बीच पर जाकर भगवान जगन्नाथ की सुंदर तस्वीर उकेरी है। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहेंगे कि रथयात्रा में मंदिर से जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रहों की तीन विशाल रथों पर सवारी निकलती है, जिनको श्रद्धालुओं के हजारों हजार हाथ खींच कर वहां से तीन किलोमीटर दूर रानी गुंडिचा के मंदिर तक पहुंचाते हैं।
रथयात्रा वहां पहुंचकर सात दिनों तक विश्राम के बाद भगवान जगन्नाथ की सवारी मंदिर लौटती है। रथयात्रा के इस अवसर पर बेहद भीड़ होती है। ऐसे में ये संभव नहीं हो पाता कि हरकोई भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर पाए। दूसरा, जो लोग ओडिशा से बाहर रह रहे हैं उनके लिए भी ये संभव नहीं रहता। इसबार आपको जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने हो तो एक बार सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक की कलाकृति जरूर देखनी चाहिए। इनके दर्शन तो हर आम आदमी आसानी से कर सकता है। पुरी के जगन्नाथ धाम को नीलांचल धाम, श्रीक्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र, शंख क्षेत्र आदि से भी जाना जाता है।
रथयात्रा वहां पहुंचकर सात दिनों तक विश्राम के बाद भगवान जगन्नाथ की सवारी मंदिर लौटती है। रथयात्रा के इस अवसर पर बेहद भीड़ होती है। ऐसे में ये संभव नहीं हो पाता कि हरकोई भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर पाए। दूसरा, जो लोग ओडिशा से बाहर रह रहे हैं उनके लिए भी ये संभव नहीं रहता। इसबार आपको जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने हो तो एक बार सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक की कलाकृति जरूर देखनी चाहिए। इनके दर्शन तो हर आम आदमी आसानी से कर सकता है। पुरी के जगन्नाथ धाम को नीलांचल धाम, श्रीक्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र, शंख क्षेत्र आदि से भी जाना जाता है।
sand art
जगन्नाथ यात्रा की कहानी तो सुनी होगी आपने...
कथा प्रचलित है कि सतयुग में अवंती नगरी के राजा इंद्रद्युम्न विष्णु भगवान के परम भक्त थे। इसलिए इंद्रद्युम्न अपने राज्य में विष्णु भगवान का विशाल मंदिर बनवाना चाहते थे। जहां वे विष्णु के नए रूप को प्रतिष्ठापित करना चाहते थे। उन्हें पता चला कि नीलगिरी के घने जगलों में आदिवासी शवर विष्णु के नीलमाधव विग्रह की पूजा करते हैं। इसलिए राजा नीलमाधव की मूर्ति का पता लगाने दरबारियों को रवाना करते हैं। काफी ढूंढने पर भी उनको सफलता नहीं मिलती। इस पर राजा दरबार से विद्यापति नामक पंडित को रवाना करते हैं। नीलगिरी के वनों में उनको शवर नरेश विश्वावसु की पुत्री ललिता मिलती है जिससे वे प्रेम करने लगते हैं। इसके पीछे उनकी मंशा यही रहती है कि वे उससे विवाह कर उसका विश्वास जीत कर नीलमाधव के विग्रह का पता लगा सकें।
कथा प्रचलित है कि सतयुग में अवंती नगरी के राजा इंद्रद्युम्न विष्णु भगवान के परम भक्त थे। इसलिए इंद्रद्युम्न अपने राज्य में विष्णु भगवान का विशाल मंदिर बनवाना चाहते थे। जहां वे विष्णु के नए रूप को प्रतिष्ठापित करना चाहते थे। उन्हें पता चला कि नीलगिरी के घने जगलों में आदिवासी शवर विष्णु के नीलमाधव विग्रह की पूजा करते हैं। इसलिए राजा नीलमाधव की मूर्ति का पता लगाने दरबारियों को रवाना करते हैं। काफी ढूंढने पर भी उनको सफलता नहीं मिलती। इस पर राजा दरबार से विद्यापति नामक पंडित को रवाना करते हैं। नीलगिरी के वनों में उनको शवर नरेश विश्वावसु की पुत्री ललिता मिलती है जिससे वे प्रेम करने लगते हैं। इसके पीछे उनकी मंशा यही रहती है कि वे उससे विवाह कर उसका विश्वास जीत कर नीलमाधव के विग्रह का पता लगा सकें।
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एक दिन विद्यापति नीलमाधव के विग्रह का पता लगा लेते हैं। पता चलते ही विद्यापति लौटकर राजा को इसकी जानकारी देते हैं। इस पर राजा इंद्रद्युम्न सेना के साथ नीलगिरी की पहाड़ियों से नीलमाधव का विग्रह लाने को कूच करते हैं। लेकिन नीलगिरी की पहाड़ियों में स्थित उस मंदिर में नीलमाधव का विग्रह नहीं मिलता है। इसी बीच राजा को देववाणी सुनाई देती है कि वे सागर के तट पर बांकी नदी के मुहाने पर मौजूद लकड़ी से विग्रह निर्माण कराकर मंदिर में स्थापित करें। इंद्रद्युम्न सागर तट पर उसी स्थान पर पहुंचते हैं और लकड़ी को लाते हैं लेकिन विग्रह निर्माण के लिए तब उनके पास कोई भी सक्षम कारीगर नहीं मिलता। विग्रह कैसे तैयार हों, वे इस बात पर गहन चिता में डूब जाते हैं।
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on beach
एक दिन स्वयं विश्वकर्मा वृद्ध शिल्पी का वेश धर राजा के पास आते हैं और अपनी शर्त पर विग्रहों को तैयार करने को राजी हो जाते है। शर्त के अनुसार राजा इसके निर्माण की गोपनीयता बनाए रखेंगे और निर्माण के 21 दिन तक कोई भी व्यक्ति वहां झांकने का प्रयास नहीं करेगा। विग्रह निर्माण प्रारंभ होता है लेकिन रानी गुंडिचा अपनी उत्सुकता पर नियंत्रण नहीं रख पाती हैं और 15वें दिन छुपकर वहां जाती है। ऐसा करते ही वृद्ध शिल्पी अंतर्ध्यान हो जाता है और वहां जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के तीन अपूर्ण विग्रह मिलते हैं। रानी गुंडिचा और राजा को इस गलती पर पछतावा होता है और वे प्रभु से क्षमा याचना करते हैं। इस पर विष्णु भक्त इंद्रद्युम्न को एक बार फिर से देववाणी सुनाई देती है। राजा को जो शब्द सुनते हैं उसमें कहा जाता है कि वे चिंता किए बगैर इन अधूरे विग्रहों को ही मंदिर में स्थापित करें। राजा प्रसन्नचित्त होकर एक भव्य मंदिर बनवाते हैं। बस तभी से यह पूजा चली आ रही है।