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आपके इंटरनेट की आदत से वन्यजीवों को कैसे है खतरा, नहीं जानते होंगे ये बात

Mon, 27 Aug 2018 09:29 AM IST
एला डेविस, बीबीसी हिंदी
एला डेविस, बीबीसी हिंदी Updated Mon, 27 Aug 2018 09:29 AM IST
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Know How Your Internet risky for Wildlife
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दिन बहुत लंबा और थकाने वाला गुजरा है। काम खत्म करके आप थोड़े आराम के मूड में हैं। सुकून पाने के लिए आप इंटरनेट ऑन करते हैं और प्यारे जानवरों की तस्वीरें देखते लगते हैं ताकि मुस्कुरा सकें। जो लोग जानवरों से प्यार करते हैं उनके साथ अक्सर ऐसा होता है, लेकिन हमारी ये आदत जंगली जानवरों को नुकसान पहुंचा रही है।


जैसे कि ऑनलाइन दुनिया में रेड पांडा बहुत लोकप्रिय हैं। वो एक इंटरनेट ब्राउजर फायरफॉक्स के हमनाम भी हैं। जैसे ही आप इंटरनेट पर इन रोंएदार जानवरों को तलाशना शुरू करते हैं, आप के सामने ढेर सारे विकल्प खुल जाते हैं। बर्फ पर मस्ती करते पांडा की तस्वीरें और वीडियो, इंटरनेट आप की नजर कर देता है। कहीं पर पत्थर देखकर खौफ खाते पांडा, तो कहीं पत्तियां चबाते हुए वीडियो।

आम तौर पर इन तस्वीरों की जगह के बारे में पता नहीं होता। मगर, रेड पांडा की ऐसी ज्यादातर तस्वीरें नेपाल और चीन की होती हैं, जहां पर ये जानवर जंगलों में रहते हैं, लेकिन, इंसान की पिछली तीन पीढ़ियों के दौर में पांडा की आबादी आधी रह गई है। आज पांडा बेहद दुर्लभ जानवर माने जाते हैं। उनकी नस्ल पर खात्मे का खतरा मंडरा रहा है। माना जाता है कि आज की तारीख में केवल ढाई हजार के करीब पांडा बचे हैं जो जंगलों में रहते हैं।

रेड पांडा नेटवर्क नाम का कल्याणकारी संस्थान इन जानवरों के बारे में जागरुकता फैलाने और उनकी तकलीफ को दुनिया को समझाने का काम करता है। 2010 से रेड पांडा नेटवर्क हर साल रेड पांडा डे आयोजित करता है। इसका मकसद दुनिया के तमाम वन्य जीव प्रेमियों को ये समझाना होता है कि ये जीव केवल प्यारे यू-ट्यूब वीडियो नहीं हैं।
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इंटरनेट का किरदार
अफसोस की बात ये है कि तमाम कोशिशों के बावजूद इन जानवरों की तस्करी रुक नहीं रही। इसी साल जनवरी में आधा दर्जन रेड पांडा को पूर्वी एशियाई देश लाओस में तस्करों के चंगुल से आजाद कराया गया था। जानवरों के तस्कर इन पांडा को पालतू जानवर के तौर पर बेचने की कोशिश में थे। अब रेड पांडा की ये तस्करी इंटरनेट पर उनकी लोकप्रियता का नतीजा है या नहीं, ये कहना मुश्किल है, लेकिन इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि किसी जीव की छवि को ऐसे बनाकर पेश करने से उन पर खतरा मंडराने लगता है।

इसकी बड़ी मिसाल है सोनिया नाम का स्तनधारी जीव। डिजिटल युग के शुरुआती दिनों में इस जीव का गुदगुदी करने से ख़ुशी में हाथ उठाने वाला वीडियो जबरदस्त वायरल हुआ था। बाद में जानवरों के एक्सपर्ट ने बताया कि जिसे हम सोनिया का गुदगुदी का मजा लेना समझ रहे थे, वो असल में हाथ उठाकर अपनी परेशानी जाहिर कर रहा था। इस पालतू जानवर का वजन बढ़ा हुआ था। वो रूस में एक फ्लैट में कैद कर के रखा गया था। जब भी उसके मालिक उसे गुदगुदी करते, वो हाथ उठाकर मानो ये कहता था कि मुझे बख्श दो, लेकिन दुनिया भर में उसका वीडियो देखने वालों ने इसका गलत मतलब निकाला।

2013 में ब्रिटेन की जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर एना नेकारिस और उनकी टीम ने इस तस्वीर को देखने वाले इंटरनेट यूजर्स पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट के मुताबिक, जब स्लो आइरिस का वीडियो पहली बार यू-ट्यूब पर डाला गया, तो इसे देखने वाले करीब एक चौथाई लोगों ने इस जानवर को पालतू बनाकर रखने की ख्वाहिश जताई। जबकि इस जंगली जीव के खात्मे का खतरा मंडरा रहा है।

प्रोफेसर एना नेकारिस इंटरनेट के जंगली जानवरों पर बुरे असर को लेकर अब भी रिसर्च कर रही हैं। वो कहती हैं कि इस नस्ल के जानवरों के हालात जरा भी नहीं सुधरे हैं। हालांकि इनका अवैध कारोबार तो कम हुआ है। मगर इसकी वजह ये है कि कई जगह से ये जानवर विलुप्त हो चुका है। वो कहती हैं कि तस्करी की वजह से स्लो आइरिस के पूरी तरह से खात्मे का डर है। उन्हें सिर्फ पालतू बनाने के लिए शिकार नहीं किया जा रहा, बल्कि पारंपरिक दवाओं के लिए भी मारा जा रहा है। जंगली जानवरों की तस्करी पर निगरानी रखने वाली संस्था ट्रैफिक (TRAFFIC) का कहना है कि चीन में जंगली जानवरों के अवैध कारोबार के विज्ञापन बहुत कम हुए हैं।
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अंडरवर्ल्ड हो रहा कारोबार
2012 से 2016 के बीच इनमें 50 फीसद की कमी आई है, लेकिन, इससे ख़ुश होने की जरूरत नहीं। आज जंगली जानवरों का अवैध कारोबार ऑनलाइन होने लगा है और वो भी प्राइेवट ऑनलाइन कम्युनिटी और सोशल नेटवर्क के भीतर। इन्हें पकड़ पाना और मुश्किल हो गया है। मतलब अब ये धंधा अंडरवर्ल्ड हो गया है। जानवरों के लुभावने वीडियो के नीचे बस आप को टाइप करना है-मुझे भी ऐसा एक चाहिए। फिर ऐसे तमाम लिंक मिल जाएंगे जो जानवरों की तस्करी के अवैध धंधे के अड्डे हैं।

मगर तस्करी का ये तूफान थामने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। 2018 में दुनिया की 20 सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों ने वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड से हाथ मिलाया है। इसका मकसद जंगली जानवरों की अवैध तस्करी रोकना है। 2020 तक जंगली जानवरों की अवैध तस्करी को 80 फीसद तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है। जंगली जानवरों के शोषण की रोकथाम के लिए इंस्टाग्राम ने भी एक पहल की है जिसमें किसी खास हैशटैग जैसे  #tigerselfie या #slowioris टाइप करने पर पॉप-अप मैसेज आता है कि हमें इन जानवरों को बचाने की जरूरत है।

2018 में बीबीसी अर्थ ने भी इंस्टाग्राम के साथ मिलकर दो और हैशटैग #orangutan और #pangolin पर चेतावनी वाले संदेश जोड़े थे। हालांकि अभी इंस्टाग्राम ने ये नहीं बताया है कि इन हैशटैग का इस्तेमाल कम हुआ है या नहीं। प्रोफेसर एना नेकारिस कहती हैं कि हमें सोशल नेटवर्किंग साइट पर सतर्क रहना चाहिए। वो कहती हैं कि, 'इंस्टाग्राम ने एक और पहल की है जिसके तहत कोई यूजर अगर किसी खास हैशटैग से सर्च कर रहा है या कोई पोस्ट कर रहा है, तो उसे एक पॉप-अप नजर आता है, जो ये समझाता है कि आप को इस जीव को बचाने की जरूरत है। '


 
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संरक्षण क्यों जरूरी
सरगोशियों के इस खेल में तस्वीरों और वीडियो को जब लगातार शेयर किया जाता है, तो कई बार असल मकसद छुप जाता है। इसलिए जब आप इंटरनेट पर प्यारे जानवरों की तस्वीरें देखें, तो दो पल ठहर कर सोचें। अगर आप को ऐसी तस्वीरों और वीडियो को शेयर करने पर खतरा नजर आता है, तो इसकी खबर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के संचालकों को करें।

आप इन तस्वीरों को इस तरह से भी शेयर कर सकते हैं जिसमें लिखें कि इन जीवों को बचाने के लिए सबको एकजुट होने की जरूरत है। जंगली जानवरों को बचाने में जुटे कई स्वयंसेवी संगठन तभी कारगर हो सकते हैं, जब ऑनलाइन दुनिया में उनके समर्थक बढ़ें। पैसे से मदद करें। हम सब मिलकर ही ऐसी तस्वीरों के जरिए जागरूकता फैला सकता है। स्क्रीन पर जिन जीवों की तस्वीरें देखकर सुकून मिलता है, उन जानवरों को बचाना भी हमारा फर्ज है। पर्यावरण के लिहाज से भी इसकी सख्त जरूरत है।
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