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Mokshada Ekadashi 2020: जानिए क्यों नहीं खाए जाते हैं एकादशी के दिन चावल

Sat, 19 Dec 2020 08:00 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Shashi Shashi Updated Sat, 19 Dec 2020 08:00 AM IST
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Mokshada Ekadashi 2020 date significance Know why rice is not eaten on Ekadashi
भगवान विष्णु

सनातन धर्म में एकादशी तिथि को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ बताया गया है। हर माह में दो पक्ष होते हैं, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दोनों पक्षों की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी तिथि कहा जाता है। इस तरह से वर्ष भर में 24 एकादशी तिथि पड़ती हैं। जिस वर्ष अधिक मास होता है, उस वर्ष एकादशी की संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। 25 दिसंबर को मोक्षदा एकादशी का व्रत किया जाएगा। एकादशी तिथि के दिन श्री हरि भगवान विष्णु की पूजा का प्रावधान है। इस दिन चावल खाना वर्जित माना जाता है। जो लोग व्रत नहीं करते हैं, उन्हें भी एकादशी तिथि को चावल नहीं खाने चाहिए। जानते हैं कि इसके पीछे की पौराणिक कथा, तर्क और मान्यताएं क्या कहती हैं।

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एकादशी तिथि को क्यों वर्जित हैं चावल का सेवन-
पौराणिक कथा के अनुसार माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर का त्याग कर दिया था। और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। माना जाता है कि वहां पर जौ और चावल कि उत्पत्ति हुई। जिस दिन उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया, उस दिन एकादशी थी। इसलिए एकादशी तिथि के दिन जौ और चावल खाने को वर्जित माना गया है। माना जाता है कि जो लोग इस दिन चावल का सेवन करते हैं वे ऋषि मेधा के रक्त और मांस का सेवन करते हैं।

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क्या कहती हैं मान्यताएं-
मान्यताएं कहती हैं कि जो लोग एकादशी तिथि को चावल का सेवन करते हैं, उन्हें रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म मिलता है, परंतु जो लोग द्वादशी तिथि को चावल का सेवन करते हैं उन्हें इस योनि से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

एकादशी पर चावल न खाने के पीछे का तर्क
इसके अलावा एकादशी तिथि पर चावल न खाने के विषय में तर्क यह दिया जाता है कि चावल का सेवन करने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है। इससे व्रती का मन विचलित और चंचल हो जाता है। जिससे व्रत के नियमों का पालन करने में बाधा आती है। इसलिए भी एकादशी व्रत में चावल का सेवन वर्जित माना जाता है।
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