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यूं ही नहीं कहते कि हर दिन सूर्य को जल देना चाहिए
किरण राय/ज्योतिषशास्त्री
Updated Fri, 28 Nov 2014 04:24 PM IST
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वैदिक ज्योतिष में सूर्य को पिता, सामाजिक-प्रतिष्ठा, आत्म-सम्मान तथा नौकरी-पेशा इत्यादि का कारक माना गया है। क्योंकि इसकी अद्भुत गुरुत्वाकर्षण के कारण सारे ग्रह इसके इर्द-गिर्द घुमते रहते हैं। वैदिक ज्योतिष में इसे पिता का स्थान दिया गया है। वैदिक शास्त्र में सूर्य की स्थिति कुंडली में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
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यदि सूर्य किसी कुंडली में हर तरह से सुदृढ़ है तो जातक की समाज में हर हालत में भी प्रतिष्ठा बनी रहेगी। राजनीति में भी इसे राजा का दर्ज़ा दिया गया है। सूर्य बलवान हो तो हर स्थिति में इंसान आत्म-बल के दम पर अपने पथ पर अडिग रहता है।
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वैदिक ज्योतिषी में हम चन्द्र को मन का कारक मानते हैं जो कि हमारे पूर्व किए हुए कर्मो तथा घटित घटनाओं से हमारी भावनाओं पर प्रभाव डालकर हमारे अंदर मानसिक बदलाव लाता है किन्तु सूर्य हमारे हर कर्म को उद्देश्यपूर्वक करवाता है।
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कुंडली में सूर्य जिस स्थान पर बैठता है वही जातक के जिंदगी जीने का उद्देश्य होता है, उसी दिशा में वह जाने की इच्छा एवं प्रयास भी करता है। जब सूर्य पीड़ित अथवा कमज़ोर होता है तब वह जातक को आत्म-विश्वास, दृढ़-संकल्पता एवं स्वाभिमान के रास्ते से विचलित कर देता है।
कालपुरुष की कुंडली में भी अगर सूर्य की स्थिति देखें तो इसे पांचवे यानि बुद्धि पिछले जन्म में किए हुए कर्मो का फल संतान एवं विद्या का स्थान प्राप्त है। सूर्य की स्थिति कमज़ोर होने के साथ ही मनुष्य के जिंदगी में इन सभी से संबंधित कमियां भी महसूस होने लगती है।
कुंडली में सूर्य को दृढ़ करने के लिए सर्वप्रथम पिता तथा पिता तुल्य लोगों का सम्मान करना, रविवार के दिन कम से कम आधे प्रहर तक नमक का सेवन न करें। संभव हो तो पूरे दिन बिना नमक के भोजन करें। सूर्य-देव की अराधना के लिए जल में कुछ मीठा डालकर सूर्योदय की समय अथवा सूर्योदय से अधिकतम दो घंटे के अंदर अर्ध्य दें। यथासंभव सूर्य आदित्य हृदय-स्तोत्र का पाठ करें, किन्तु उसके पहले तीन बार गायत्री मंत्र एवं उसके पश्चात तीन बार गायत्री मंत्र का पाठ अवश्य करें।