गुरु गोविंद सिंह जन्मदिन विशेष, जानिए हैरान करने वाली बातें
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गुरू गोविंद सिंह जी वीरता और साहस की प्रतिमूर्ति थे। औरंगजेब द्वारा पिता तेगबहादुर की हत्या किया किये जाने के बाद नौ वर्ष की आयु में ही गोविंद सिंह जी को गुरू की गद्दी पर बैठा गया। बचपन में इन्हें सभी प्यार से ‘बाला प्रीतम’ कह कर पुकारते थे।
लेकिन इनके मामा इन्हें गोविंद की कृपा से प्राप्त मानकर गोविंद नाम से पुकारते थे। यही नाम बाद में विख्यात हुआ और बाला प्रीतम गुरू गोविंद सिंह कहलाये। गुरू पद की गरिमा बनाए रखने के लिए गोविंद सिंह जी ने युद्ध कला में प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ ही अनेक भाषाओं की भी शिक्षा प्राप्त की।
कुशाग्र बुद्धि और लगन से गोविंद सिंह जी ने कम समय में ही युद्ध कला में महारथ हासिल कर ली और उच्च कोटि के विद्वान बन गये। इन्होंने संस्कृत, पारसी, अरबी और अपनी मातृभाषा पंजाबी को ज्ञान प्राप्त किया। वेद, पुराण, उपनिषद् एवं कुराण का भी इन्होंने अध्ययन किया।
गोविंद सिंह जी ने औरंगजेब की क्रूर नीतियों से धर्म की रक्षा के लिए सिखों को संगठित किया और सिख कानून को सूत्रबद्ध किया। इन्होंने कई काव्य की रचना की। इनकी मृत्यु के बाद इन काव्यों को एक ग्रंथ के रूप में संग्रहित किया जो दसम ग्रंथ के नाम से जाना जाता है। सिखों के लिए यह पवित्र ग्रंथ गुरू गोविंद सिंह जी का हुक्म माना जाता है।
इस तरह हुए गुरु गोविंद के पंच प्यारे
मुगलों से युद्ध करने के लिए गोविंद सिंह जी को वीर सपूतों की जरूरत थी। इसके लिए गोविंद सिंह जी ने एक युक्ति निकाली। बात है सन् 1699 की, बैसाखी के अवसर पर सिख समुदाय को आमंत्रित किया गया। गुरू का अदेश मिलते ही सभी सिख समुदाय आनंदपुर साहिब के उस बड़े से मैदान में पहुंच गये जहां पर गोविंद सिंह जी ने सभा का आयोजन किया था।
गोविंद सिंह जी एक नंगी तलवार लेकर सिख समुदाय को संबोधित किया कि मुझे सिर चाहिए। गुरू की बात सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। तभी लाहौर निवासी दयाराम खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, “मेरा सिर हाजिर है”।
गोविंद सिंह दयाराम को तंबू में ले गये और कुछ ही देर में तंबू से खून की धारा बहती नज़र आयी। इसके बाद गोविंद सिंह फिर से मंच पर आये पुनः एक और सिर की मांग की। इस बार सहारनपुर भाई धर्मदास आगे आये। इन्हें भी तंबू में ले जाया गया और फिर तंबू से खून की धारा बह निकली।
इसके बाद क्रमशः जगन्नाथ पुरी निवासी हिम्मत राय, द्वारका निवासी मोहकम चंद और पांचवी बार बीदर निवासी साहिब चंद को तंबू में ले जाया गया और हर बार तंबू से खून की धारा बह निकली।
साहिब चंद को तंबू में ले जाने के बाद जब छठी बार गोविंद सिंह जी तंबू से बाहर निकले तो वह सभी लोग उनके साथ थे जिन्हें गुरू जी अपने साथ तंबू में ले गये थे। पांचों व्यक्ति ने कहा कि गुरू जी हमारी परीक्षा ले रहे थे, हर बार बकरे की बलि दी गयी।
इसके बाद गुरुजी ने सिख समुदाय को संबोधित करके कहा कि ये मेरे ‘पंच प्यारे’ हैं। इनकी निष्ठा से एक नए संप्रदाय का जन्म हुआ, जिसका नाम था 'खालसा' अर्थात शुद्ध।
सिख ऐसे कहलाये सिंह
खालसा की स्थापना करने के बाद गुरू गोविंद सिंह जी ने बड़ा सा कड़ाह मंगवाया। इसमे स्वच्छ जल भरा गया। गोविंद सिंह जी की पत्नी माता सुंदरी ने इसमे बताशे डाले। ‘पंच प्यारों’ ने कड़ाह में दूध डाला और गुरुजी ने गुरुवाणी का पाठ करते हुए उसमे खंडा चलाया।
इसके बाद गुरुजी ने कड़ाहे से शरबत निकालकर पांचो शिष्यों को अमृत रूप में दिया और कहा, “तुम सब आज से ‘सिंह’ कहलाओगे और अपने केश तथा दाढी बढाओगे। गुरू जी ने कहा कि केशों को संवारने के लिए तुम्हे एक कंघा रखना होगा। आत्मरक्षा के लिए एक कृपाण लेनी होगी।
सैनिको की तरह तुम्हे कच्छा धारण करना पड़ेगा और अपनी पहचान के लिए हाथों में कड़ा धारण करना होगा। इसके बाद गुरू जी ने सख्त हिदायत दी कि कभी किसी निर्बल व्यक्ति पर हाथ मत उठाना।
इसके बाद से सभी सिख खालसा पंथ के प्रतीक के रूप में केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा ये पांचों चिन्ह धारण करने लगे। नाम के साथ ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। इस घटना के बाद से ही गुरू गोविंद राय गोविंद सिंह कहलाने लगे।
ऐसे हराया मुगलों को
खालसा पंथ की स्थापना के बाद औरंगजेब ने पंजाब के सूबेदार वजीर खां को आदेश दिया कि सिखों को मारकर गोविन्द सिंह को कैद कर लिया जाये। गोविंद सिंह ने अपने मुट्ठी भर सिख जांबाजों के साथ मुगल सेना से डटकर मुकाबला किया और मुगलों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
तभी गोविंद सिंह ने कहा 'चिड़िया संग बाज लड़ाऊं, तहां गोबिंद सिंह नाम कहाऊं'। गोविंद सिंह ने मुगलों की सेना को चिड़िया कहा और सिखों को बाज के रूप में संबोधित किया। औरंगजेब इससे आग-बबूला हो गया। औरंगजेब के क्रोध को शांत करने के लिए मुगलों के सेनापति पाइंदा खां ने कहा कि 'मै गोविन्द सिंह से अकेला लडूंगा'। हमारी हार जीत से ही फैसला माना जाये।
पाइंदा खां का निशान अचूक था इसलिए औरंगजेब इस बात पर राजी हो गया। सिखों और मुगलों की सेना आमने-समाने डट गयी। गुरु गोविन्द सिंह ने पाइंदा खां से कहा कि चूंकि चुनौती तुम्हारी ओर से है, इसलिए पहला वार तुम करो। पाइंदा खां ने कहा, “ठीक है। तुमने मौत को न्योता दिया है। मेरा पहला वार ही आखिरी वार होगा।”
फिर उसने धनुष पर बाण चढ़ाकर छोड़ा। गोविन्द सिंह ने पाइंदा खां का बाण बीच में ही काट दिया। अब बारी गोविन्द सिंह की थी। उन्होंने एक तीर छोड़ा और पाइंदा खां का सिर धड़ से अलग हो गया। सिख जीत गए, मुगलों को हार स्वीकार करनी पड़ी।
गुरू गोविंद सिंह जी का अनोखा रूप
शक्ति संपन्न व्यक्ति आमतौर पर अभिमानी हो जाता है लेकिन गुरू गोविंद सिंह जी वीरता के साथ ही उदार के भी प्रतीक थे। सहृदयता इनमें बचपन से ही मौजूद था। इनके बचपन की एक रोचक घटना है, जो गुरू गोविंद सिंह जी की उदारता और दया को प्रदर्शित करता है। एक निस्संतान बुढिया थी, जो जो सूत काटकर अपना गुज़ारा करती थी।
बालक गोविंद हर दिन बुढिया की सूत काटने के लिए रखी पूनियां बिखेर देते थे। इससे दुखी होकर वह बुढ़िया गोविंद सिंह जी की माता गूजरी के पास शिकायत लेकर पहुंच जाती। माता गूजरी पैसे देकर उसे खुश कर देती। माता गूजरी ने गोविंद सिंह से पूछा कि तुम बुढ़ी स्त्री को परेशान क्यों करते हो, जवाब में गोविंद सिंह जी ने कहा कि "उसकी गरीबी दूर करने के लिए। अगर मैं उसे परेशान नहीं करूंगा तो तुम उसे पैसे कैसे दोगी।”
गोविंद सिंह जी की यही उदारता बड़े होने पर भी बनी रही। मुगलों से युद्घ के दौरान इन्हें अपनी संतान खोना पड़ा। इसके बावजूद भी अंतिम मुगल बादशाह बहादुर ज़फर को दिल्ली के तख्त पर बैठाने में इन्होंने सहायता की।