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बिना घटे ही कुछ याद आए, ऐसा हुआ है आपके साथ?

Tue, 01 Oct 2013 11:21 AM IST
Updated Tue, 01 Oct 2013 11:21 AM IST
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why do we remember things that never happen actually

मानवीय याददाश्त ख़ुद को दुनिया के अनुरूप ढालने के लिए निरंतर बदलती रहती है। अब एक आर्ट प्रोजेक्ट के जरिए यह जानने की कोशिश की जा रही है कि हमारी याददाश्त में क्या दोष हो सकते हैं।

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हममें से हर किसी के दिमाग़ में मिथ्या यादें बनती हैं और आर्टिस्ट एलेस्डेयर होपवुड उनका संकलन कर रहे हैं।

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पिछले एक साल से वो लोगों से अपनी मिथ्या यादों के बारे में बताने को कहते हैं और फिर उन्हें कला का रूप देते हैं।

इस बारे में लोगों के अनुभव अलग-अलग तरह के हैं। किसी ने कहा कि उसने बचपन में चूहा खा लिया था तो कोई कह रहा है कि वह बचपन में उड़ सकता था।

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एक आदमी को यह ग़लतफ़हमी थी कि उसकी गर्लफ़्रेड की बहन की मौत दांतों के डॉक्टर से इलाज कराते समय हुई थी। उसका विश्वास इतना पक्का था कि वह दांतों के डॉक्टर के पास जाने के अपने सभी कार्यकर्मों को गुप्त रखता था।
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यह कोई दुर्लभ मामला नहीं है। न्यूरो वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी कई दैनिक यादें ग़लत ढंग से बुनी हुई हैं क्योंकि दुनिया के बारे में हमारा दृष्टिकोण निरंतर बदलता रहता है।

मामूली संकेतों से यादों को ग़लत दिशा में मोड़ा जा सकता है।

एलिज़ाबेथ लॉफ्टस ने 1994 में एक प्रयोग किया था जिसमें वह एक चौथाई भागीदारों को इस बात के लिए मनाने में कामयाब रहीं कि बचपन में वे एक शॉपिंग सेंटर में खो गए थे।

साल 2002 में किए गए ऐसे ही एक अन्य प्रयोग में पाया गया कि आधे भागीदारों ने छद्म तस्वीरों को देखकर इस बात को मान लिया कि बचपन में उन्होंने गर्म हवा के ग़ुब्बारे की सैर की थी।

यह प्रयोग क्लिक करें ब्रिटेन के वॉरविक विश्वविद्यालय की किम्बर्ली वेड ने किया था। होपवुड ने मौजूदा प्रोजेक्ट के लिए उन्हें गर्म हवा के ग़ुब्बारे की वास्तविक उड़ान में हिस्सा लेने के लिए कहा। इसी यात्रा के वीडियो और तस्वीरों को प्रदर्शनी में दिखाया गया है।


किम्बर्ली ने कहा कि वह इसके लिए बेहद उत्साहित थीं। उन्होंने कहा, "मैं एक दशक से भी अधिक समय से लोगों की याददाश्त का अध्ययन कर रही हूं। मेरे लिए यह अविश्वसनीय लगता है कि हमारी कल्पना हमें ऐसा कुछ सोचने पर मजबूर कर सकती हैं जो हमने कभी किया ही नहीं।"

अधिकांश मामलों में मिथ्या यादें दैनिक परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं जिसकी कोई वास्तविक परिणति नहीं होती है।

लेकिन कभी कभार इस मिथ्या याददाश्त के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अदालत में गवाही किसी के लिए सज़ा का कारण बन सकती है।

अपराध विज्ञान तकनीक ने ऐसे कई मामलों में फ़ैसलों को पलटा है। अमरीका में द इनोसेंस प्रोजेक्ट में उन लोगों की जानकारी दी गई है जो ग़लत पहचान का शिकार हुए लेकिन बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।

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