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इस मामले में वीडियो गेम खेलना हो सकता है फायदेमंद
स्मिथ मुंदसद
Updated Wed, 06 Aug 2014 11:08 AM IST
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रोज़ाना कुछ देर तक वीडियो गेम खेलने से बच्चों के विकास पर अच्छा असर हो सकता है। ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की एक शोध के नतीजे इसी ओर इशारा करते हैं।
वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि जो बच्चे हर रोज एक घंटे से कम समय के लिए वीडियो गेम खेलते हैं वे बिलकुल ही गेम नहीं खेलने वाले बच्चों की तुलना में किसी माहौल में आसानी से ढल जाते हैं।
लेकिन वे बच्चे जो तीन घंटे से ज्यादा समय वीडियो गेम्स को देते हैं, शोध के मुताबिक वे अपनी ज़िंदगी से नाखुश हैं।
मनोवैज्ञानिक डॉक्टर एंड्रूय प्रज़ाइबाइल्स्की ने ब्रिटेन के पाँच हजार बच्चों पर ये शोध किया। शोध में शामिल किए गए बच्चे 10 से 15 साल की उम्र के थे।
इनमें से तीन चौथाई बच्चों ने कहा कि वे हर रोज वीडियो गेम खेलते हैं।
सामाजिक बर्ताव
बच्चों से ये पूछा गया कि वे स्कूल जाने वाले दिनों में कितने घंटे वीडियो गेम खेलते हैं। इस सवाल का जवाब उन्हें ठीक ठीक देना था।
इसके बाद अन्य पहलुओं पर विचार किया गया जैसे कि शोध में भाग लेने वाले बच्चे अपनी ज़िंदगी से कितने खुश हैं, साथियों के बीच उनकी छवि कैसी है, मुश्किल में पड़े लोगों की मदद करने पर उनका रुख क्या रहता है और वे कितने लापरवाह या सजग रहते हैं।
इनके जवाबों के आधार पर बच्चों का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर का पता लगाया गया। बच्चों को कई समूहों में बाँटने के बाद उनकी आपस में तुलना की गई।
शोध में पाया गया कि जो बच्चे रोजाना एक घंटे से कम समय के लिए वीडियो गेम खेलते हैं, वे वीडियो गेम बिलकुल ही नहीं खेलने वाले बच्चों की तुलना में अपनी जिंदगी से ज्यादा खुश थे और उनका सामाजिक बर्ताव अधिक सकारात्मक था।
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नया नजरिया
इन बच्चों को भावनात्मक समस्याएँ भी कम झेलनी पड़ती हैं और वे शैतानी भी कम करते हैं। शोध के नतीजों के मुताबिक तीन घंटे से ज्यादा समय वीडियो गेम्स को देने वाले बच्चे सबसे कम मिलनसार पाए गए।
डॉक्टर एंड्रूय प्रज़ाइबाइल्स्की कहते हैं कि इसके पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं।
उन्होंने बीबीसी को बताया, "शोध के माहौल में दो अलग-अलग विचार अलग अलग छोरों पर खड़े दिखाई देते हैं। एक वे लोग हैं जो मानते हैं कि वीडियो गेम से बड़े फायदे हैं और दूसरी ओर कुछ लोग इसे हिंसा से जोड़ते हैं। यह शोध उन्हें एक नया नजरिया दे सकता है।"
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वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि जो बच्चे हर रोज एक घंटे से कम समय के लिए वीडियो गेम खेलते हैं वे बिलकुल ही गेम नहीं खेलने वाले बच्चों की तुलना में किसी माहौल में आसानी से ढल जाते हैं।
लेकिन वे बच्चे जो तीन घंटे से ज्यादा समय वीडियो गेम्स को देते हैं, शोध के मुताबिक वे अपनी ज़िंदगी से नाखुश हैं।
मनोवैज्ञानिक डॉक्टर एंड्रूय प्रज़ाइबाइल्स्की ने ब्रिटेन के पाँच हजार बच्चों पर ये शोध किया। शोध में शामिल किए गए बच्चे 10 से 15 साल की उम्र के थे।
इनमें से तीन चौथाई बच्चों ने कहा कि वे हर रोज वीडियो गेम खेलते हैं।
सामाजिक बर्ताव
बच्चों से ये पूछा गया कि वे स्कूल जाने वाले दिनों में कितने घंटे वीडियो गेम खेलते हैं। इस सवाल का जवाब उन्हें ठीक ठीक देना था।
इसके बाद अन्य पहलुओं पर विचार किया गया जैसे कि शोध में भाग लेने वाले बच्चे अपनी ज़िंदगी से कितने खुश हैं, साथियों के बीच उनकी छवि कैसी है, मुश्किल में पड़े लोगों की मदद करने पर उनका रुख क्या रहता है और वे कितने लापरवाह या सजग रहते हैं।
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इनके जवाबों के आधार पर बच्चों का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर का पता लगाया गया। बच्चों को कई समूहों में बाँटने के बाद उनकी आपस में तुलना की गई।
शोध में पाया गया कि जो बच्चे रोजाना एक घंटे से कम समय के लिए वीडियो गेम खेलते हैं, वे वीडियो गेम बिलकुल ही नहीं खेलने वाले बच्चों की तुलना में अपनी जिंदगी से ज्यादा खुश थे और उनका सामाजिक बर्ताव अधिक सकारात्मक था।
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इन बच्चों को भावनात्मक समस्याएँ भी कम झेलनी पड़ती हैं और वे शैतानी भी कम करते हैं। शोध के नतीजों के मुताबिक तीन घंटे से ज्यादा समय वीडियो गेम्स को देने वाले बच्चे सबसे कम मिलनसार पाए गए।
डॉक्टर एंड्रूय प्रज़ाइबाइल्स्की कहते हैं कि इसके पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं।
उन्होंने बीबीसी को बताया, "शोध के माहौल में दो अलग-अलग विचार अलग अलग छोरों पर खड़े दिखाई देते हैं। एक वे लोग हैं जो मानते हैं कि वीडियो गेम से बड़े फायदे हैं और दूसरी ओर कुछ लोग इसे हिंसा से जोड़ते हैं। यह शोध उन्हें एक नया नजरिया दे सकता है।"