टेक्नोलॉजी के सहारे अब होगा घुटनों का रिप्लेसमेंट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फिट रहने के लिए मनुष्य ने हमेशा टेक्नोलॉजी का सहारा लिया है। आर्थोपेडिक्स और आरथ्रोप्लास्टी में इस्तेमाल की जा रही तकनीक की बदौलत लंबे जीवन की कवायद और तेज हुई है। अब तो मरीज के जीवन में टेक्नोलॉजी के सहारे प्रत्यारोपित की जा रही चीजों की उम्र उससे भी ज्यादा हो गई है। घुटनों का ओस्टोआर्थराइटिस आजकल सामान्य है।
55 साल की उम्र से ज्यादा के दस फीसदी आबादी इसकी शिकार है। मरीजों की लंबी उम्र को देखते हुए आने वाले समय में इसके शिकार लोगों की संख्या में और इजाफा होने की संभावना है। घुटनों के जोड़ों का आर्थराइटिस शिकार होना एक घातक समस्या है। बुजर्गों के लिए यह भारी दर्द और विकलांगता का सबब बन जाती है।
ओस्टोआर्थराइटिस के अलावा, गठिया का आर्थराइटिस, सेरोनेगिटिव आर्थराइटिस, किसी चोट या सदमे के बाद की आर्थराइटिस और घुटनों के जोड़ों में होने वाली असाध्य ट्यूमर भी मरीजों के लिए जटिल बीमारी बन जाती है। घुटनों में ओस्टोआर्थराइटिस के शिकार ज्यादातर मरीज आधुनिक और पारंपरिक चिकित्सा से ठीक हो जाते हैं। लेकिन मरीजों की एक बड़ी तादाद ज्वाइंट रीप्लेसमेंट विशेषज्ञों के पास भेज दिया जाता है।
देश में घुटनों के पूर्ण प्रत्यारोपण (टीकेआर) की मांग बढ़ती जा रही है क्योंकि इसकी वजह है। लोगों की उम्र अब लंबी होती जा रही है।
जीवनस्तर अच्छा हो रहा है और बढ़ी उम्र के बावजूद लोगों का घूमना-फिरना बढ़ा है। इस वक्त 55 साल की उम्र की आबादी के दो फीसदी लोग इस कदर लाचार हो चुके हैं कि उन्हें घुटनों के प्रत्यारोपण की जरूरत है। और उम्र के साथ इस प्रत्यारोपण की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। महिलाओं में घुटनों के प्रत्यारोपण के मामले पुरूषों से दोगुने हैं।
घुटनों का क्यों हो है प्रत्यारोपण
घुटनों को पूर्ण प्रत्यारोपण (टीकेआर) का इस्तेमाल घुटनों के दर्द में राहत देने और उसके कामकाज को सुधारने के लिए किया जाता है।
दरअसल यह घुटनों में होने वाले घिसाव और क्षय को रोकने और आर्थराइटिस में सुधार के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत शरीर के अंदर डाले जाने वाले कृत्रिम टुकड़े (अवयव) और अंगों के मिलान के साथ घुटनों में स्थिरता लाई जाती है।
साथ ही इस घुटने के जरिये मरीज को चलाने की कोशिश की जाती है (एक खास गति रेंज को हासिल करने की कोशिश होती है। ) इससे पैर में पर्याप्त मूवमेंट आता है और मरीज की जीवन की गुणवत्ता बढ़ जाती है।
जब क्षतिग्रस्त घुटनों में सुधार न हो तो टीकेआर जरूरी हो जाता है। डॉक्टर घुटनों के खास एक्सरे से इसका पता लगा सकते हैं। अगर आपका घुटना क्षतिग्रस्त हो गया हो और इससे आपकी जिंदगी पर नकारात्मक असर पड़ रहा है तो आपको टीकेआर की जरूरत होगी। टीकेआर के तहत सर्जिकल तकनीक और प्रत्यारोपित की गई चीजों को संगत बना कर मरीज की जिंदगी को बेहतर बनाया जाता है।
टीकेआर को सफल बनाने के लिए सर्जिकल तकनीक अहम रोल अदा करती है। इसके अलावा नरम उत्तकों के संतुलन, हड्डी की धुरी का ठीक तरह से फिट होना (सामने और अगल-बगल) से और घुटनों के मुड़ने की जगह पर बने वर्गाकार जगह और गैप के विस्तार में संगति को देखा जाता है।
आम धारणा के विपरीत टीकेआर में पूरे घुटने को नहीं बदला जाता है। इसके बजाय घुटनों के घुस चुके किनारों के ऊपर कृत्रिम प्रत्यारोपण होता है। हम कंप्यूटर नेविगेशन की नई तकनीक के सहारा इस सर्जरी को करते हैं।
निर्णय लेने में होती है दिक्कत
आमतौर पर इसके लिए मैकेनिकल जुगाड़ का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए निर्णय लेने में खासी मशक्कत होती है। इसमें सर्जन की ओर कथित तौर पर काफी अनुमान लगाया जाता है। लेकिन बढ़िया से बढ़िया सर्जन के मामले में इससे जुड़े 30 फीसदी फैसले गलत होते हैं।
इसकी वजह है कि अलग-अलग मनुष्य की एनॉटोमी अलग-अलग होती है। इसलिए जरूरी नहीं है कि एक ही तरह की सर्जिकल तकनीक सभी मरीजों के मुफीद बैठेगी। कहने का मतलब यह है कि इस तरह की सर्जरी एक ही ढर्रे से नहीं हो सकती। साफ है कि जिस मरीज में कृत्रिम प्रत्यारोपण की उसके अंगों से तालमेल नहीं बैठती है उसमें ज्यादा सुधार नहीं हो पाता है। यहीं पर कंप्यूटर नेविगेशन सर्जन की मदद करती है ताकि वह सही अलाइनमेंट कायम कर सके। रिसर्च से यह दावा सही साबित हो चुका है।
घुटने के प्रत्यारोपण में हड्डियों को ठीक तरह से इस तरह काटा जाता है कि वह प्रत्यारोपित किए गए उपकरणों में फिट बैठ सकें। यह चरणबद्ध ऑपरेशन है। अगर एक कदम गलत हो जाता है तो इसका दूसरे पर असर पड़ता है। कंप्यूटर की मदद से कंप्यूटर के जरिये बनाए गए मॉडल पर सर्जन इसका अभ्यास कर सकता है और ऑपरेशन के चरण तय कर सकता है।
इसका मतलब यह है कि सर्जन को पता चल जाता है कि किसी खास चरण का मरीज पर क्या फर्क पड़ेगा। अगर कंप्यूटर से तैयार मॉडल पर कोई खास प्रक्रिया मुफीद नहीं बैठता है तो मरीज के ऑपरेशन के दौरान सर्जन इसमें बदलाव कर सकता है। कंप्यूटर नेविगेशन से सर्जन यह पता कर सकता है कि उसका कदम कितना सटीक है। इसके बाद ही वह आगे बढ़ेगा। इस तरह एहतियाती कदम उठा कर अत्याधुनिक कंप्यूटर उपकरण और समय की जरूरत होती है। लेकिन सबसे अहम है मुफीद फिटिंग। यानी प्रत्यारोपण शरीर के अंग के साथ फिट बैठता है या नहीं।
टेक्नोलॉजी का प्रयोग
नेविगेशन का पहली बार 1980 में इस्तेमाल हुआ था। क्लीनिकल तौर पर इसका इस्तेमाल 1990 में हुआ था। लेकिन मुख्य धारा की आर्थोपेडिक्स में पिछले सात साल के दौरान इसका इस्तेमाल हुआ।
टोटल ज्वाइंट री-प्लेसमेंट में इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन 1992 में शुरू हुआ। उस दौरान कैलिफोर्निया में विलियम बार्गर ने इसका इस्तेमाल किया था। उन्होंने कूल्हे के पूर्ण प्रत्यारोपण से जुड़ी सर्जरी में पहली बार कंप्यूटर की मदद ली थी। फ्रेडरिक पिकार्ड ने 1997 में पहली बार घुटने की सर्जरी में इंट्राऑपरेटिव कंप्यूटर नेविगेशन का इस्तेमाल किया था।
फिर उन्होंने 1993 में इस पर एक थीसीस लिखी। कंप्यूटर की सहायता से तैयार प्रणाली (सर्जिकल रोबोट) सक्रिय और गैर सक्रिय दोनों होते हैं। यानी ये सिस्टम खुद सर्जरी के किसी हिस्से को अंजाम नहीं देते। लेकिन सर्जिकल उपकरणों की पोजिशनिंग में मदद करते हैं। यानी यह बताते हैं कि सर्जरी के दौरान उपकरण कहां लगाया जाए।
सीएएस (कंप्यूटर असिस्टेड) की कई विशेषताएं हैं-
1. पारंपरिक तौर पर किए जाने वाले टीकेआर में उपकरणों का खिंचाव शून्य से 90 डिग्री में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन घुटने में मुड़ाव की जगह पर किसी भी कोण में आकार में गड़बड़ी का सीएएस से पता चल जाता है।
2. नरम उत्तक के तनाव की गणना की जाती है ताकि घुटनों को सही संतुलन दिया जा सके।
3. मैकेनिकल अंग की धुरी को सही तरह अपनी जगह पर बिठाने में मदद मिलती है।
4. खून के अत्यधिक बहाव को रोकता है।
5.. नरम उत्तक यानी एक मिमी. या एक डिग्री के तनाव में भी आंक़ड़ों की शुद्धता रहती है। सर्जन को फीडबैक मिलता है और वह सीएएस के लिए जरूरी गलतियों और डॉक्यूमेंटशन को ठीक कर सकता है।
लेकिन इसकी कुछ खामियां भी हैं। ये हैं
1. ऑपरेशन में काफी समय लगता है
2. कुछ निश्चित लर्निंग कर्व आते हैं
3. सिस्टम की खरीद और देखभाल में काफी लागत आती है।
4. पारंपरिक सर्जरी की तुलना में सीएएस के दीर्घावधि फायदे के कम सबूत मिलते हैं। खास कर प्रत्यारोपित उपकरण के ज्यादा देर टिकने और मरीज को होने वाले लाभ के संदर्भ में।
कितना हो रहा है प्रयोग?
सीएएस का काफी तेजी से प्रसार हो रहा है और इसके विकास की दिशा में काफी कुछ हो रहा है। ऑर्थोपेडिक्स में यह कई तरह से इस्तेमाल हो रहा है। घुटनों से लेकर कूल्हों के आर्थोप्लास्टिस से लेकर पिडकल स्क्रू में इसका इस्तेमाल हो रहा है।
बहरहाल इस मौजूदा सिस्टम की जगह इलेक्ट्रॉनिकमैगेनेटिक या दूसरे तरह के रजिस्ट्रेशन और ट्रैकिंग सिस्टम ले सकती हैं। दरअसल शरीर के अंदर किसी रजिस्ट्रेशन को न घुसाने से सक्रिय गति के दौरान अंग की थाह नहीं मिल पाती है। हो सकता है भविष्य में इसका समाधान हो सके।
सीएएस के पैरोकारों के सामने मुख्य चुनौती यह साबित करना है कि यह ठीक तरह से काम करता है। यह टीकेआर क्लीनिकल नतीजों में सुधार लाता है और सस्ता है। निकट भविष्य में मशीनरी के दाम गिरने और प्रयोग के दौरान होने वाले अनुभव घटने से नेविगेशन सिस्टम की लोकप्रियता बढ़ेगी। यह सर्जरी की रूटीन का एक अनिवार्य हिस्सा हो जाएगी।
यहां यह भी जानना जरूर है कि टीकेआर सर्जरी के जरिये प्रोथिसिस सर्वाइवल रेट काफी ज्यादा है और यह 15-20 साल तक चलता है। कंप्यूटर नेविगेशन के आने से सर्जरी के दौरान अलाइनमेंट के मामले में नए सिरे से उत्साह जगा है। केटीआर में काफी चीजें सरल हो जाती हैं। इस सिस्टम में आगे तरक्की होती रहेगी और हम घुटनों के प्रत्यारोपण को लंबे समय तक चलाने के लिए कोशिश करते रहेंगे।