बॉस आप पर चिल्लाएं तो उन्हें यह बात जरूर बताएं
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दफ्तर में आपके व्यवहार से आपका कॅरियर बन सकता है या फिर सदा के लिए बिगड़ सकता है।
लेकिन दबाव में हम हमेशा अच्छा नहीं कर पाते। कई बार गुस्से में चीखने और अपने सहकर्मियों या किसी दूसरे पर चिल्लाने का दिल चाहता है।
कब शांत रहना है और कब आवाज़ ऊंची करनी है, या फिर कब विस्फोटक स्थिति से चुपचाप निकल जाना है, इन सबमें बेहद नाजुक संतुलन होता है।
लिंक्ड इन पर कई विशेषज्ञों ने बीते सप्ताह इस विषय पर अपनी राय रखी। क्या कहते हैं ये विशेषज्ञ।
चिल्लाना कब स्वीकार्य हो सकता है?
मोराग बैरेट, स्काई टीम की संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी के अनुसार, तभी जब बहुत जरूरी हो जाए। जब जीवन और मौत का प्रश्न हो, या फिर आने वाली किसी विपदा के बारे में सूचना देनी हो। या फिर आसपास काफी शोर हो और बिना चिल्लाए आपको सुना जाना संभव नहीं हो।
तब भी जब चिल्लाने का पॉज़िटिव नतीजा निकलने वाला हो। या फिर आप किसी को चीयर कर रहे हों। कई बार यह आपके अंदर की आवाज़ भी हो सकती है। कई बार आप एकांत में भी चिल्लाते हैं जब काफी निराश हों और अच्छा करना चाहते हों।
कब नहीं चिल्लाना चाहिए?
वैसे चिल्लाने से टीम और उस शख्स, दोनों को नुकसान हो सकता है। ऐसे कब चिल्लाना चाहिए, ये जानना बेहद महत्वपूर्ण है। मेरे ख्याल से इमोशनल इंटेलिशेंस (भावनात्मक बुद्धिमता) का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए कुछ पहलुओं पर सोचना अहम है।
आत्म जागरूकता-हमें कब गुस्सा आ सकता है, इसके बारे में जानना जरूरी।
आत्म प्रबंधन-खुद के गुस्से पर काबू करना चाहिए, अपनी प्रतिक्रिया जताने का तरीका चुनना चाहिए।
सहानुभूति-दूसरे लोगों की जरूरत के मुताबिक तालमेल बिठाना सीखना चाहिए। अपनी कहने के बाद दूसरों की राय सुनें, उनका नजरिया भी समझें।
संबंधों का प्रबंधन- हमें ये देखना चाहिए कि हमारे चिल्लाने का दीर्घकालीन असर क्या होगा। आपसी रिश्तों पर शार्ट टर्म असर के बारे में नहीं सोचना चाहिए।
चिल्लाना या फिर अपनी बात जोरदार अंदाज में रखने का फैसला बिलकुल आपका अपना फैसला है।
लेकिन आवाज ऊंची करने से पहले ये जरूर देखना चाहिए कि सुनने वालों की जरूरत क्या है।
बर्नर्ड मार, एडवांस्ड परर्फोमेंस इंस्टीच्यूट के सीईओ का मत
आपमें और गोल्फर रोरी मैकलराय में क्या अंतर है। दरअसल समझने की बात यह है कि आम व्यक्ति में पेशेवर एथलीट में अंतर यही है कि वह दबाव के पलों में भी बेहतर करने की क्षमता रखता है।
हाऊ टू परफॉर्म अंडर प्रेशर नामक पोस्ट में मैंने लिखा है कि किस तरह से हम अपनी मानसिकता को पेशेवर एथलीट जैसा बना सकते हैं।
दरअसल, ये काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसी स्थिति को कैसे देखते हैं। खेल की दुनिया से जु़ड़े मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक किसी भी स्थिति में शुरुआती पलों में हमारी प्रतिक्रिया से दबाव कम हो सकता है।
क्या हम किसी भी परिस्थिति को चुनौती के तौर पर देखते हैं या फिर उसे ख़तरा मानते हैं या फिर उससे डर जाते हैं?
इन रणनीतियों को अपनाएं
कुछ रणनीतियों पर अमल करके दबाव के पलों में हम बेहतर करने की क्षमता विकसित कर सकते हैं। ये हैं इसकी कुछ रणनीतियां-
तैयारी करें। थोड़ी तैयारी और करें- जिन परिस्थितियों के लिए हम तैयार नहीं होते हैं उनमें बेहतर करने का दबाव हमारे अंदर डर पैदा करता है। हम डरते हैं कि स्टेज पर प्रदर्शन करने के दौरान हम कहीं अपनी लाइंस न भूल जाएँ, कहीं मूर्ख न नज़र आएँ। ये भी डर सताता है कि कहीं तकनीक तो धोखा नहीं दे जाएगी, कहीं हम स्टेज पर गिर तो नहीं जाएँगे। ऐसे डरों से निपटने का एक ही तरीका है कि आप खूब अभ्यास करें। आप अपने प्रेजेंटेशन पूरी तरह तैयारी करें और हर कदम को दोहराएँ। ख़ासकर तकनीक को जांच लें। जो भी संभव अभ्यास हो वो कर लें।
साकारात्मक सोचें- खुद से पॉजिटिव नज़रिए से बात करें। दिमाग में कुछ भी निगेटिव आ सकता है- मसलन मैं गिर जाऊंगा, लोग मुझ पर हंसेगे। मैं इसे नहीं कर पाऊंगा। इन सबसे तनाव बढ़ता है। इन सबसे बचने के लिए खुद को तीन पॉजिटिव मंत्र दें- गहरी सांस ले, ध्यान केंद्रित रखें और सोंचे कि बहुत अच्छा होगा।
इन तकनीकों के इस्तेमाल से आम तौर पर ज्यादा दबाव में अच्छा नहीं कर पाने वाले भी राहत महसूस करते हुए अच्छा कर पाते हैं।