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पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है यादों का सफर

Tue, 03 Dec 2013 03:02 PM IST
Updated Tue, 03 Dec 2013 03:02 PM IST
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memory travel through dna
जानवरों पर किए गए शोधों से पता चला है कि 'यादें' वंशानुगत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी में जाती हैं और इनसे आने वाली पीढ़ियों का व्यवहार प्रभावित हो सकता है।
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प्रयोगों से साबित हुआ है कि दहला देने वाली किसी घटना से शुक्राणु में डीएनए प्रभावित हो सकता है और इससे आने वाली पीढ़ियों के दिमाग और व्यवहार में बदलाव हो सकता है।
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नेचर न्यूरोसाइंस के शोध के मुताबिक़ किसी ख़ास गंध से दूर रहने के लिए प्रशिक्षित किए चूहों का यह गुण उनकी तीसरी पीढ़ी में भी देखा गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस शोध के परिणाम फ़ोबिया और बेचैनी से संबंधित अनुसंधान के लिए अहम है।

चूहों को चेरी ब्लॉसम के समान गंध से दूर रहने के लिए प्रशिक्षित किया गया था।

प्रयोग
अमरीका के एमोरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेडिसिन के शोधकर्ताओं की टीम ने फिर इस बात पर ग़ौर किया कि शुक्राणु के भीतर क्या हो रहा है।

उन्होंने पाया कि चूहे के शुक्राणु में चेरी ब्लॉसम की गंध के लिए ज़िम्मेदार डीएनए का एक हिस्सा ज़्यादा संवेदनशील हो गया है।

चूहे के बच्चे और उनके बच्चे चेरी ब्लॉसम की गंध को लेकर ज़्यादा संवेदनशील थे और इस गंध से बचने की कोशिश में रहते थे। ऐसा तब था जबकि उन्होंने अपने जीवन में कभी भी इस गंध का अनुभव नहीं लिया था।

साथ ही उनके दिमागी ढाँचे में भी बदलाव देखा गया।

रिपोर्ट कहती है, "एक पीढ़ी का अनुभव आने वाली पीढ़ियों की तंत्रिका तंत्र के ढाँचे और कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है।"
पीढ़ी दर पीढ़ी

इस शोध के परिणाम इस बात का प्रमाण हैं कि एक पीढ़ी का अनुभव वंशानुगत रूप से दूसरी पीढ़ी में आता है। यानी माहौल से किसी की आनुवांशिकी प्रभावित हो सकती है जो आगामी पीढ़ियों में भी जा सकती है।


शोधकर्ताओं में से एक डॉक्टर ब्रायन डियास ने बीबीसी से कहा, "यह एक प्रक्रिया हो सकती है जिससे वंशजों में पूर्वजों के लक्षण दिखते हैं।"

उन्होंने कहा, "इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं है कि शुक्राणु और अंडाणु में जो कुछ होता है उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।"

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर मार्कस पेम्ब्रे का कहना है कि इस शोध के परिणाम फ़ोबिया, उत्कंठा और अवसाद में अनुसंधान के लिए काफ़ी अहम है और इससे साबित होता है कि एक पीढ़ी की यादें दूसरी पीढ़ी में जा सकती हैं।

उन्होंने कहा, "जनस्वास्थ्य से जुड़े शोधकर्ताओं को मानव के संबंध में इसे गंभीरता से लेने के समय आ गया है। इसे समझे बिना हम दिमागी बीमारियों, मोटापे, मधुमेह और पाचन में गड़बड़ी जैसी बीमारियों के बढ़ने के कारण को समझ नहीं पाएंगे।"
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