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क्या वाकई होते हैं जादू की झप्पी के फायदे?

Thu, 07 Nov 2013 05:00 PM IST
Updated Thu, 07 Nov 2013 05:00 PM IST
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kindness movement in world

सड़क से कूड़ा उठाने, किसी को एक कॉफ़ी पिलाने या बस यूं ही गले लगा लेना। अंजान लोगों के लिए भी भलाई करने की प्रवृत्ति लोगों में बढ़ रही है लेकिन क्या वाकई इस तरह से समाज ज़्यादा दरियादिल बनता है?

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एलिसा हर हफ़्ते सिंगापोर की गलियों में कूड़ियां उठाती हैं। वो गंदगी में छिपा कोई ख़ज़ाना नहीं ढूंढ रही हैं। उनका मकसद सिर्फ शहर को साफ बनाना है।

एलिसा कहती हैं मैं लोगों को हर रोज कूड़ा उठाने के लिए प्रेरित करना चाहती हूं।

हाल ही में उन्होने एक लॉरी चलाने वाले का पीछा किया जिसने सड़क पर एक प्लास्टिक बैग फेंक दिया था। वे कहती हैं ‘‘वो सहमा हुआ था और माफ़ी भी मांग रहा था।’’
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नेकी की मुहिम

एलिसा शहर के उन चंद निवासियों में शामिल हैं जो सिंगापोर काइंडनेस मूवमेंट से प्रभावित हैं। इस मुहिम का मकसद लोगों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।

इस मुहिम के मुखिया विलियम वॉन कहते हैं कि ‘‘इससे निश्चित तौर पर अंतर पड़ता है। हमने कुछ सामाजिक तौर तरीकों को अपना लिए जाने की प्रवृत्तियों को बदला है। लोग अब बसों में अपनी सीट दे देते हैं जो वो पहले कभी नहीं करते थे।’’
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इसी तरह की एक अन्य संस्था रैंडम ऐक्ट्स ऑफ़ काइंडनेस फ़ाउंडेशन की स्थापना डेनवर में भी की गई थी जब 1993 में दर्ज़नो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जिसमें कई बच्चे शामिल थे।इसमें एक बच्चे की उम्र केवल 10 महीने थी।

इस संस्था ने लेखक ऐन हरबर्ट की लिखी पंक्ति ‘दरियादिली के निरूद्देश्य और ख़ूबसूरती के बेमतलब काम करो।’इस वाक्य को स्टिकर और पायदानों के जरिए पूरे अमरीका में लोकप्रिय बनाया गया।

फ़ाउंडेशन की एक निदेशक केल्सी ग्राएनाएविश पड़ोसियों के दरवाज़े पर खाने के अनाम पैकेट छोड़ने औऱ कॉफ़ी शॉप के बाहर लगी लाइन में अपने पीछे खड़े व्यक्ति का बिल चुकाने जैसे काम करने की वक़ालत करती हैं।

केल्सी कहती हैं कि ''यह कभी कभार ऐसा काम करने की बात नहीं है। ज़रूरत है अपनी मानसिकता में बदलाव की।''

दरियादिली का माप

इस तरह की संस्थाओं का असर मापना आसान नहीं है।हर साल चैरिटी एड फ़ाउंडेशन एक वर्ल्ड गिविंग इंडेक्स प्रकाशित करती है जिसमें 146 देशों के ‘इच्छा से देने की प्रवृत्ति’ का पता लगाया जाता है।

यह डाटा एक शोध फर्म गैलप के सालाना पोल से लिया जाता है औऱ इसमें हिस्सा लेने वाले लोगों और उनकी अंजानों को सहायता देने व हर महीने पैसे दान की प्रवृत्ति के अनुपात में देशों का रैंक निर्धारित किया जाता है।

पिछले साल ऑस्ट्रेलिया पहले स्थान पर था जहां एक तिहाई जनसंख्या का दो तिहाई हिस्सा अंजानो की सहायता करने और चैरिटी में पैसे दान करने का दावा करता है।

चैरिटी एड फ़ाउंडेशन की ऑस्ट्रेलिया शाखा की लीसा ग्राइनहैम कहती हैं कि इस संख्या में इज़ाफ़ा क्वींसलैंड और विक्टोरिया में एक साल पहले आई बाढ़ के बाद हुआ है। उनका इशारा इस बात की तरफ़ है कि यह संख्या राष्ट्रीय आपदा के वक्त बढ़ती है।

हालांकि वैश्विक स्तर पर स्थिति अलग है। चैरिटीज़ एड फ़ाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी जॉन लॉ कहते हैं कि जानकारी परेशान करने वाली है। वैश्विक मंदी के चलते दान औऱ दया के मामलों में लाखों की संख्या में कमी आई है।

साल 2012 में वर्ल्ड गिविंग इंडेक्स में सिंगापोर का स्थान 91 से गिर कर 114 हो गया। सिंगापोर काइंडनेस मूवमेंट के विलियम वॉन कहते हैं कि घरों और यातायात की बढ़ती क़ीमतों के चलते रोज़ी-रोटी का प्रश्न इस गिरावट की वजह है।

दया का पाठ

अमरीका का स्थान पहले से पांचवे पर पहुंच गया जहां एक अकादमिक टीम स्कूलो में संवेदना के पाठ पढ़ा रही है ताकि इस प्रवृत्ति को बदला जा सके।

दया का ये पाठ फिलहाल विस्कोंसिन के 10 स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है। हालांकि हर कोई इस बात से सहमत नहीं है कि इस तरह से दया की सीख का नतीजा हो सकता है।

मिशिगन के ओकलैंड विश्वविद्यालय की बारबरा ओकली कहती हैं कि ''दया को एक पवित्र विषय बना दिया गया है जिसकी वजह से हम इसके हानिकारक असर के प्रति अंधे हो गए हैं।''

वो कहती हैं कि हमने दया के सिद्धांत सांस्कृतिक धुन बना दिया है।

''यह एक भ्रम है कि सहानुभूति दुनिया में हर चीज़ का इलाज है। दूसरों की सहायता करना दरअसल आत्ममुग्ध होने की वजह से होता है। आम तौर पर जिसे हम लोगों की ज़रूरत समझते हैं अक्सर वह उनकी ज़रूरत नहीं होती।''

लेकिन रैंडम ऐक्ट्स ऑफ़ काइंटनेस फाउंडेशन की एक निदेशक केल्सी ग्राएनाएविश कहती हैं कि उनकी संस्था पर यह आरोप नहीं लगाए जा सकते। वो कहती हैं कि उनकी गतिविधियों के वास्तविक औऱ ठोस फ़ायदे नज़र आते हैं।


सिंगापोर में विलियम वॉन कहते हैं ''हमें वास्तविक होना चाहिए। दया से जुड़ी मुहिम सारी समस्याओं का हल नहीं कर सकती लेकिन अगर वह हमारी कुछ समस्याएं सुलझा सकती हैं तो फिर क्यों ना उनका इस्तेमाल किया जाए।''

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