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अस्पताल की सुविधा और देखभाल, घर जैसा आराम
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 22 Feb 2016 01:35 PM IST
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अत्यधिक गंभीर चिकित्सकीय परिस्थितियों की गिरफ्तमें होने पर घर का आराम एक ऐसी चीज है जिसें हम अस्पताल के नीरस माहौल के मुकाबले पसंद करेंगे। सिपला पैलिएटिव केयर इंस्टीट्यूट, पुणे द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया में दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश में रहने वाले करीब 83 फीसदी भारतीय ऐसा ही मानते हैं और फिर भी ज्यादातर लोग अपना आखिरी वक्त या चिकित्सकीय रूप से दर्द भरा समय अस्पतालों में ही बिताते हैं। यही वजह है कि दुनिया भर में और अब भारत में भी पैलिएटिव केयर नामक एक विशेषज्ञता की ओर लोग तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
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पैलिएटिव केयर के तहत कैंसर, वृद्धावस्था से संबंधित दशाओं या चोट लगने जैसी गंभीर स्वास्थ्य दशाओं मेंमरीजों को पेषेवर चिकित्सकीय सुरक्षा टीम घर जैसे आराम में मुहैया कराई जाती है। संपूर्ण देखभालमें न सिर्फ मरीजों की देखभाल के शारीरिक बल्कि सामाजिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक पहलुओं का अच्छी तरह ध्यान रखा जाता है। ज्यादातर गंभीर बीमारियां न सिर्फ उनका सामना कर रहे व्यक्ति को बल्कि उसका खयाल रख रहे लोगों यानी परिवार के सदस्यों को भी प्रभावित करती हैं जिन्हें अपने खुद के जीवन की जरूरतों से समझौता करना होता है, अपने प्रिय व्यक्ति को बीमारी से जूझते हुए देखने की भावनात्मक परेशानी का सामना करना होता है और मरीज की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए संसाधन भी जुटाने होते हैं।
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पैलिएटिव केयर जरूरत पड़ने पर जांच के स्तर से लेकर मृत्यु के बाद तक अप्रत्यक्ष देखभाल और प्रत्यक्ष समर्थन मुहैया कराताहै। ब्रिटिश बाजार में 80 बाजार हिस्सेदारी रखने वाला हेल्थकेयर एट होम (एचसीएएच) व्यक्तिगत देखभाल, घरेलू देखभाल, सहायक देखभाल, सामाजिक देखभाल और नर्सिंग देखभाल सहित एंड ऑफ लाइफ केयर (ईओएलसी) की व्यापक श्रृंखला मुहैया कराता है। चिकित्सकीय उपकरण मुहैया कराने से लेकर दवाएं खरीदने के लिए प्रमाणित नर्सों और उपचार कर रहे डॉक्टरों के साथ समन्वय बनाने तक हमारा ब्रांड गंभीर चिकित्सकीय आपातकालीन परिस्थितियों और कैंसर सहित लंबी अवधि तक चलने वाली बीमारियों की परेशानी को आसान बनाता है।
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हालांकि एचसीएएच जैसी निजी इकाइयां पूरे देश में सेवाएं मुहैया कराती हैं लेकिन ग्रामीण भारत में पैलिएटिव केयर की सुविधाना के बराबर मौजूद है। यह दुख बात है क्योंकि 'एंड ऑफ लाइफ केयर पॉलिसी फॉर द डाइंगः कंसेंसस पोजिशन स्टेटमेंट ऑफ इंडियन एसोसिएशन ऑफ पैलिएटिव केयर' जैसे अध्ययन बताते हैं कि घर पर एंड ऑफ लाइफ केयर (ईओएलसी) भारत की जरूरत के मुताबिक सबसे सस्ता, प्रासंगिक और व्यावहारिक विकल्प है। इसलिए यहां सरकार को प्रयास करने की जरूरत है।
एक विशेषज्ञता के तौर पर पैलिएटि वकेयर की शरुआत पश्चिम में वर्ष 1960 से हुई थी और अब गैर-संक्रामक बीमारियों को बढ़ते हुए देखकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का ध्यान भी इस ओर गया है। डब्ल्यूएचओ ने मई, 2014 में आयोजित 67वें विश्व स्वास्थ्य सम्मेलन में चिकित्सा सेवा के इस पहलू के प्रति संज्ञान लिया जब नेशनल हेल्थ सर्विसेज में पैलिएटिव केयर को एकीकृत करने का निर्णय लिया गया। इसके अलावा स्नातक एवं स्नातकोत्तर मेडिकल एवं नर्सिंग पाठ्यक्रमों के तहत इस विशेषज्ञता में नर्सों और डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने की जरूरत को भी स्वीकार किया गया।
महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों द्वारा एक निश्चित पैलिएटिव केयर नीति घोषित किए जाने के साथ ही भारत में भी कुछ छोटे कदम उठाए गए हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ मरीजों को इसकी जरूरत है-इनमें से 10 लाख लोग कैंसर और सत्तर लाख लोग जीवन को सीमित कर देने वाली बीमारियों से पीडि़त हैं।
इनमें से करीब दस लाख लोग अकेले महाराष्ट्र में ही रहते हैं और ग्रामीण इलाकों में गंभीर हालत को देखते हुए सरकार के लिए जरूरी विशेषज्ञता और सेवाओं के साथकदम बढ़ाना जरूरी है। चिकित्सा सेवा के इस पहलूको ध्यान में रखते हुए एम्स द्वारा एमडी पाठ्यक्रम की शुरुआत करने का मतलब है कि अब अधिक संख्या में चिकित्सकीय और नर्सिंग स्नातक पैलिएटिव केयर के क्षेत्र में काम करेंगे।
हम सरकार के प्रयासों की सराहना करते हैं और इस दिशा में काम कर रहे हैं ताकि अधिक नागरिकों को यह सुविधा मुहैया कराई जा सके ताकि वे बीमारी का हमला होने पर अपने भावनात्मक और षारीरिक सेहत जैसी महत्वपूर्ण चीजों पर गौर कर सकें।