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सर्दी-जुकाम में लेते हैं एंटीबायोटिक दवाएं तो पढ़ें यह खबर

Wed, 14 May 2014 11:55 AM IST
Updated Wed, 14 May 2014 11:55 AM IST
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antibiotics resistant bacteria

मामूली सर्दी-जुकाम में भी एंटीबायोटिक फांकने वालों के लिए बुरी खबर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) का कहना है कि कुछ वर्षों से ऐसा लग रहा था कि सुपरबग (दवाओं से बेअसर बैक्टीरिया) की वजह से एंटीबायोटिक बीमारियों में कोई फायदा नहीं पहुंचा रहीं लेकिन अब इसके पुख्ता सुबूत मिलने लगे हैं।

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संगठन का कहना है कि एंटीबायोटिक का बेअसर होना कहीं भी, किसी भी उम्र में किसी भी देश में हो सकता है। लोगों के स्वास्थ्य के लिए यह बड़ा खतरा है।

डब्लूएचओ के असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल केजी फुकुडा का कहना है कि सारे संकेत यही हैं कि इस बड़ी समस्या से निपटना आसान नहीं होगा। भारत में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल में जिस तरह तेजी आई है वह भी चिंता का सबब है।
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एंटीबायोटिक के बेअसर होने संबंधी रिपोर्ट के बारे में डब्लूएचओ का कहना है कि 114 देशों से मिले आंकड़े दिखाते हैं कि असरदार से असरदार एंटीबायोटिक से भी सुपरबग बच रहे हैं और यह पूरी दुनिया में हो रहा है।
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छोटी सी चोट भी हो सकती है बड़ा खतरा

antibiotics resistant bacteria

फुकुडा का कहना है कि दुनिया अब एंटीबायोटिक से अगले दौर की ओर बढ़ रही है जहां मामूली संक्रमण और चोटों का इलाज भी मुश्किल होगा। इसकी वजह एंटीबायोटिक का गलत और ज्यादा इस्तेमाल है। यही वजह है कि बैक्टीरिया ने एंटीबायोटिक से पार पाने के नए तरीके विकसित कर लिए।

यौन संक्रमण से होने वाली गौनरिया बीमारी की चपेट में रोजाना लगभग दस लाख लोग आते हैं। लेकिन एंटीबायोटिक अब इस रोग में कारगर नहीं साबित हो रही।

आस्ट्रिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जापान, नार्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्लोवेनिया और स्वीडन में इस घातक बीमारी का अब कोई इलाज नहीं है।

नई दवाओं की है जरूरत

antibiotics resistant bacteria

पिछले कुछ दशकों में नई एंटीबायोटिक दवाओं पर बहुत कम काम हुआ है। इसलिए जल्दी से जल्दी नई दवाएं विकसित नहीं की गईं तो बहुत देर हो जाएगी।

एक सुपरबग एमआरएसए के नाम से विख्यात है, इसकी वजह से अकेले अमेरिका में हर साल 19 हजार लोगों की जान जाती है।

यह संख्या एचआईवी और एड्स की तुलना में ज्यादा है। कुछ देशों में अस्पताल से होने वाले संक्रमण में ताकतवर एंटीबायोटिक भी बेअसर हो रहे हैं।

न्यूमोनिया, रक्त संक्रमण, आईसीयू में भर्ती मरीजों या नवजात शिशुओं पर कई बार दवा असर ही नहीं करती। ई कोली बैक्टीरिया से होने वाले यूरीनरी संक्रमण में भी एंटीबायोटिक कई बार बेअसर हो जाती हैं।

1980 में जब यह दवाएं पहली बार सामने आईं तो पूरी तरह असरदार थीं लेकिन अब आधे से ज्यादा मरीजों के लिए ये किसी काम की नहीं रहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब जल्द नई दवाएं विकसित करना जरूरी है।

एंटी बायोटिक के साइड इफेक्ट

antibiotics resistant bacteria

लगभग 70 साल पहले मामूली चोट में भी संक्रमण की वजह से लोगों की जान चली जाती थी।

एंटी बायोटिक दवाओं ने हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाए बिना संक्रमण करने वाले बैक्टीरिया का खात्मा करना शुरू किया। लेकिन बेवजह के इस्तेमाल से बात बिगड़ रही है।

बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना इसलिए खतरनाक होता है क्योंकि इसके साइड इफेक्ट भी होते हैं। दूसरा, इससे दवा से बेअसर रहने वाले सुपरबग्स की संख्या बढ़ती है।

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