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...और प्राण ने किया फिल्मफेयर लेने से इंकार

Wed, 18 Dec 2013 04:55 PM IST
अमर उजाला,मुंबई
अमर उजाला,मुंबई Updated Wed, 18 Dec 2013 04:55 PM IST
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when pran avoied film fare awards

यह किस्सा बहुत दिलचस्प है। जब खलनायक प्राण ने एक बड़ा फिल्म पुरस्कार लेने से मना कर दिया।

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अभिनेता प्राण अगर हिंदी सिनेमा के सबसे ज्यादा नफरत पाने वाले खलनायक थे तो फिल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा प्यार पाने वालों में से भी थे। वह एक सच्चे कलाकार थे। ऐसे कलाकार जो दूसरों की कला की भी कद्र करता है। यही कारण है कि एक बार उन्होंने फिल्मफेयर जैसा पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। और उसकी वजह भी अनोखी थी।

बात है 1970 के दशक की। चार फरवरी 1972 को फिल्म ‘पाकीजा’ सिनेमाघरों में लगी थी और लोगों ने बहुत ठंडे मिजाज से इसका स्वागत किया था। मीडिया में निराशाजनक समीक्षाएं लिखी गईं। फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही का वह सपना थी, जिसे पूरा होने में 15 साल लगे थे।
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तभी 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का निधन हो गया और सिनेमाघरों का नजारा बदल गया। लोगों को मीना कुमारी की जिंदगी की त्रासदी फिल्म में दिखने लगी और देखते-देखते ‘पाकीजा’ की किस्मत बदल गई।
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इस फिल्म को आज मीना कुमारी के साथ इसके गीत-संगीत के लिए याद किया जाता है। फिल्म में गुलाम मोहम्मद का संगीत था, जो उन दिनों टिकट खिड़की पर बिकाऊ नहीं समझे जाते थे। लोगों ने अमरोही को समझाया था कि संगीतकार बदल दो मगर वे नहीं माने थे। ‘पाकीजा’ के लिए साइन किए जाने वाले  गुलाम मोहम्मद सबसे पहले व्यक्ति थे।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 1972 में रिलीज हुई इस फिल्म के संगीत की रिकॉर्डिंग ‘पाकीजा’ के मुहूर्त से भी पहले दिसंबर 1955 में शुरू हो गई थी। कुछ ही महीनों में ‘इन्हीं लोगों ने’, ‘ठाड़े रहियो’ और ‘मौसम है आशिकाना’ जैसे गाने रिकॉर्ड कर लिए गए।

 इस बीच गुलाम मोहम्मद को फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ (1954) के संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। वे पुरस्कार लेकर लौटे तो उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। वे ठीक से स्वस्थ भी नहीं हुए और उन्होंने फिर से शुरू कर दिया। ‘पाकीजा’ के लिए कुल 14 गाने रिकॉर्ड किए गए, जिनमें से छह ही फिल्म में रखे गए। जिन्हें मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी, कैफ भोपाली और कमाल अमरोही ने लिखा था।

फिल्म की शूटिंग वर्षों तक चलती-रुकती रही और इसके पूरा होने के तीन साल पहले 1968 में गुलाम मोहम्मद का निधन हो गया। वे लोगों से हमेशा इस फिल्म की बात करते हुए कहते रहे कि पता नहीं, फिल्म पूरी होगी भी या नहीं।

खैर, जब फिल्म रिलीज हुई तो इसके गाने तेजी से हर जुबान पर चढ़ गए। पूरे साल इसका संगीत छाया रहा। परंतु जब 1972 के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार घोषित हुए तो सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार शंकर-जयकिशन को फिल्म ‘बेईमान’ के लिए मिला, न कि गुलाम मोहम्मद को।


इसी साल प्राण को भी फिल्म ‘बेईमान’ के लिए न केवल सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, बल्कि जब घोषणा हुई तो वही विजेता भी बने। परंतु जब प्राण ने देखा कि पुरस्कारों में गुलाम मोहम्मद के साथ न्याय नहीं किया गया है तो उन्होंने विरोधस्वरूप पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया।

(साभारः हार्पर कॉलिंस इंडिया द्वारा प्रकाशित मेघनाद देसाई की ‘पाकीजा’ से)


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