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अब जाकर स्पीड पकड़ी है मैंनेः शरमन जोशी
रवि बुले/ अमर उजाला,मुंबई
Updated Thu, 20 Mar 2014 07:39 AM IST
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कलाकारों के गुजराती परिवार से आने वाले शरमन जोशी ने बॉलीवुड में कम दिखने के बावजूद मजबूत जगह बनाई है। उनकी पहचान भरोसेमंद ऐक्टर की है। शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्म ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ में भूतों के बीच
वह जिंदा इंसान हैं।
फिल्म में आप एक लेखक का रोल प्ले कर रहे हैं। क्या आप खुद भी कुछ लिखते हैं?
मेरा मानना है कि लेखन सबसे खूबसूरत रचनात्मक कला है जो किसी के पास हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से इस जन्म में मुझसे यह नहीं हो सकेगा क्योंकि भगवान ने मुझे यह कला नहीं दी है। लेखक अपनी कल्पना से चीजों को जमीन पर उतार लता है। इसके बाद ही डायरेक्टर-ऐक्टर को पता होता है उन्हें क्या करना है।
लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में लेखक का नंबर आखिर में आता है...!
यह सही है। ऐसा होना नहीं चाहिए। दुनिया में कई जगहों पर ऐसी स्थिति नहीं है। मैं उम्मीद करता हूं कि हमारे यहां भी स्थितियां सुधरेंगी तो ज्यादा बेहतर चीजें सामने आ सकेंगी।
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मल्टीस्टार या सोलो हीरो के रूप में फिल्म करते हुए क्या बराबर दबाव रहता है या इसमें फर्क है?
यूं दबाव तो बराबर रहता है, लेकिन उन मल्टीस्टारर फिल्मों में यह बढ़ जाता है जहां आपको लीड करना होता है।
जैसे ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’। इसकी नाकामी में आपको सबसे ज्यादा धक्का लगने की आशंका होती है। अगर मैं आमिर खान या अजय देवगन के साथ मल्टीस्टारर करूंगा तो निश्तचित रूप से उस फिल्म की कमर्शियल कामयाबी की दबाव मुझसे ज्यादा उन पर होगा। जबकि सोलो में तो आप दबाव में रहते ही हैं।
फिल्म ‘रकीब’ (2007) में आपका रोल नेगेटिव था। फिल्म कामयाब नहीं रही। इसके बाद आपने ऐसा रोल नहीं
किया। क्या फिर नेगेटिव रोल ऑफर नहीं हुए?
नेगेटिव रोल तो कई बार ऑफर हुए, लेकिन उनमें ऐसा कुछ नहीं था जिसमें मजा आए। अगर मेरे पास अच्छा
नेगेटिव रोल आएगा तो जरूर करूंगा। मेरी पहली फिल्म ‘गॉडमदर’ में भी मेरा ग्रे शेड वाला रोल था।
आपकी दो फिल्मों के बीच अच्छा खासा अंतराल होता है। रोल चुनने में आपकी काफी पसंद-नापंसद होती है!
यह बात सही है। असल में ऐसे रोल की तलाश होती है जो दिल को छू ले। फिर उसमें वक्त लग जाए तो लग जाए। लेकिन इस साल ऐसा नहीं होने वाला। तीन फिल्में रिलीज होंगी। ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ के बाद इंद्र कुमार साब की ‘सुपर नानी’। फिर तुरंत बाद ‘1920 लंदन’। अब मैंने भी स्पीड पकड़ी है। सब ठीक रहा तो अगले साल भी आपको मेरी तीन फिल्में देखने मिलेंगी।
आमिर, अजय या रेखा जैसे बड़े सितारों के साथ काम करते हुए कभी डर रहता है कि आपका काम छुप जाएगा।
आप बरगद के साये में हैं...!
ऐसा नहीं होता। आज के जमाने में हमारे पास तैयार स्क्रिप्ट्स होती हैं और हमें पता होता है कि हमारा क्या रोल
है। कैसा है। उसकी कहानी में कितनी अहम जगह है। ऐसे में आपके सामने सब कुछ खुला होता है। आजकल सब
प्रोफेशनल हो गया है तो किसी गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होती है।
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वह जिंदा इंसान हैं।
फिल्म में आप एक लेखक का रोल प्ले कर रहे हैं। क्या आप खुद भी कुछ लिखते हैं?
मेरा मानना है कि लेखन सबसे खूबसूरत रचनात्मक कला है जो किसी के पास हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से इस जन्म में मुझसे यह नहीं हो सकेगा क्योंकि भगवान ने मुझे यह कला नहीं दी है। लेखक अपनी कल्पना से चीजों को जमीन पर उतार लता है। इसके बाद ही डायरेक्टर-ऐक्टर को पता होता है उन्हें क्या करना है।
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लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में लेखक का नंबर आखिर में आता है...!
यह सही है। ऐसा होना नहीं चाहिए। दुनिया में कई जगहों पर ऐसी स्थिति नहीं है। मैं उम्मीद करता हूं कि हमारे यहां भी स्थितियां सुधरेंगी तो ज्यादा बेहतर चीजें सामने आ सकेंगी।
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मल्टीस्टार या सोलो हीरो के रूप में फिल्म करते हुए क्या बराबर दबाव रहता है या इसमें फर्क है?
यूं दबाव तो बराबर रहता है, लेकिन उन मल्टीस्टारर फिल्मों में यह बढ़ जाता है जहां आपको लीड करना होता है।
जैसे ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’। इसकी नाकामी में आपको सबसे ज्यादा धक्का लगने की आशंका होती है। अगर मैं आमिर खान या अजय देवगन के साथ मल्टीस्टारर करूंगा तो निश्तचित रूप से उस फिल्म की कमर्शियल कामयाबी की दबाव मुझसे ज्यादा उन पर होगा। जबकि सोलो में तो आप दबाव में रहते ही हैं।
फिल्म ‘रकीब’ (2007) में आपका रोल नेगेटिव था। फिल्म कामयाब नहीं रही। इसके बाद आपने ऐसा रोल नहीं
किया। क्या फिर नेगेटिव रोल ऑफर नहीं हुए?
नेगेटिव रोल तो कई बार ऑफर हुए, लेकिन उनमें ऐसा कुछ नहीं था जिसमें मजा आए। अगर मेरे पास अच्छा
नेगेटिव रोल आएगा तो जरूर करूंगा। मेरी पहली फिल्म ‘गॉडमदर’ में भी मेरा ग्रे शेड वाला रोल था।
आपकी दो फिल्मों के बीच अच्छा खासा अंतराल होता है। रोल चुनने में आपकी काफी पसंद-नापंसद होती है!
यह बात सही है। असल में ऐसे रोल की तलाश होती है जो दिल को छू ले। फिर उसमें वक्त लग जाए तो लग जाए। लेकिन इस साल ऐसा नहीं होने वाला। तीन फिल्में रिलीज होंगी। ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ के बाद इंद्र कुमार साब की ‘सुपर नानी’। फिर तुरंत बाद ‘1920 लंदन’। अब मैंने भी स्पीड पकड़ी है। सब ठीक रहा तो अगले साल भी आपको मेरी तीन फिल्में देखने मिलेंगी।
आमिर, अजय या रेखा जैसे बड़े सितारों के साथ काम करते हुए कभी डर रहता है कि आपका काम छुप जाएगा।
आप बरगद के साये में हैं...!
ऐसा नहीं होता। आज के जमाने में हमारे पास तैयार स्क्रिप्ट्स होती हैं और हमें पता होता है कि हमारा क्या रोल
है। कैसा है। उसकी कहानी में कितनी अहम जगह है। ऐसे में आपके सामने सब कुछ खुला होता है। आजकल सब
प्रोफेशनल हो गया है तो किसी गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होती है।