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जब डाकुओं ने साहिर को पूरी इज्जत से जाने दिया..

Sun, 25 Oct 2015 11:51 AM IST
Updated Sun, 25 Oct 2015 11:51 AM IST
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sahir ludhianvi 35th death anniversary

'साढे पांच फुट का कद, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फुट का हो जाए, लंबी लंबी लचकीली टांगें, पतली सी कमर, चौडा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग, सरकश नाक, खूबसूरत आंखें, आंखों से झींपा –झींपा सा तफक्कुर, बडे बडे बाल, जिस्म पर कमीज, मुडी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन।' ये थे साहिर लुधियानवी, उनके दोस्त और शायर कैफी आजमी की नजर में।

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साहिर को करीब से जानने वाले उनके एक और दोस्त प्रकाश पंडित उनकी झलक कुछ इस तरीके से देते हैं, 'साहिर अभी अभी सो कर उठा है (प्राय: 10-11 बजे से पहले वो कभी सो कर नहीं उठता) और नियमानुसार अपने लंबे कद की जलेबी बनाए, लंबे लंबे पीछे को पलटने वाले बाल बिखराए, बडी बडी आंखों से किसी बिंदु पर टिकटिकी बांधे बैठा है (इस समय अपनी इस समाधि में वो किसी तरह का विघ्न सहन नहीं कर सकता... यहां तक कि अपनी प्यारी मांजी का भी नहीं, जिनका वो बहुत आदर करता है) कि यकायक साहिर पर एक दौरा सा पडता है और वो चिल्लाता है- चाय!'
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'और सुबह की इस आवाज के बाद दिन भर, और मौका मिले तो रात भर, वो निरंतर बोले चला जाता है। मित्रों- परिचितों का जमघटा उस के लिए दैवी वरदान से कम नहीं। उन्हें वो सिगरेट पर सिगरेट पेश करता है (गला अधिक खराब न हो इसलिए खुद सिगरेट के दो टुकडे करके पीता है, लेकिन अक्सर दोनों टुकडे एक साथ पी जाता है।) चाय के प्याले के प्याले उनके कंठ में उंडेलता है और इस बीच अपनी नज्मों- गजलों के अलावा दर्जनों दूसरे शायरों के सैकडों शेर, दिलचस्प भूमिका के साथ सुनाता चला जाता है।'

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'ऐ नौजवान, ये पूछों पैदा क्यों हुए'

sahir ludhianvi 35th death anniversary

एक बार पंजाब के एक शायर नरेश कुमार शाद को साहिर लुधियानवी का इंटरव्यू लेने का मौका मिला। जैसा कि रिवाज होता है उन्होंने पहला सवाल दागा, 'आपकी पैदाइश कहां और कब हुई?' साहिर ने जवाब दिया, 'ऐ जिद्दत पसंद नौजवान, ये तो बडा रवायती सवाल है। इस रवायत को आगे बढाते हुए इसमें इतना इजाफा और कर लो- क्यों पैदा हुए?'

विभाजन के बाद साहिर पाकिस्तान चले गए। नामी फिल्म निर्देशक और उपन्यासकार ख्वाजा अहमद अब्बास ने उनके नाम 'इंडिया वीकली' पत्रिका में एक खुला पत्र लिखा।

अब्बास अपनी आत्मकथा 'आई एम नॉट एन आईलैंड' में लिखते हैं, 'मैंने साहिर से अपील की कि तुम वापस भारत लौट आओ। मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब तक तुम अपना नाम नहीं बदलते, तुम भारतीय शायर ही कहलाओगे। हां ये बात अलग है कि पाकिस्तान भारत पर हमला कर लुधियाना पर कब्जा कर ले।'

'मुझे खासा आश्चर्य हुआ जब इस पत्रिका की कुछ प्रतियां लाहौर पहुंच गईं और साहिर ने मेरा पत्र पढा। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब साहिर ने मेरी बात मानी और अपनी बूढी मां के साथ भारत वापस आ गए और न सिर्फ उर्दू अदब बल्कि फिल्मी दुनिया में काफी नाम कमाया।'

इस नास्तिक ने नाहक ही शाहजहां की बेइज्जती की

sahir ludhianvi 35th death anniversary

जब साहिर की गजल 'ताजमहल' प्रकाशित हुई तो हर खास-ओ-आम की जबां पर चढ गई। तारीफ के साथ साथ कुछ दक्षिणपंथी उर्दू अखबारों ने साहिर की ये कह कर आलोचना की कि उन जैसे एक नास्तिक शख्स ने बिना वजह महान सम्राट शाहजहां की बेइज्जती की है। गजल का एक शेर था-

ये चमनजार, ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक्कश दरो-दीवार, ये मेहराब, ये ताक।

एक शहनशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम गरीबों की मोहब्बत का उडाया है मजाक।

दिलचस्प बात ये है कि इसे लिखने से पहले साहिर न तो कभी आगरा गए थे और न ही उन्होंने ताजमहल देखा था। अपने एक दोस्त साबिर दत्त को इसकी सफाई देते हुए साहिर ने कहा था, 'इसके लिए मुझे आगरा जाने की क्या जरूरत थी? मैंने मार्क्स का फलसफा पढा हुआ था। मुझे मेरा भूगोल भी याद था। ये भी पता था कि ताजमहल जमुना के किनारे शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल के लिए बनवाया था।'

'मुझे पहली बार किसी ने रॉयल्टी दी है'

sahir ludhianvi 35th death anniversary

साहिर से जुडा एक दिलचस्प किस्सा स्टार पब्लिकेशंस के प्रमुख अमर वर्मा सुनाते हैं जो उनके दोस्त भी थे और प्रकाशक भी। वो बताते हैं, 'मेरी उनसे पहली मुलाकात 1957 में दिल्ली में हुई थी। मैंने स्टार पॉकेट बुक्स में एक रुपये कीमत में एक सिरीज शुरू की थी। मैं चाहता था कि उसकी पहली किताब साहिर साहब की हो।

मैंने कहा कि मैं आपकी किताब छापने की इजाजत चाहता हूं। वो बोले मेरी तल्खियां करीब करीब दिल्ली के हर प्रकाशक ने छाप दी है बिना मेरी इजाजत लिए हुए। आप भी छाप दीजिए। जब मैंने जोर दिया तो उन्होंने कहा कि आप मेरे फिल्मी गीतों का मजमुआ छाप दीजिए, गाता जाए बनजारा के नाम से।'

'न भूलने वाली बात ये है कि कुछ वक्त बाद मैंने उन्हें बहुत झिझकते हुए रॉयल्टी का बासठ रुपए पचास पैसे का चेक भेजा। तय हुआ था कि मैं उनकी किताब की हजार प्रतियां छापूंगा और सवा छह फीसदी की रॉयल्टी दूंगा।

साहिर को इतनी छोटी रकम भेजते हुए मैं डर रहा था कि वो पता नहीं क्या सोचेंगे। साहिर का मेरे पास जवाब आया।।। आप इसे मामूली रकम मानते हैं। जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझे रायल्टी दी है। इस चेक को तो मैं जिंदगी भर भूल नहीं पाउंगा।'

दोस्त तय करते थे, पराठे खाएं या टोस्ट

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उनके दोस्त प्रकाश पंडित लिखते हैं, 'उनके दोस्त तय करते थे कि वो नाश्ते में पराठे आमलेट खाएं या टोस्ट मक्खन। साहिर की इन्हीं आदतों के कारण कभी कभी हम दोनों में ठन भी जाती थी। जब वो लिबास के बारे में मेरी राय लेता तो मैं बडी गंभीरता से कपडे छांट कर उसे अच्छा खासा कार्टून बना देता और नाश्ता तो मैंने उसे कई बार आइसक्रीम तक का करवाया। लेकिन धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि वो मजाक नहीं दया का पात्र है।

ये आदतें उसने खुद नहीं पालीं। इसकी तह में काम करती थीं वो परिस्थितियां, जिनमें उसने आंखें खोलीं, परवान चढा और जो अपने समस्त गुणों- अवगुणों के साथ उसके व्यक्तित्व का अंग बन गईं।' बंबई के उनके शुरू के दिनों में जब उन्हें कोई काम नहीं मिला तो उनके दोस्त मोहन सहगल ने उन्हें बताया कि मशहूर संगीतकार एसडी बर्मन एक गीतकार की तलाश में हैं। उस समय बर्मन ने खार में ग्रीन होटल में एक कमरा ले रखा था। उसके बाहर ‘प्लीज डू नॉट डिस्टर्ब’ का साइन लगा हुआ था।

इसके बावजूद साहिर सीधे बर्मन के कमरे में घुस गए और अपना परिचय कराया। एसडी बर्मन चूंकि बंगाली थे, इसलिए उर्दू साहित्य में साहिर के कद के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने साहिर को एक धुन दी। फिल्म की सिचुएशन समझाई और एक गीत लिखने के लिए दिया। साहिर ने बर्मन से वो धुन एक बार फिर से सुनाने के लिए कहा। जैसे ही बर्मन ने उसे हारमोनियम पर बजाना शुरू किया साहिर ने लिखा, 'ठंडी हवाएं, लहरा के आंए, रुत है जवां, तुम हो यहां, कैसे भुलाएं।'

साहिर जरा सी बात पर शरमा जाते थे

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इतने बडे शायर होने के बावजूद जरा सी बात पर उकता जाना, घबरा जाना या शरमा जाना साहिर का स्वभाव था। उन पर किताब लिखने वाले अक्षय मनवानी बताते हैं कि एक जमाने में छात्र नेता रहे साहिर लुधियानवी बडे जमघट को देख कर कभी उत्साहित नहीं होते थे।

'माइक्रोफोन के नजदीक जाते ही उनकी जुबान जैसे सिल जाती थी। सुनने वालों का एक वर्ग फरमाइश करता था कि वो ताजमहल सुनाएं, तो दूसरी तरफ से फनकार सुनाने की आवाज आती थी। दोनों फरमाइशों के बीच वो अक्सर भूल जाते थे कि उन्होंने वहां सुनाने के लिए कौन सी नज्म चुनी है।'

ये अनिर्णय की स्थिति इस हद तक पहुंचती थी कि साहिर की समझ में नहीं आता था कि मुशायरे के वक्त वो कौन से कपडे पहनें। यहां तक कि किस कमीज पर वो कौन सी पतलून पहनें, इसके लिए उन्हें अपने दोस्तों की मदद लेनी पडती थी।

जब गुरूदत्त ने गुनगनाई सहिर की नज्म

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लता मंगेशकर के गाए 'ठंडी हवाएं, लहरा के आंए, रुत है जवां, तुम हो यहां, कैसे भुलाएं' ने बर्मन-साहिर जोडी की नींव रखी जो कई सालों तक चली। गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' के गीत और संगीत दोनों ने उस समय पूरे भारत में खलबली मचा दी। भारतीय फिल्म इतिहास का सबसे काव्यात्मक क्षण तब आया जब गुरुदत्त ने साहिर की नज्म गुनगुनाई, ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।’

फिल्म इंडस्ट्री में हमेशा से ही संगीतकारों को गीतकारों की तुलना में ज्यादा अहमियत मिलती आई है। बर्मन और साहिर दोनों का मानना था कि 'प्यासा' की सफलता के वो हकदार हैं।

साहिर का जोरशोर से ये कहना एसडी बर्मन को पसंद नहीं आया और उन्होंने साहिर के साथ दोबारा काम करने से इंकार कर दिया। साहिर का नाम कई महिलाओं के साथ जुडा लेकिन उन्होंने ता उम्र शादी नहीं की। उनकी सबसे नजदीकी दोस्त थीं अमृता प्रीतम।

'वो चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता'

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वो अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में लिखती हैं, 'वो चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता। आधी पीने के बाद सिगरेट बुझा देता और नई सिगरेट सुलगा लेता। जब वो जाता तो कमरे में उसकी पी हुई सिगरेटों की महक बची रहती। मैं उन सिगरेट के बटों को संभाल कर रखतीं और अकेले में उन बटों को दोबारा सुलगाती। जब मैं उन्हें अपनी उंगलियों में पकडती तो मुझे लगता कि मैं साहिर के हाथों को छू रही हूं। इस तरह मुझे सिगरेट पीने की लत लगी।'

पार्श्व गायिका सुधा मल्होत्रा का नाम भी साहिर के साथ जोडा गया। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि ये साहिर का एकतरफा प्यार था। अक्षय मनवानी कहते हैं, 'सुधा ने मुझे बताया.. शायद साहिर को मेरी आवाज अच्छी लगती थी। वो मुझसे मोहित जरूर थे। उन्होंने मुझे गाने के लिए लगातार अच्छे गाने दिए। रोज सुबह मेरे पास उनका फोन आता था। मेरे चाचा मुझे चिढाया करते थे... तेरे मॉर्निंग अलार्म का फोन आ गया। लेकिन ये गलत है कि मेरा उनसे कोई रोमांस चल रहा था। वो मुझसे उम्र में कहीं बडे थे।'

अमृता प्रीतम के लिए नहीं सुधा के लिए लिखा था वो गीत

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लेकिन कहा ये जाता था कि फिल्म गुमराह में साहिर का लिखा महेंद्र कपूर का गाया गाना ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं’ वास्तव में सुधा मल्होत्रा के लिए लिखा गया था। लेकिन सच बात ये थी कि ये नज्म साहिर की सुधा से मुलाकात से कहीं पहले उनके काव्य संग्रह तल्खियां में खूबसूरत मोड के नाम से प्रकाशित हो चुकी थीं।

1960 में अपनी शादी के बाद सुधा ने हिंदी फिल्मों के लिए कोई गाना नहीं गाया। उनकी साहिर से फिर कभी मुलाकात भी नहीं हुई। साहिर का लिखा एक गीत जिसे सुधा मल्होत्रा ने गाया, उन दोनों के संबंधों को शायद सही ढंग से रेखांकित करता है-

तुम मुझे भूल भी जाओ, तो ये हक है तुमको
मेरी बात और है, मैंने तो मोहब्बत की है।

साहिर को लिफ्ट के इस्तेमाल से डर लगता था

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साहिर को लिफ्ट इस्तेमाल करने से डर लगता था। जब भी यश चोपडा उन्हें किसी संगीतकार के साथ काम करने की सलाह देते तो वो उस संगीतकार की योग्यता उसके घर के पते से मापते थे... 'अरे नहीं नहीं, वो ग्यारहवीं मंजिल पर रहता है... जाने दीजिए छोडिए। इसको लीजिए... ये ग्राउंड फ्लोर पर रहता है।'

मजे की बात है कि यश चोपडा साहिर की बात सुना करते थे। लिफ्ट की तरह साहिर को जहाज पर उडने से भी डर लगता था। वो हर जगह कार से जाते थे। उनके पीछे एक और कार चला करती थी कि कहीं जिस कार में वो सफर कर रहे हैं वो खराब न हो जाए।

एक बार वो कार से लुधियाना जा रहे थे। मशहूर उपन्यासकार कृश्न चंदर भी उनके साथ थे। शिवपुरी के पास डाकू मान सिंह ने उनकी कार रोक कर उसमें सवार सभी लोगों को बंधक बना लिया। जब साहिर ने उन्हें बताया कि उन्होंने ही डाकुओं के जीवन पर बनी फिल्म 'मुझे जीने दो' के गाने लिखे थे तो उन्होंने उन्हें इज्जत से जाने दिया था।

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