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'पराठे वाली गली' से जुड़ जाएगा दिल्ली का आम आदमी

Wed, 15 Jan 2014 04:51 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला,मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला,मुंबई Updated Wed, 15 Jan 2014 04:51 PM IST
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sachin gupta, paradhey wali gali, film

सचिन गुप्ता की दिल्ली में थियेटर कंपनी है। ‘पराठे वाली गली’ से वह शुक्रवार को निर्देशक के रूप में फिल्मी पारी शुरू कर रहे हैं। उनकी थियेटर कंपनी ने गौरी कार्णिक और नौशीन अली सरदार समेत कई ऐक्टर फिल्म और टेलीविजन की दुनिया को दिए हैं। सचिन की पहली फिल्म की पृष्ठभूमि रंगमंच की है।

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थियेटर के बाद सिनेमा... क्या यह सहज कदम था!


सच कहूं तो थियेटर मेरा पहला प्यार नहीं है और न ही सिनेमा मेरा अगला कदम। वास्तव में मैं किस्सागो  हूं, जिसे कहानी कहनी है। चाहे वह जिस रूप में हो। पहले रंगमंच पर कहानी कह रहा था, अब फिल्म लेकर आया हूं।
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आगे भी फिल्में ही लाएंगे?


रंगमंच जारी रहेगा। लेकिन ‘पराठे वाली गली’ के बाद मेरी दो और फिल्में आएगीं। इनकी शूटिंग मार्च में शुरू होगी। इनकी कहानियां मेरी हैं और मैं ही निर्देशन कर रहा हूं।
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‘पराठे वाली गली’ के बारे में बताइए...।

यह रोमांटिक कॉमेडी है। दिल्ली में रहने वाले एक कॉमन मैन की कहानी। इसके किरदार आम जिंदगी से हैं। इसकी सारी लोकेशंस दिल्ली की हैं। किरदारों के कपड़े तक हमने चांदनी चौक से खरीदे।

चूंकि इसके सभी किरदार दिल्ली की पराठे वाली गली से हैं, इसलिए फिल्म का यह नाम दिया गया है।

पराठे वाली गली से आपका खास लगाव लगता है...!

जी हां, मैं दिल्ली से हूं और इस थियेटर के कारण मैंने बहुत सारा वक्त यहां बिताया है। ऐक्टरों और दूसरे लोगों से सैकड़ों मीटिंगें की हैं। चांदनी चौक का यह इलाका बहुत खास और बाकी शहर से अलग है। यहां आते ही आपको जिंदगी में एक अलग फील आने लगता है, जिसे बयान करना कठिन है।

इधर दिल्ली केंद्रित फिल्में काफी बनने लगती हैं। ऐसा क्यों?

दिल्ली... खास तौर पर पुरानी दिल्ली अपने आप में एक कैरेक्टर है। वहां की सुबह-शाम और रात, वहां के लोग बहुत अलग हैं। लेकिन इधर दिल्ली की जो फिल्में आते हैं, उनमें ज्यादार लालकिला और इंडिया गेट दिखा कर बाकी की शूटिंग मुंबई में कर ली जाती है। हमने सिर्फ दिल्ली और दिल्ली दिखाई है।


आपने अनुज सक्सेना को हीरो बनाया है, जबकि उन्होंने कई साल पहले दो-तीन कोशिशें की और नाकाम रहे!

मैंने लीड ऐक्टर के लिए कई ऑडिशंस लिए थे, लेकिन कोई जमा नहीं। चूंकि फिल्म में मेरा हीरो थियेटर ऐक्टर है तो मुझे अनुज में ऐक्टिंग की भूख दिखी। उनमें मुझे वह ईमानदारी दिखी कि एक ऐक्टर खुद को साबित करना चाहता है। मेरी फिल्म का हीरो भी यही करने की कोशिश कर रहा है।

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