कैसे बनी ये फिल्म, टिकट ब्लैक करके लोग 'राजा' बन गए
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जानिए, कैसे बनी थी यह फिल्म, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसकी टिकट ब्लैक में बेचकर लोगों ने घर बनवा लिए। बता रहे हैं शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी, "जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा की सेवेन समुराई से मैं बेहद प्रभावित था। फिल्म में जंगल और पहाड़ के दृश्य मेरे जेहन में तभी से थे। हमने भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक किरदारों और दृश्यों के साथ प्रयोग किया। हालांकि, यह नहीं सोचा था कि शोले ऐसी यादगार और ऐतिहासिक फिल्म बन जाएगी।
इस फिल्म का छोटे सा छोटा किरदार, उनकी बोली, लोकेशन और दृश्य शायद इसीलिए इतने ऐतिहासिक बन गए, क्योंकि इसमें सब अपने सर्वश्रेष्ठ रूपों में नजर आए। चालीस साल पहले शोले की फिल्म मेकिंग के समय के कुछ वाकये याद आ ही जाते हैं।
जैसे, शोले में जब पहली बार पहाड़ियों के बीच गब्बर की एंट्री होती है, तो उसके हाथों में बेल्ट होती है, जिसे वह चट्टानों में रगड़ाते हुए चहलकदमी करता नजर आता है। फिल्म के दृश्य में गब्बर से पहले उसकी बेल्ट ही हमें पर्दे पर सबसे पहले दिखानी थी। हमें फिल्म में खूंखार और बेरहम गब्बर की पहाड़ों और पत्थरों में दबी उसकी दहशत को दिखाना था, जिसके लिए हमने कोई सौ डेढ़ सौ...."
सुबह या शाम को कभी-कभी जब सैर को निकलता हूं, तो ...
फिल्म में खूंखार और बेरहम गब्बर की पहाड़ों और पत्थरों में दबी उसकी दहशत को दिखाना था, जिसके लिए हमने कोई सौ डेढ़ सौ किस्म के बेल्ट बाजार से मंगवाए थे। रमेश सिप्पी बताते हैं कि बॉलीवुड में पहली बार अपनी तरह के साउंड डिजाइन का हमने प्रयोग किया था। इस पर इतनी बातें हो चुकी हैं कि लगता है कि मैं क्या नया किसी को बता पाऊंगा।
हालांकि, सुबह या शाम को कभी-कभी जब सैर को निकलता हूं, तो लोग मेरी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं और मेरी तारीफ करते हैं, तो बेहद खुशी होती है। आज टेलीविजन, सोशल मीडिया और रेडियो कहीं भी कभी भी शोले का जिक्र छिड़ ही जाता है।
ऐसे में यादों की गलियों से होकर लौटता हूं, तो खुद को तरोताजा महसूस करता हूं। जो चले गए और जो इस समय जिंदा हैं, सबका यह बेहतरीन और सामूहिक प्रयास था, मेरे अकेले भर का यह काम नहीं था।
(दिनेश मिश्र से बातचीत पर आधारित)