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मैं सिंगल हूं और बहुत खुश हूँ: सीमा बिश्वास

Wed, 26 Sep 2012 05:05 PM IST
राधा कृष्ण
राधा कृष्ण Updated Wed, 26 Sep 2012 05:05 PM IST
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Queens Destiny of the Dance is Tale of eunuchs seema biswas

'बैंडिट क्वीन' और 'वाटर' जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाली बेहतरीन अदाकारा सीमा बिस्वास फिर से अलग और हटकर फिल्म 'क्वींस! डेस्टिनी ऑफ द डांस' में दिखाई देने जा रही हैं। मिराज इंटरटेनमेंट लिमिटेड के बैनर तले बनी फिल्म में सीमा बिस्वास एक खास किरदार के रूप में नजर आएंगी। 'क्वींस! डेस्टिनी ऑफ द डांस' लॉस एंजिल्स मूवी अवार्ड में 6 पुरस्कार भी हासिल कर चुकी है। जिसमें सीमा बिस्वास को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के खिताब से नवाजा गया है। फिल्म फेयर और नेशनल अवार्ड से पुरस्कृत सीमा बिस्वास ने अमर उजाला के वरिष्ठ संवाददाता राधा कृष्ण के साथ फिल्म से जुड़े अपने कुछ खास अनुभव बांटे-

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फिल्म ''क्वींस! डेस्टिनी ऑफ द डांस' विदेश में धूम मचा रही है। ऐसा क्या है इस फिल्म में?
देखिए, इस फिल्म में हमने किन्नरों की ऐसी दास्तान को दिखाने का प्रयास किया है जो अभी तक अनटच रही हैं। फिल्म की कहानी, किरदार, निर्देशन और अभिनय अपने आप में निराला है। फिल्म को लॉस एंजिल्स मूवी अवार्ड समारोह में 6 श्रेणी में पुरस्कार मिल चुके हैं।
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अपने किरदार के बारे में बताएं? इस किरदार के लिए आपको किस तरह की मेहनत करनी पड़ी?
फिल्म में मेरा किरदार बहुत दमदार है। मैं गुरु अम्मा के रूप में दिखाई दूंगी जो किन्नर समाज को नेतृत्व प्रदान कर रही है। इस तरह का किरदार मैंने कभी नहीं निभाया है। इसलिए इस किरदार को आत्मसात करने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी। शोध से लेकर किन्नरों तक से मैंने मुलाकात की। उनके रहन-सहन को मैंने करीब से देखा। यह सब करते हुए मुझे किन्नर समाज को समझने में बहुत मदद मिली।
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फिल्म के टाइटल में क्वींस शब्द 'बैंडिट क्वीन' की याद दिलाता है। क्वींस रखने का खास मकसद?
फिल्म के टाइटल का बैंडिट क्वीन से कोई ताल्लुक नहीं है। 'क्वींस! डेस्टिनी ऑफ द डांस' में क्वींस शब्द को लेने के पीछे कारण यह है कि किन्नर समाज श्रृंगार, डांस और नजाकत से परिपूर्ण होता है। उनमें एक क्वीन के तरह सजने संवारने की ललक होती है। यहीं कारण है फिल्म के टाइटल में क्वींस को लिया गया।

'क्वींस! डेस्टिनी ऑफ द डांस' का वास्तविकता से कितना नाता है? क्या फिल्म किन्नरों के प्रति लोगों का नजरिया बदलेगी?
देखिए, 'क्वींस! डेस्टिनी ऑफ द डांस' का सीधे तौर पर वास्तविकता से संबंध नहीं है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से यह असलियत को बयान करती है। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह किन्नरों को समाज में वो सम्मान नहीं मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं। उन्हें तिरस्कार से गुजरा पड़ता है। फिल्म में दिखाया गया है कि अगर किसी लड़के में नारीत्व के गुण या भाव पैदा होते है तो उसे समाज ही नहीं परिवार से दूर कर दिया जाता है। हालात ऐसे हो जाते है कि उसे मजबूरन किन्नरों के समाज में आना पड़ता है।

किन्नरों के प्रति आपका खुद का नजरिया क्या है?
फिल्म करने के दौरान किन्नरों के बारे में मैंने बहुत कुछ देखा और समझा। किन्नरों को आज भी दुत्कार और समाज से अलग ही माना जाता है। समाज की व्यवस्था में वह अपने आप को अलग-थलग पाते हैं। आज भी संविधान और समाज में व्यवस्था नहीं कि वह अपने आपको ट्रांसजेंडर की श्रेणी में रखें। उन्हें मजबूरन मेल या फीमेल लिखने के लिए विवश किया जाता है। साफ दिखता है कि समाज आज भी उन्हें उनके असली रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं है।

फिल्म को विदेशों में वाह-वाही मिल रही है भारत में भी मिलेगी?
फिल्म अच्छी है तभी तो विदेशी फिल्म समारोह में धूम मचा रही है और हमें उम्मीद है कि भारत में भी यह कमाल करेगी।

माना जाता है कि ऐसी फिल्में फिल्म फेस्टिवल में ही पूछी जाती है? आम दर्शक इस तरह की फिल्मों से कन्नी काट लेता है। ऐसा क्यों?
ऐसा पहले हुआ करता था। देश का दर्शक अब काफी परिपक्व हो गया। बोल्ड और अलग हटकर बनने वाली फिल्मों को आम दर्शक वर्ग भी स्वीकारने लगा है। इसलिए हमारी ऐसी फिल्म फिल्म समारोह में नहीं बॉक्स ऑफिस पर भी बेहतर बिजनेस करेगी।

आपने फिल्म में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का खिताब हासिल किया है? अवार्ड्स आपके लिए कितने मायने रखते हैं?
अवार्ड्स किसी को उत्साहित और प्रोत्साहित करने में बेहद मददगार होते है और इन्हें पाकर मैं भी खुश हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अवार्ड्स के लिए काम करती हूं। मैं अपना काम शिद्दत से करती हूं और यही मुझे अवार्ड पाने में मदद करते हैं। अगर इनसान अपने काम के प्रति वफादार होगा तो उसे बेहतर परिणाम हासिल होंगे। मैं किरदार को आत्मसात करने में विश्वास करती हूं।

आपका विवादित फिल्मों 'वाटर' या 'बैंडिट क्वीन'से नाता रहा है। कैसा लगता है?
मुझे फिल्म के किरदार और उसकी कहानी प्रभावित करती है न कि बैनर और उस फिल्म का स्टारकास्ट। मैंने देखा है कि कुछ खास ग्रुप के लोग बिना फिल्मों को देखे ही शोर मचाने लगते हैं। उन्हें फिल्म और उसके किरदार की अहमियत का अहसास नहीं होता है। फिर भी बवाल मचाने में आगे रहते हैं। लेकिन इससे आम दर्शकों को कोई दिक्कत नहीं होती है। वे हमेशा अच्छी फिल्मों और किरदारों की तारीफ करते हैं। इसलिए मैं हमेशा करती हूं, दर्शक हमेशा समझदार होते हैं।

बॉलीवुड में बोल्डनेस के बारे में आपका क्या ख्याल है। जरूरत न होते हुए भी इसका सहारा लिया जा रहा है। आपका क्या ख्याल है?

यह सही हैं कि बॉलीवुड में बोल्डनेस का सहारा जरूरत से ज्यादा ही लिया जा रहा है। इससे फिल्म को मसालेदार तो बनाया जा सकता है लेकिन किरदार और फिल्म के साथ नाइंसाफी हो जाती है। फिल्म की जरूरत के मुताबिक बोल्डनेस सही मायने में ठीक रहती है।

सिनेमा के लिए थिएटर के कितने मायने है?
थिएटर अभिनय को सुधारने में बेहद मदद करता है। शुरुआत में थिएटर के लोगों ने ही सिनेमा को नई पहचान दी। आज भी थिएटर से निकला शख्स सिनेमा में धूम मचा देता है। बॉलीवुड में तो ऐसे कलाकारों की कमी नहीं है। असल में मुझे भी थिएटर में बेहद मजा आता है। यहां एक टेक में ही आपको सबकुछ करके दिखाना होता है जो एक काबिल कलाकार ही कर सकता है। यहां आप फिल्मों की तरह जोड़-तोड़ नहीं कर सकते हैं।

बॉलीवुड में क्वालिटी फिल्मों में स्तर कम हो रहा है। साउथ की रिमेक पर जोर है। ऐसा क्यों?
बॉलीवुड के लिए यह सही संकेत नहीं है। इस ओर हम सबको नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। रिमेक एक सीमा तक तो ठीक है लेकिन ऑरिजनेलिटी पर हमें जोर देना चाहिए।

आप अब सिंगल है, कैसा लगता है?
देखिए, मैं सिंगल हूं और बहुत खुश हूं। जहां तक शादी का सवाल है, इस बारे में मैंने सोचा नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने काम के चक्कर में शादी नहीं की है। मैं अपने परिवार वालों के साथ रहती हूं और बहुत मजा आ रहा है।

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