फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Entertainment Archives ›   meet the wrirer of grand masti

मिलिए 'ग्रैंड मस्ती' फिल्म लिखने वाले से

Sun, 22 Sep 2013 06:00 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Sun, 22 Sep 2013 06:00 PM IST
विज्ञापन
meet the wrirer of grand masti

मिलाप जवेरी बॉलीवुड के कामयाब लेखकों में से हैं। मस्ती, हे बेबी, हाउस फुल जैसी कॉमेडियों समेत कांटे, शूटआउट एक लोखंडवाला और शूटआउट एट वडाला जैसी एक्शन-थ्रिलर उनके खाते में हैं। इन दिनों मिलाप की लिखी ‘ग्रैंड मस्ती’ चर्चा में हैं।

विज्ञापन


‘ग्रैंड मस्ती’ बॉक्स ऑफिस पर कामयाब है लेकिन इसकी आलोचना भी हो रही है।

आलोचना करने वाले मुट्ठी भर लोग हैं। फिल्म देख कर दर्शक खूब हंस रहे हैं। फिल्म कमाई के रिकॉर्ड बना रही है। यह देश की सबसे तेज 50 करोड़ रुपये कमाने वाली एडल्ट फिल्म बन गई है। मुझे लगता है कि हमारे फिल्म समीक्षक मानसिक रूप से बड़े नहीं हुए हैं जबकि जनता परिपक्व हो चुकी है।
विज्ञापन


आपने मस्ती लिखी थी और अब ग्रैंड मस्ती। सेक्स कॉमेडी आप कैसे लिख लेते हैं?

बचपन से मैंने दादा कोंडके की फिल्में देखी हैं। मैंने आज हेंगओवर भी देखता हूं और अमेरिकन पाई भी। मुंबई में लगातार अंग्रेजी और मराठी थियेटर देखता हूं। इनमें हमेशा डबल मीनिंग वाले डायलॉग सुनने को मिलते हैं। सैकड़ों ऐसे जोक्स की किताबें हैं। इंटरनेट पर ऐसे नए-नए चुटकुले आते रहते हैं। सेक्स कॉमेडी के लिए हमारे आस-पास ही बहुत सारी चीजें हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


ग्रैंड मस्ती को लिखने में कितना समय लगा?

मैंने और तुषार हीरानंदानी ने मिल कर इसकी स्क्रिप्ट लिखी। फिर डायलॉग मैंने लिखे। हमें साढ़े तीन महीने का वक्त लगा। इसके बाद इंद्रकुमार (डायरेक्टर) ने इसे सुना। वे आश्वस्त नहीं थे कि स्क्रिप्ट जितनी बोल्ड फिल्म बन पाएगी या नहीं।

इसलिए हमने 18 साल के ऊपर के 30 युवाओं को एक हॉल में बुलाया और स्क्रिप्ट का नरेशन दिया। वे हंस-हंस कर पागल हो गए। आजकल फिल्में बनने के बाद उसकी टेस्टिंग होती है। हमने फिल्म बनने से पहले ही उसे टेस्ट कर लिया।

लेकिन क्या देश में ऐसी फिल्में बनना चाहिए जो युवाओं पर गलत असर डाले?


आप देखिए कि हमारे यहां सेंसर बोर्ड भी है। अगर हम कुछ बनाते हैं तो उसे रिलीज करने से पहले उसकी इजाजत लेनी पड़ती है। वह फिल्म को अलग-अलग श्रेणियों में रखता है। उसने हमारी फिल्म को ‘ए’ प्रमाणपत्र दिया है। हमने भी फिल्म 18 साल से ऊपर के लोगों के लिए बनाई है।

मस्ती कामयाब थी, ग्रैंड मस्ती भी खूब चल रही है तो क्या इस कड़ी को आगे भी बढ़ाएंगे?

हम तो चाहेंगे कि अगर दर्शक हमारी फिल्म को कामयाब बना रहे हैं तो हम इसे आगे बढ़ाएं। लेकिन यह डायरेक्टर की मर्जी पर निर्भर होगा। अगर वे कहेंगे तो इसका पार्ट-3 भी लिखेंगे।

लेकिन मस्ती और ग्रैंड मस्ती की कहानी में ज्यादा फर्क नहीं है।

देखिए कहानी का मूल विचार यही है कि शादी के बाद मर्द रिश्ते से बाहर मस्ती के मौके ढूंढता है। जब भी वह ऐसा करेगा तो आखिरकार फंसेगा। मस्ती में अलग ढंग से फंसा था, ग्रैंड मस्ती में अलग ढंग से फंसा।

फिल्म में महिलाओं को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ की तरह पेश किया गया है।


हमारी फिल्म में जोक्स हैं, जो महिला और पुरुष किरदारों पर बराबरी से किए गए हैं। किसी पर कम और किसी पर ज्यादा जोक्स, ऐसा नहीं है। यूं देखिए तो हमने फिल्म के प्रमुख किरदार कॉलेज प्रिंसिपल को तो नपुंसक दिखाया है।


अक्सर आरोप लगता है कि फिल्में जिस ढंग से नायिकाओं को पेश करती हैं, उससे महिलाओं के खिलाफ देश में होने वाले अपराध बढ़ते हैं!


मैं इसे सही नहीं मानता। क्या लोग फिल्मों में दिखाई जाने वाली गलत बातों से ही प्रेरणा लेते हैं। अगर वे वास्तव में फिल्मों से प्रेरित होते हैं तो फिर जो अच्छी बातें दिखाई जाती हैं, वे उन्हें क्यों नहीं ग्रहण करते?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed