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मधुर भंडारकर बोले- 'मैं फिल्म में 95 फीसदी हकीकत दिखाता हूं'

Thu, 17 Sep 2015 11:45 PM IST
Updated Thu, 17 Sep 2015 11:45 PM IST
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Madhur bhandarkar exclusive interview

मधुर भंडारकर की फिल्में देखने के बाद आप कुछ समृद्ध होकर सिनेमाघर से निकलते हैं। वह जिस विषय पर फिल्म बनाते हैं, उस पर आपकी जानकारी बढ़ जाती है। चांदनी बार, पेज 3, कारपोरेट, ट्रेफिक सिग्लन, फैशन से लेकर हीरोइन तक उन्होंने दर्शकों को सच दिखाया। अब बारी है कैलेंडर गर्ल्स की। फिल्म अगले हफ्ते रिलीज होगी। मधुर से इस फिल्म और समाज पर उनकी फिल्मों के प्रभाव पर बातचीत की रवि बुले ने।

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हीरोइन के बाद दूसरी फिल्म आते-आते तीन साल लग गए। इसकी वजह? इस सवाल पर मधुर भंडारकर ने कहा कि हीरोइन 2012 में आई थी और इससे पहले मैं लगातार काम कर रहा था। इस फिल्म के बाद मैंने काम से ब्रेक लेने का फैसला किया।
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मुझे घूमने का बहुत शौक है। इस ब्रेक में मैं बहुत घूमा। खास तौर पर विदेश में। कई फिल्म फेस्टिवल में मैंने हिस्सा लिया। मास्को फिल्म फेस्टिवल में मेरी सारी फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग का सेक्शन रखा गया। मुझे अंतरराष्ट्रीय फिल्में और डॉक्युमेंट्री देखने का शौक है। उनका इस दौरान मैंने बहुत मजा लिया।

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'कैलेंडर देख आया 'कैलेंडर गर्ल्स का आइडिया'

Madhur bhandarkar exclusive interview

कैलेंडर गर्ल का आइडिया कैसे आया? इस पर मधुर काफी मजेदार जवाब देते हैं उनका कहते हैं, ये अनायास हुआ। मेरा ऑफिस की साफ-सफाई के दौरान बॉय कुछ कैलेंडर मेरे पास लाया और पूछा कि सर इनका क्या करें? पिछले कई बरसों से विजय माल्या मुझे ये कैलेंडर भेजते थे। यह कैलेंडर सुंदर होते हैं तो लोग अमूमन इन्हें संभाल कर रख लेते हैं।

मैंने बॉय से कहा कि इन्हें कहीं रख दो। फिर दो-तीन दिन बाद अचानक मेरी नजर इन पर पड़ी और मैंने इन्हें पलट कर देखा। ये तीन या चार साल के कैलेंडर थे। मुझे लगा कि हर साल कैलेंडर में नई लड़कियां आती हैं। कैलेंडर शूट करते वक्त बड़ी खुश होती हैं। 365 दिन वह इस कैलेंडर में मौजूद रहती हैं। फिर नया कैलेंडर आ जाता है। तब ये लड़कियां कहां जाती हैं? यही सवाल इस फिल्म की शुरुआत बना क्योंकि 99 फीसदी लड़कियां फिर हमें कहीं नजर नहीं आतीं।

आपकी फिल्में जिन मुद्दों पर बनती हैं, अक्सर उन्हें एक्सपोज करती हैं। क्या जो लड़कियां मॉडल बनना चाहती हैं, कैलेंडर गर्ल्स देखने के बाद उन्हें झटका लगेगा? इस पर मधुर कहते हैं, मैं कभी किसी विषय का सिर्फ एक पक्ष नहीं दिखाता। मैं उसकी अच्छाइयां भी दिखाता हूं।

हर फील्ड में अच्छे और खराब दोनों लोग होते हैं। आप पॉलिटिक्स को ही लीजिए! कैलेंडर गर्ल्स में भी ऐसा ही दिखेगा। मुझे नहीं लगता कि यह फिल्म देखने के बाद लड़कियां सोचेंगी कि हमें यह करिअर नहीं अपनाना चाहिए।

'ग्लैमर का खोखलापन मैं दिखा रहा हूं'

Madhur bhandarkar exclusive interview

इससे कैसे इंकार किया जा सकता है कि इन कैलेंडरों पर छपने से जो ग्लैमरस पहचान मिलती है वह जल्द ही खत्म भी हो जाती है! इस पर ये फिल्मकार सधा जवाब देता है वो कहते हैं, यही तो मैं दिखा रहा हूं। इस ग्लैमर का खोखलापन क्या है। समाज इन लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है।

मनोरंजन जगत के कई क्षेत्र हैं जिसमें आज लोग रातोंरात सितारे बनते हैं, छह महीने उनका स्टारडम रहता है और फिर वे पता नहीं कहां खो जाते हैं। मुझे लगता है मेरी फिल्म लोगों को झंझोड़ेगी, शॉक करेगी और उनकी आंखें नम करेगी।

आपने रिसर्च के दौरान क्या पाया कि नई पीढ़ी के लिए सफलता या स्टारडम के क्या मायने हैं? मैंने पाया कि सफलता इस बात से संबंधित है कि आप कितने महत्वाकांक्षी हैं। रिचर्स के दौरान कई लड़कियां मुझे मिलीं जिन्होंने कैलेंडर गर्ल बनने के कुछ ही समय बाद शादी कर ली, दूसरा करिअर चुन लिया, विदेश चली गईं।

ऐसा नहीं कि उन्हें यहां कोई शिकायत थी, बल्कि उन्होंने खुद महसूस किया कि वे इस फील्ड में आगे बढ़ने के लिए सक्षम नहीं हैं। कुछ ऐसी भी मिलीं कि यहां जो माहौल है वह इसमें खुद को फिट नहीं पातीं।

'कुछ चीजे सामने देखकर ही समाज उसे मानता है'

Madhur bhandarkar exclusive interview

जो ग्लैमरस करिअर होते हैं उनका समाज पर असर तो दिखता है लेकिन क्या यह भी होता है कि इन क्षेत्रों पर समाज का प्रभाव पड़े? इस पर मधुर कहते हैं, बिल्कुल होता है। कई बार समाज में ऐसी बातें होती हैं कि आप उन्हें होने से पहले किसी को  सुनाएं तो वह विश्वास नहीं करेगा।

जैसे इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का मामला चल रहा है। कुछ समय पहले आप मां-बेटी की ऐसी कोई कहानी लाते तो मैं उसे कहानी ही मानता। कहता कि विषय तो अच्छा है लेकिन इतना डार्क है कि फिल्म नहीं बना सकता। परंतु अब देखिए कि इस पर कई लोग फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं। मुंबई पर जो आतंकी हमला हुआ था, क्या उसकी कोई कल्पना कर सकता था। इस तरह सच्चाइयां हमेशा कहानी-किस्से-सिनेमा से आगे निकलकर आपको चौंका देती हैं।

आपकी फिल्में छुपे हुए सच बाहर लाती हैं। जिन विषयों पर आपने सिनेमा बनाया, क्या बाद में लोगों उसे लेकर शिकायत की? हां, लोग मिलते हैं तो शिकायतें करते हैं कि आपने हमारा सच दिखा दिया। अब हमें काम में मुश्किलें आ रही हैं।

पेज 3 हो, फैशन हो, हीरोइन हो... यहां तक कि ट्रेफिक सिग्नल के बाद तक सड़क पर रहने वाले लोगों ने कहा कि अब कोई उन पर विश्वास नहीं करता। लोग पूछते हैं कि क्या बच्चा भाड़े का लाए हो। कोई पैसे नहीं देता। जब सफाई देते हैं तो लोग कहते हैं कि हमें पता है... हमनें ट्रेफिक सिग्नल देखी है।

हीरोइन बनाई तो इंडस्ट्री के लोगों ने ही मुझे कहा कि यार ज्यादा दिखा दिया। लेकिन मैं हीरोइन में इंडस्ट्री की सच्चाई नहीं दिखाता तो दर्शक कहते कि अपनी जगह की बारी आई तो छुपा गए।

'95 से 75 फीसदी तक हकीकत सामने रखता हूं'

Madhur bhandarkar exclusive interview

आपकी फिल्में तथ्यों पर आधारित होती हैं। इसमें कितना हिस्सा कहानी का होता और कितना हकीकत का? मैं 95 से 75 फीसदी तक हकीकत सामने रखता हूं। बाकी घटनाओं को मोड़ देने के लिए कहानी गढ़नी पड़ती है। कड़वी दवाई भी मीठी गोली की तरह देनी होती है।

सच दिखाने की वजह से लोग आपसे दुश्मनी रखते हैं या सावधान रहते हैं? यह तो नहीं कह सकता लेकिन हां काम से आपकी एक इमेज बन जाती है। एक दिन मैं अपने प्रोड्यूसर मित्र के पिता को लीलावती अस्पताल में देखने गया। मैं जब नीचे खड़ा इधर-उधर नजरें डाल रहा था कि दो-तीन डॉक्टर आ गए और पूछने लगे कि क्या आप डॉक्टरों पर फिल्म बना रहे हैं?

बच्चों के माता-पिता मेरे पास आते हैं कि आप स्कूलों के डोनेशन के भ्रष्टाचार को सामने लाने वाली फिल्म क्यों नहीं बनाते? वास्तव में इसी काम की वजह ले लोग प्यार भी बहुत देते हैं। आपसे उम्मीद भी करते हैं। इंद्रणी का केस आया तो लोग कहने लगे कि मधुर इस पर फिल्म बनाएगा। राधे मां का केस आया तो लोग कहने कि मधुर इस पर फिल्म बनाएगा। यह काम से मिली पहचान है।

'मैडम जी भी आएंगी, थोड़ा इंतजार करिए'

Madhur bhandarkar exclusive interview

प्रियंका चोपड़ा के साथ आपकी मैडम जी की चर्चा खूब हुई। क्या यह फिल्म बनेगी? हम लोग कैलेंडर गर्ल्स से पहले ही इसे बनाना चाहते थे, परंतु प्रियंका अन्य फिल्मों और  अमेरिकी टीवी सीरियल में व्यस्त हो गईं। जैसे ही उन्हें समय मिलेगा हम लोग इसे लेकर काम करेंगे। यह एक कॉलगर्ल के पॉलिटिक्स में ऊंचाइयों तक पहुंचने की कहानी है।

नायिका प्रधान फिल्मों के लिए पहले सिर्फ आपको जाना जाता था। अब तमाम निर्देशक ऐसी फिल्में बना रहे हैं। क्या सोचते हैं? यह अच्छा बदलाव है। हीरोइनों के सामने अब प्रतिभा दिखाने के ज्यादा मौके हैं। लोग मुझसे कहते हैं कि इस बदलाव की शुरुआत आपने की। मैं इसका श्रेय नहीं लेना चाहता। यह समय और लोगों की समझ की बात है। दोनों बदल रहे हैं।

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