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मैंने किसी आतंकी संगठन को पैसे नहीं दिएः आमिर खान

Fri, 21 Nov 2014 08:02 AM IST
Updated Fri, 21 Nov 2014 08:02 AM IST
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interview of aamir khan on pk

आमिर खान का कहना है कि जिन्हें पीके के निर्वस्त्र पोस्टर पर ऐतराज है, उन्हें फिल्म में इसका जवाब मिल जाएगा। फिल्म अगले महीने रिलीज होनी है और वह इसके प्रचार में लगे हैं। यद्यपि वे पाके के बारे कम और दूसरे विषयों पर ज्यादा बात करते हैं। मुंबई में उन्होंने बुधवार को मीडिया से मुलाकत कर सिनेमा, टेलीविजन और अपने जीवन पर चर्चा की।

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फिल्म देखते हुए आपको महसूस होगा कि उस निर्वस्त्र पल में कहानी के रहस्यों की कुंजी है। वह बहुत ही अहम मोड़ है। इसीलिए हमने उसे पहले पोस्टर में जारी किया। वैसे जब पहलवान अखाड़े में लड़ता है तो सिर्फ लंगोट पहनता है और हमें बुरा नहीं लगता। पोस्टर और फिल्म में हमने लंगोट से कहीं ज्यादा हिस्सा छुपा कर रखा है।
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मुझे लोगों पर भरोसा है कि उन्हें वह बात समझ में आ जाएगी जो मैं इस फिल्म में कह रहा हूं। कहानी पर जितना असर मुझ पर और राजू हिरानी (निर्देशक) पर हुआ, उतना ही दर्शकों पर होगा। यह एक युनिवर्सल फिल्म है। बच्चों-बूढ़ों, औरतों-मर्दों सबको पसंद आएगी। राजू की सारी फिल्में एक संजीदा ड्रामा होती हैं, लेकिन बात कहने के लिए वे ह्यूमर का इस्तेमाल करते हैं। जिससे आपको मजा भी आता है और बात भी गहरे उतर जाती है।
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मुझ पर होता है फिल्मों का असर

interview of aamir khan on pk

मैं एक आम दर्शक की तरह फिल्मों को देखता हूं। जैसे दूसरों पर फिल्मों का असर होता है, वैसे ही मुझ पर भी होता है। मैं ज्यादा संवेदनशील हूं, अतः मुझे लगता है कि मुझ पर ज्यादा असर होता है। मैं ऐक्टर हूं और फिल्मों से सीखता भी हूं। लेकिन मैंने कभी ऐसा नहीं किया कि फिल्म देखकर उनकी नकल से अपना रोल करूं।

मुझ पर फिल्मों के साथ किताबों का भी असर होता है। मैं ध्यान से पढ़ता हूं कि लेखक ने किरदार के हावभाव को कैसे लिखा। मैं इन किरदारों को जज्ब कर लेता हूं। मैं पेंटिंग्स और गानों से भी अपनी संवेदनाओं को समृद्ध करता हूं। लोगों से मिल कर भी मैं सीखता हूं। फिर जब मैं अलग-अलग किरदार करता हूं तो ये चीजें मुझे बहुत मदद करती हैं।

कोई काम डर कर न करें

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मैं जो हूं, वो हूं। इमेज को लेकर सजग नहीं रहता। अगर ऐसा होता तो मैं राजू से कहता अभी सत्यमेव जयते के सीजन में अपन न्यूड वाला पोस्टर नहीं रिलीज करते हैं। मैं सिर्फ यह सोचता हूं एक रचनात्मक व्यक्ति के रूप में क्या कर सकता हूं। मुझे लगता है कि रचनात्मक व्यक्ति अगर खुद के प्रति ईमानदारी रखे तो बहुत बड़ी बात है।

वो काम करे जिसे करने में उसका मन हो। वह डर कर कोई काम न करे। मैं समझता हूं कि लोग सत्यमेव जयते के बाद खुद को मेरे करीब महसूस करते हैं और मैं भी खुद को उनके पास महसूस करता हूं। घंटों तक इस शो की रिसर्च से मैं खुद जुड़ता हूं। मैं लोगों की संवेदनाओं से जुड़ता हूं और यह बात मुझे भीतर से बहुत संपन्न बनाती है।

मेरे खिलाफ हैं कुछ लोग

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मैं कुछ समय से देख रहा हूं कि कुछ लोग मेरे और सत्यमेव जयते के खिलाफ हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। कौन हैं। लेकिन मैं खुशकिस्मत हूं कि अधिकतर लोग मेरे साथ हैं। पिछले दिनों एयरपोर्ट पर मेरे लाइन तोड़ने की बात जाने कहां आ गई। यह भी कहा गया कि हम लोग ऐसे ट्रस्ट को पैसा दे रहे हैं जो आतंकवाद को बढ़ावा देता है।

मेरे झूठे इंटरव्यू ‘कोट’ किए गए। जब यह बात बढ़ी तो पुलिस में मुझे शिकायत करनी पड़ी। सोशल नेटवर्किंग के टूल इतने बढ़ गए हैं कि लोग आपके खिलाफ बोल रहे हैं और आप उनसे मुकाबला नहीं कर सकते क्योंकि आपको न उनका नाम मालूम और न चेहरा।

अब अगर कोई कह दे कि आमिर खान आतंकवादी है तो मैं किस किस को जवाब दूंगा कि नहीं मैं वैसा नहीं हूं। फिर हर बकवास का जवाब क्यों दूं? दर्शकों से मेरा 25 बरस का रिश्ता है और वे मुझे जानते हैं।

ये है मेरे काम करने का स्टाइल

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मैं फिल्म में रोल चुनते हुए यह नहीं देखता कि यह कितना कठिन है। मैं कहानी देखता हूं कि उसका मुझ पर कितना असर है। जहां तक पीके का सवाल है, मुझे लगता है कि यह अब तक का मेरा सबसे कठिन रोल है। मैं स्क्रिप्टस देखता हूं। वे अंग्रेजी में भी होती हैं और हिंदी में भी। मैं ऐसी स्क्रिप्ट पसंद करता हूं जिसमें सीन का वर्णन अंग्रेजी में हो और डायलॉग हिंदी में लिखे हों।

शूटिंग से तीन महीने पहले मैं तैयारी शुरू कर देता हूं और स्क्रिप्ट के अपने एक-एक सीन को तैयार करता हूं। मेरे साथ एक हैं प्रकाश भारद्वाज, वे कई सालों से हैं। मैं उनके साथ बैठ कर अभ्यास करता हूं। सीन के अभ्यास के साथ मैं अपने संवादों को डायरी में लिख कर याद करता हूं। जब तक फिल्म की शूटिंग शुरू होती है, तब तक मुझे पूरी स्क्रिप्ट याद हो चुकी होती है।

फिल्म समीक्षकों का महत्व अब भी

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आज सोशल मीडिया के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगों की राय हम तक आती है, लेकिन मैं फिल्म समीक्षकों का महत्व अब भी है। यह हो सकता है कि ऐक्टर या फिल्ममेकर के तौर पर उनकी बात से सहमत न हों। एक अच्छा समीक्षक दर्शकों को फिल्म देखने का अंदाज समझाता है। दर्शक की फिल्म देखने की समझ को विकसित करता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग भाषाओं में समीक्षक हैं।

मैं उन्हें पढ़ता हूं। लेकिन मेरा ये अनुभव है कि समीक्षाओं का बॉक्स ऑफिस पर खास असर नहीं पड़ता क्योंकि फिल्म देखने के मामले लोग अपने दोस्तों की राय पर ज्यादा भरोसा करते हैं। मेरे लिए सबसे खास बात यह होती है कि जो फिल्म हम बनाने चले थे, वह बना सके या नहीं।

इसके बाद मैं देखता हूं कि मेरे परिवार को, मेरे दोस्तों को फिल्म कैसी लगी। उनकी राय मेरे लिए मायने रखती है। मुझे लगता है कि फिल्म समीक्षकों को सितारों से खास दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि वे समीक्षा लिखते वक्त ईमानदारी बरत सकें। यदि वे किसी के नजदीक होंगे, तो उसकी कमियों को खुल कर नहीं लिख सकेंगे।

डॉक्युमेंट्री का चलन बढ़े

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मैं चाहता हूं कि देश में डॉक्युमेंट्री फिल्मों को देखने का चलन बढ़े। यही कारण था कि कुछ महीने पहले मैंने लोगों को फिल्म लगान की मेकिंग की डॉक्युमेंट्री चले चलो टेलीविजन पर दिखाई, मगर इससे पहले यह नहीं बताया कि क्या दिखाने जा रहा हूं। मैं चाहता हूं कि लोग बड़े पैमाने पर उसे देखें।

वह सिर्फ मेरी या आशुतोष गोवारिकर की तारीफ नहीं है, बल्कि यह बताती है कि हम कितनी मेहनत और लगन से फिल्में बताते हैं। अगर मैं पहले से बता देता कि क्या प्रस्तुत करूंगा तो वे लोग उस डॉक्युमेंट्री को नहीं देखते। इसलिए मुझे वह बात छुपानी पड़ी। इस देश में सिनेमा के एक प्रतिशत दर्शक भी डॉक्युमेंट्री नहीं देखते। जबकि दुनिया में बहुत खूबसूरत डॉक्युमेंट्री फिल्में बन रही हैं।

 मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि अगर मैंने किसी को चले चलो दो घंटे दिखाई तो उनका मनोरंजन किया। लेकिन अगर मैंने बुरी चीज दिखाई और आपको लगे कि दो घंटे बोर किया तो मन में मुझे जो गालियां देंगे वो लेने को तैयार हूं। आप कहेंगे कि अगली बार आप मुझ पर भरोसा नहीं करेंगे तो मत कीजिएगा। मैं जो किया उसके प्रति अडिग हूं और रहूंगा।

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