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मुझे 100 करोड़ वाली फिल्में नहीं चाहिएः इरफान खान
रोहित मिश्र
Updated Fri, 08 Feb 2013 04:19 PM IST
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इरफान खान अब से करीब एक साल पहले रिलीज हुई फिल्म 'पान सिंह तोमर' में दिखे थे। इसके बाद उनकी एकमात्र हॉलीवुड फिल्म 'लाइफ ऑफ पाई' रिलीज हुई है। 'पान सिंह तोमर' सफल होने के साथ ऐसी फिल्म भी बनीं जिसकी चर्चा देश-विदेश के हर अवॉर्डस समारोह में हुयी। आमतौर पर जब किसी कलाकार की कोई फिल्म हिट होती है तो वह धड़ाधड़ कई फिल्में साइन कर लेता है। शायद इसे ही सफलता कहते हैं। ऑफर इरफान खान को भी मिले, पर उन्होंने वही फिल्में चुनीं जो उन्हें शूट करती थी।
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'पान सिंह तोमर' के बाद इरफान एक साल से अधिक समय बाद हिंदी फिल्म 'साहब बीवी और गैंग्सटर रिटर्न्स' में नजर आएंगे। यह फिल्म आठ मार्च को रिलीज हो रही है। संयोग ये है कि यह फिल्म उन्हीं तिंग्मांशु धूलिया की है जिनकी 'पान सिंह तोमर' थी। इरफान खान ने अमर उजाला से अपने कॅरियर, फिल्में और इंडस्ट्री से जुड़ी खूब सारी बाते कीं। वह दूसरों की फिल्मों पर कमेंट करने से बचे और बार-बार मुस्कुरा-मुस्कुरा कर कहते रहे कि मुझे सच में नहीं पता कि 'दबंग' जैसी फिल्में क्यों चलती हैं। पेश है इरफान से हुई यह सिलसिलेवार बातचीत,
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आप एक साल बाद किसी हिंदी फिल्म में दिखने जा रहे हैं। हिट फिल्म के बाद इतना गैप क्या जानबूझ कर हुआ ?
इस बार इतना गैप संयोग से हो गया। आमतौर पर एक साल में मेरी तीन से चार फिल्में रिलीज हो ही जाती है। 'पान सिंह तोमर' के बाद मैं 'लाइफ ऑफ पाई' में व्यस्त हो गया। इस बीच फिल्मों के प्रस्ताव आए लेकिन बात नहीं बनी। कुछ फिल्में ऐसी थीं जो 2012 में रिलीज होनी थीं पर हो नहीं पायीं। शायद इन्हीं वजहों से इतना गैप हो गया।
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'पान सिंह तोमर' के बाद अब 'साहब बीवी और गैंगस्टर', लगातार दूसरी बार तिग्मांशु धूलिया के साथ। कोई खास वजह ?
पहली बार दर्शकों ने मुझे 'हासिल' फिल्म में नोटिस किया था। इस फिल्म में मैं निगेटिव किरदार में था पर इसके बाद मुझे हीरो या साइड हीरो की भूमिकाएं मिलनी शुरू हो गयी थीं। 'हासिल' तिग्मांशु धूलिया की फिल्म थी। उसी फिल्म को करने के दौरान मेरे और तिग्मांशु के बीच एक रिश्ता बन गया था। तिग्मांशु को मैं अच्छा एक्टर लगता हूं और मुझे लगता है कि तिग्मांशु मुझसे सबसे अच्छा काम ले सकते हैं। यही वजह है कि मैं और तिग्मांशु बार-बार साथ दिखते हैं। उन्होंने मुझे जब-जब फिल्म ऑफर की है मैने उस फिल्म को प्राथमिकता से लिया है।
फिल्म साइन करते वक्त इस बात पर कितना ध्यान देते हैं कि फिल्म का निर्देशक कौन है।
फिल्म की पटकथा देखने के बाद मैं निर्देशक ही देखता हूं। मेरा कॅरियर देख लीजिए, कुछ फिल्मों को छोड़कर मैने हमेशा बड़े निर्देशकों के साथ ही काम किया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि मैं नए निर्देशकों को खारिज कर देता हूं। मेरी बहुत सारी फिल्में नए निर्देशकों के साथ भी हैं। अब 'दिल कबड्डी' का ही उदाहरण ले लीजिए। उसके निर्देशक नए थे। मुझे लगा कि वह इस फिल्म को बना सकते हैं तो मैने वह फिल्म साइन की। मै रोल देखने के साथ यह भी देखता हूं कि निर्देशक जो कहानी मुझे सुना रहा है उसे वह साकार कर पा रहा है या नहीं।
किसके साथ फिल्में करने में सबसे ज्यादा मजा आया या चैलेजिंग लगा ?
मुझे विशाल भारद्वाज की 'मकबूल' फिल्म आज भी याद है। मेरे लिए उस फिल्म में सीखने के लिए बहुत कुछ था। विशाल के अलावा मुझे सुधीर मिश्रा और तिग्मांशु धूलिया के साथ काम करने में अच्छा लगा।
इन दिनों सौ करोड़ फिल्मों की सफलता को नापने का पैमाना बन गया है। आप पर भी कुछ दवाब ?
दो बाते हैं। पहली मेरी सौ करोड़ के क्लब में कोई दिलचस्पी नहीं है। दूसरी बात, मैं सौ करोड़ कमाने वाली फिल्म बना भी नहीं सकता। वह अलग तरह की फिल्में होती हैं। मैने हमेशा वह फिल्में की हैं जिन्हें करते वक्त मैं अपने अंदर के कलाकार को भी संतुष्ट कर सकूं। मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं कि जो दस साल बाद भी अच्छी कही जाएं। मुझे खुशी है कि लोग मेरी पुरानी फिल्में इसलिए याद रखते हैं क्योंकि उन फिल्मों ने अच्छा कारोबार किया था।
'दबंग', 'सिंघम' या 'राऊडी राठौर' जैसी फिल्मों के बारे में क्या कहेंगे ? इन फिल्मों ने 100 करोड रूपए कमाए हैं।
इन दिनों इंडस्ट्री की अच्छी बात यह है कि यहां हर तरह की इंटरनेटर फिल्में बन रही हैं। यह बन इसलिए रही हैं क्योंकि दर्शक इन्हें पसंद कर रहे हैं। यहां 'पान सिंह तोमर' भी बन रही है, 'दिल कबड्डी' भी बन रही है और 'सिंघम' भी बन रही है। अच्छी बात यह है कि हर तरह की फिल्मों को दर्शक मिल रहे हैं। स्थितियां तेजी के साथ बदली हैं दर्शक अच्छे सिनेमा को तवज्जो दे रहा है। यदि 'पान सिंह तोमर' कुछ सालों पहले बनती तो शायद सफल न हो पाती। समाज में दर्शकों की इतनी किस्में हैं कि एक ही प्रकार की फिल्में उन्हें संतुष्ट नहीं कर सकतीं।
अपनी तरह की फिल्में बनाने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा ?
जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में दाखिल हुआ था तो यहां एक जैसी फिल्में ही बन रही थीं। प्रयोग की गुजांइश न के बराबर। यह वह दौर भी था जब पायरेसी अपने चरम पर थी। लोग सिनेमाघरों में फिल्म देखना आना कम कर चुके थे। यह मेरा उत्साह खत्म करने वाली बात थी। पर मैने उस समय भी काम किया। अपनी शुरुआती दौर में ऐसी फिल्में कीं जो दर्शकों की बड़ी संख्या तक नहीं पहुंची पर फिल्मकारों तक मेरा काम पहुंचा। यदि उस समय मैं यह मानकर बैठ जाता कि यहां मेरा कुछ हो ही नहीं सकता तो मैं आज यहां नहीं होता।
हॉलीवुड फिल्मों से जुड़ने की कोई खास वजह?
मुझे लगता है कि हॉलीवुड फिल्में मेकिंग के लिहाज से हिंदी फिल्मों से आगे हैं। वह फिल्में करके मैं सीखता हूं। आप 'लाइफ ऑफ पाई' का ही उदाहरण ले लीजिए। क्या 'लाइफ ऑफ पाई' को इस रूप में भारत में बना सकते हैं जिस तरह से हॉलीवुड में बनायी गयी है। यही बातें मुझे हॉलीवुड की ओर खींचती रही हैं।
गॉडफादर नाम की चीज पर विश्वास करते हैं क्या ?
इंडस्ट्री में जब मैं आया था तो मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। आज भी नहीं है। फिर भी वैसी फिल्में कर रहा हूं जैसी मैं करना चाहता था। मतलब साफ है इंडस्ट्री में गॉडफादर के दम पर सरवाईव नहीं किया जा सकता। गॉडफादर किसी एक फिल्म में आपको ब्रेक दे सकते हैं, वह आपके कॅरियर को ढो नहीं सकते। इसकी साफ वजह है कि गॉडफादर का खुद का अपना करियर होता है। अपने करियर के लिए वह उन्हीं को मौके देते हैं जिनसे होकर उनकी सफलता निकलती हो।