जब जानबूझ कर गुरुदत्त ने दांतों से काट ली थी वहीदा की उंगली
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अपनी विशेष फिल्म स्टाइल के लिए नाम और शोहरत कमाने वाले गुरुदत्त की आज 90वीं जयंती हैं। आज के दिन ही इस महान अभिनेता बंगलोर में जन्म लिया था। उन्होंने ऐसा भी समय देखा है जब वह दाने-दाने को मोहताज थे। रियल एस्टेट के व्यवसाय में उन दिनों रिजवी ब्रदर्स का काफी नाम था।
मुंबई में पाली हिल स्थित गुरुदत्त के आवास की बिक्री उन्हीं के माध्यम से हुई थी और फिर उसी इलाके में नया अपार्टमेंट भी उन्होंने ही गुरुदत्त को दिलवाया था।
यह तब की बात है, जब अपनी कालजयी फिल्म 'कागज के फूल' की अप्रत्याशित विफलता के बाद गुरुदत्त दाने-दाने के मोहताज हो गए थे। 'चौदहवीं का चांद' बनाने के बाद हालांकि उन्हें उस जिल्लत से मुक्ति मिल गई थी, तब भी अपने उस फ्लैट को उन्होंने नहीं छोड़ा और वहीं उनका अवसान हुआ। उन्हीं एक फिल्म के सेट पर वो घटना घटी।
निर्देशक के कट कहने पर उन्होंने पान का बीड़ा पेश करती हुई वहीदा रहमान की...
वरिष्ठ फिल्म पत्रकार रामकृष्ण बताते हैं कि रिजवी ब्रदर्स के सबसे छोटे पार्टनर याकूब हसन से मेरा भी अच्छा परिचय था। उनको लेखन में भी रुचि थी और फिल्म निर्माण में भी। उन्होंने धर्मेंद्र, मीना कुमारी, शशि कपूर और हेमामालिनी जैसे कलाकारों को लेकर 'बहारों की मंजिल' और 'नाच उठा संसार' फिल्में भी बनाईं। पहली फिल्म तो उत्तर प्रदेश फिल्म पत्रकार संघ द्वारा पुरस्कृत भी की गई।
हम दोनों की हर दूसरे-तीसरे दिन मुलाकात होती रहती थी। यह हमारा नियमित कार्यक्रम था। मुझे अब भी 10 अक्टूबर 1964 के उस मनहूस दिन की याद है। उस दिन भी याकूब भाई सरेशाम मेरे आवास पर पहुंच गए थे। झांसी से आए मेरे एक अन्य मित्र भी उन दिनों मेरे साथ ठहरे हुए थे। नाम था नारायण सिंह।
'तीसरी कसम' में अभिनय के दौरान निर्देशक द्वारा कट कहने पर जिस तरह उन्होंने पान का बीड़ा पेश करती हुई वहीदा रहमान की उंगलियों को काट लिया था, उसकी उन दिनों पर्याप्त चर्चा थी। उस समय याकूब गुरुदत्त का खैर-मखदम करते हुए ही मेरे आवास पर आए थे, इससे उन्हीं के बारे में हम लोगों की बातचीत चल रही थी।
आखिरी रात क्या कह रहे थे गुरुदत्त?
तभी गुरुदत्त का टेलीफोन उनके नाम आया। बोले थे, 'यार, बहुत अनकंफर्टेबल महसूस कर रहा हूं। आ जाओ तो अच्छा रहेगा।' जवाब में याकूब को यह कहते मैंने सुना, 'अभी घंटे भर पहले तो आपसे मिल चुका हूं, भाईजान। फिर इस वक्त न सिर्फ रामकृष्ण बल्कि उनके एक मेहमान भी साथ में हैं। कल किसी वक्त मैं फिर मिल लूंगा।'
इस पर उनको जवाब मिला था, 'तो उन दोनों को भी साथ ले आओ। खानापीना हम लोग इकट्ठे कर लेंगे।' लेकिन उनके इस आग्रह-अनुरोध को भी हम लोगों ने पूरी तरह अनसुना कर दिया। दूसरी सुबह खबर मिली कि गुरुदत्त अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए हैं।
उस रात की पूरी कहानी, जिसने गुरुदत्त को छीन लिया
जिस रात के काले अंधेरों के आगोश में गुरुदत्त मौत की नींद सो गए थे उस रात उन्होंने जमकर शराब पी थी, इतनी उन्होंने पहले कभी नहीं पी थी। गीता (उनकी पत्नी, जिनके साथ वह उनके अलगाव का दौर था) के साथ उनकी नोंकझोंक हो गई थी।
गीता ने उनकी बिटिया को उनके साथ कुछ वक्त बिताने के लिए भेजने से इंकार कर दिया था। गुरुदत्त अपनी पत्नी को बार–बार फोन कर रहे थे कि वह उन्हें अपनी बेटी से मिलने दे लेकिन गीता फोन नहीं उठा रही थी।
हर फोन के साथ गुरुदत्त का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। अंत में उन्होंने अल्टीमेटम, या फिर कहें कि यह संकेत देते हुए कहा, 'बच्ची को भेज दो या फिर तुम मेरा मरा मुंह देखो।' इसके बाद उन्होंने करीब एक बजे खाना खाया और ऐसे सोए कि दुबारा नहीं उठे । उनकी मौत उनके कमरे में हुई।
गुरुद्त्त और वहीदा रहमान की प्रेम कहानी
गुरुदत्त ने वहीदा रहमान से प्रेम किया। गुरुदत्त ने ही उन्हें 'सीआईडी' में पहला ब्रेक दिया। इस फिल्म से ही गुरुदत्त वहीदा को प्यार करने लगे। पहली नजर में ही उन्हें वहीदा "चौदहवीं का चांद" नजर आईँ। गीता दत्त उनकी पत्नी थी। इस प्रेम कहानी का असर उनके परिवार पर भी पड़ा।
परिवार टूटने के बावजूद गुरुदत्त प्रेम में डूबते गए। बेहद संवेदनशील गुरुद्त्त के लिए अपने प्यार को पाना मुश्किल था। इन स्थितियों ने उन्हें अकेलेपन और गहरी उदासी की तरफ धकेल दिया। गुरुदत्त ने आत्महत्या की। कहा जाता है कि इस आत्महत्या के पीछे कहीं न कहीं उनके प्रेम का सफल न होना भी है।