अलग फिल्मों के लिए तैयार हैं दर्शक: दिनेश विजन
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सिनेमा को बदलने में निर्देशकों-ऐक्टरों के साथ नई पीढ़ी के निर्माताओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। दिनेश विजन उन युवा निर्माताओं में हैं जिन्होंने दर्शकों की नब्ज पढ़ कर फिल्में बनाईं। मात्र 23 की उम्र में उन्होंने बीइंस साइरस से शुरुआत की थी। आज उनकी फिल्म बदलापुर रिलीज हो रही है। फिल्मों पर दिनेश विजन से बातचीत की रवि बुले ने...
बीइंग साइरस जैसी अलग फिल्म से शुरुआत के बाद आपने सैफ अली खान के साथ कई फिल्में बनाईं। फिल्म में आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या होता है?
मेरे लिए कहानी सबसे महत्वपूर्ण होती है। अगर मुझे लगता है कि यह कहानी कहनी है तो मैं हर तरह का जोखिम ले सकता हूं। बीइंग साइरस को ही देखिए, वह इंग्लिश में थी। गो गोवा गॉन, लव आजकल और कॉकटेल मैंने सैफ के साथ मिल कर बनाई। यह संयोग ही है कि मैंने जो फिल्में बनाईं, वे सब अलग-अलग किस्म की हैं।
कहानी का चयन कैसे करते हैं?
सबसे पहले तो देखता हूं कि कहानी से मैं खुद को कनेक्ट कर सकूं। उसके बाद सब ठीक हो जाता है। डायरेक्टर भी मैं ऐसा चुनता हूं कि जिसे लगे यह कहानी दर्शकों से कहनी है। उसके इरादे पवित्र होने चाहिए। फिल्म से जुड़े धन के सारे मुद्दे तो सुलझ जाते हैं। मैं दूसरे प्रोड्यूसरों की तरह सिर्फ पैसा नहीं लगता। मुझे लगता है कि आज निर्माताओं को रचनात्मक होना पड़ेगा। मेरे लिए फिल्म का संगीत बहुत जरूरी हिस्सा होता है और उसे तैयार करने में मैं सीधे तौर पर शामिल रहता हूं। बदलापुर के गीत मेरे हैं।
श्रीराम राघवन की एजेंट विनोद नहीं चली थी, मगर फिर उनके साथ बदलापुर बनाने के लिए आप कैसे तैयार हुए?
मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूं। मुझे उनकी एक हसीना थी और जॉनी गद्दार बहुत पसंद है। हमारी एजेंट विनोद नहीं चली, लेकिन मुझे वह भी अच्छी लगती है। उसकी रिलीज की टाइमिंग थोड़ी गड़बड़ा गई थी। मुझे लगता है कि बदलापुर श्रीराम की सबसे अच्छी फिल्म है। उन्होंने यह बहुत तेज गति से बनाई है, जबकि वह एक फिल्म बनाने में दो-दो साल लगा देते हैं। बदलापुर मई में शूट की और फरवरी में रिलीज हो रही है।
अलग फिल्में बनाने का शानदार समय
आजकल बॉन्डेड स्क्रिप्ट की बड़ी चर्चा होती है। क्या आप सीधे स्क्रिप्ट सुनते हैं?
मेरे पास तो आज तक ऐसी स्क्रिप्ट नहीं आई। हम कहानी सुनते हैं। मेरी कोशिश है कि लेखकों को आगे बढ़ाया जाए, उन्हें सहज बनाया जाए। उन्हें सम्मान मिले क्योंकि लेखन के बिना फिल्म कैसे बन सकती है। मुझे लगता है कि अब लेखकों की स्थिति बेहतर हो रही है। किताबों के अधिकार खरीदे जा रहे हैं। हमारी फिल्म इंडस्ट्री विकसित हो रही है।
कहा जा रहा है कि बदलापुर जोखिम भरी फिल्म है! क्या सहमत हैं?
फाइंडिंग फैनी के वक्त भी मुझसे यही बात कही गई थी। परंतु वह जिस बजट में बनी थी, उसमें जोखिम उतना नहीं था। हमारे दर्शक स्मार्ट हो चुके हैं तो ऐक्टर भी समझदार हो गए हैं। वे हर तरह की फिल्में करना चाहते हैं और फाइंडिंग फैनी या बदलापुर जैसी फिल्म के लिए वे बहुत ज्यादा फीस नहीं लेते। इससे जोखिम कम हो जाता है।
फिल्म बिजनेस को आप किस तरह से देखते हैं?
वास्तव में इस व्यवसाय का कोई ठोस रूप-आकार नहीं है। सबसे पहले निर्माता के रूप में आप अपने लिए ही फिल्म बनाते हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि लोग भी उसे पसंद करेंगे। लेकिन खास बात यह कि आप फिल्म को सिर्फ दर्शकों के नजरिये से भी नहीं बना सकते क्योंकि अगर ऐसा किया तो आप न यहां के रहेंगे और न वहां के। सच बात तो यह है कि दर्शक आज अलग किस्म की फिल्मों के लिए तैयार हैं। फिल्में बनाने का यह शानदार समय है।