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अब नहीं बेचना पड़ेगा किसी खिलाडी को मेडल
एजुकेशन डेस्क/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 17 Oct 2014 11:56 AM IST
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देश में अपने बल पर शोहरत पाने वाले खिलाड़ियों की कमी नहीं है लेकिन विषम परिस्थितियां उन्हें गुमनामी के अंधकार में धकेल देती हैं। देश के लिए मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को अपनी जीविका के लिए मेडल बेचने तक मजबूर होना पड़ता है।
ऐसे ही खिलाड़ियों को गुमनामी के अंधेरे से बाहर लाने केप्रयास में दिल्ली विवि केबीए ऑनर्स (ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंस) के छात्र लगे हुए हैं। छात्रों की टीम खासकर दिल्ली-एनसीआर से ऐसे स्पोर्ट्स हीरो को तलाश कर पुस्तक में पिरो रही है। छात्रों को इस प्रोजेक्ट के अंक भी मिलेंगे।
दिल्ली विवि केबीए ऑनर्स (ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंस) के छात्र अक्षय अक्ष ने बताया कि इंडियन स्पोर्ट्स हीरो-ग्लोरी इन वेन नाम से एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत कोपेनहेगन विवि (डेनमॉर्क) के एंथ्रोपॉलॉजी के दो छात्र भी मदद कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत यह तलाशने का प्रयास किया जा रहा है कि देश के लिए खेलने के बावजूद समाज से खिलाड़ियों को इज्जत क्यों नहीं मिलती दो मिनट की शोहरत क्यों होती है और क्यों उन्हें मेडल बेचने पर मजबूर होना पड़ता है।
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कहानी प्रकाशित होगी
कोपेनहेगन विवि केएंथ्रोपॉलॉजी के छात्र, कैसपर एंडरसन, जनक रैथॉड, बीए ऑनर्स ह्यूमेनिटीज व सोशल साइंस के छात्र अभिनव शर्मा, अक्षय अक्ष, जावेद मेराज, मनीष चौधरी, प्रज्ञ पांडेय, राहुल गौतम, व प्रोजेक्ट मैनटर डॉ शिखा गौतम।
अक्षय अक्ष ने बताया कि अभी तक की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि क्रिकेट के अलावा अन्य खेल खेलने वाले खिलाड़ियों को वह शोहरत नहीं मिलती है। खिलाड़ी किसी तरह से अपने दम पर ही अपनी खेल रुचि को प्रमोट करने में लगे हैं। जो कोई खिलाड़ी भाग्यशाली होता है उसे कोई स्पांसर कर देता है। वहीं क्रिकेट को छोड़ दें तो खिलाड़ियों के लिए संसाधन भी नहीं मिलते हैं।
उन्होंने बताया कि अब तक हरियाणा (झज्जर) के बजरंग कुमार की कहानी को जाना है। उन्होंने वर्ष 2011 से रेसलिंग शुरू की। कम समय में ही देश को 11 मेडल दिलाए लेकिन इस तरह से वह देश के हीरो बन ही नहीं पाए। अब जाकर उन्हें किसी तरह से टीटीई की नौकरी मिली है।
धावक दुती चंद को हाइपर-एड्रोजीनियजम के कारण खेलने से रोक दिया गया। अब वह अपने को न्याय दिलाने के लिए लड़ रही हैं। वहीं रेसलिंग खेलने वाले के.डी जाधव हेलंसिकी में वर्ष 1952 में हुए समर ओलंपिक में भारत को कांस्य पदक दिला चुके हैं। लेकिन कुछ समय बाद उनकी ऐसी अनदेखी हुई कि उन्हें अपनी जीविका के लिए मेडल बेचने पड़े। छात्रों को रिसर्च में पता चला कि फिल्म अभिनेता रितेश देशमुख उन पर फिल्म बनाने वाले हैं। अक्षय ने बताया कि इनकी कहानियों को तैयार कर लिया गया है जिन्हें पुस्तक में प्रकाशित किया जाएगा।
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ऐसे ही खिलाड़ियों को गुमनामी के अंधेरे से बाहर लाने केप्रयास में दिल्ली विवि केबीए ऑनर्स (ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंस) के छात्र लगे हुए हैं। छात्रों की टीम खासकर दिल्ली-एनसीआर से ऐसे स्पोर्ट्स हीरो को तलाश कर पुस्तक में पिरो रही है। छात्रों को इस प्रोजेक्ट के अंक भी मिलेंगे।
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दिल्ली विवि केबीए ऑनर्स (ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंस) के छात्र अक्षय अक्ष ने बताया कि इंडियन स्पोर्ट्स हीरो-ग्लोरी इन वेन नाम से एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत कोपेनहेगन विवि (डेनमॉर्क) के एंथ्रोपॉलॉजी के दो छात्र भी मदद कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत यह तलाशने का प्रयास किया जा रहा है कि देश के लिए खेलने के बावजूद समाज से खिलाड़ियों को इज्जत क्यों नहीं मिलती दो मिनट की शोहरत क्यों होती है और क्यों उन्हें मेडल बेचने पर मजबूर होना पड़ता है।
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कोपेनहेगन विवि केएंथ्रोपॉलॉजी के छात्र, कैसपर एंडरसन, जनक रैथॉड, बीए ऑनर्स ह्यूमेनिटीज व सोशल साइंस के छात्र अभिनव शर्मा, अक्षय अक्ष, जावेद मेराज, मनीष चौधरी, प्रज्ञ पांडेय, राहुल गौतम, व प्रोजेक्ट मैनटर डॉ शिखा गौतम।
अक्षय अक्ष ने बताया कि अभी तक की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि क्रिकेट के अलावा अन्य खेल खेलने वाले खिलाड़ियों को वह शोहरत नहीं मिलती है। खिलाड़ी किसी तरह से अपने दम पर ही अपनी खेल रुचि को प्रमोट करने में लगे हैं। जो कोई खिलाड़ी भाग्यशाली होता है उसे कोई स्पांसर कर देता है। वहीं क्रिकेट को छोड़ दें तो खिलाड़ियों के लिए संसाधन भी नहीं मिलते हैं।
उन्होंने बताया कि अब तक हरियाणा (झज्जर) के बजरंग कुमार की कहानी को जाना है। उन्होंने वर्ष 2011 से रेसलिंग शुरू की। कम समय में ही देश को 11 मेडल दिलाए लेकिन इस तरह से वह देश के हीरो बन ही नहीं पाए। अब जाकर उन्हें किसी तरह से टीटीई की नौकरी मिली है।
धावक दुती चंद को हाइपर-एड्रोजीनियजम के कारण खेलने से रोक दिया गया। अब वह अपने को न्याय दिलाने के लिए लड़ रही हैं। वहीं रेसलिंग खेलने वाले के.डी जाधव हेलंसिकी में वर्ष 1952 में हुए समर ओलंपिक में भारत को कांस्य पदक दिला चुके हैं। लेकिन कुछ समय बाद उनकी ऐसी अनदेखी हुई कि उन्हें अपनी जीविका के लिए मेडल बेचने पड़े। छात्रों को रिसर्च में पता चला कि फिल्म अभिनेता रितेश देशमुख उन पर फिल्म बनाने वाले हैं। अक्षय ने बताया कि इनकी कहानियों को तैयार कर लिया गया है जिन्हें पुस्तक में प्रकाशित किया जाएगा।