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गुस्से में नौजवान, कहीं ये सीजोफ्रेनिया तो नहीं

Fri, 10 Oct 2014 11:59 AM IST
एजुकेशन डेस्क/अमर उजाला ब्यूरो
एजुकेशन डेस्क/अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 10 Oct 2014 11:59 AM IST
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schizophrenia effect on youths of india
आधुनिक जीवनशैली व दौड़भाग भरी जिंदगी के कारण बढ़ता तनाव, पारिवारिक उलझनें, धोखेबाजी, अकेलापन आदि वजहों से लोग सीजोफ्रेनिया की चपेट में तेजी से आ रहे हैं। जागरूकता का अभाव भी इनकी संख्या बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। सही समय पर उपचार नहीं मिलने से मरीजों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जिंदगी की जद्दोजहद और गगनचुंबी सपनों के पीछे भाग रही नौजवान पीढ़ी भी तेजी से इसकी चपेट में आ रही है।
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आंकड़ों पर गौर करें तो देशभर में करीब तीस करोड़ लोग मानसिक रोग से ग्रसित हैं। उपचार के बाद मनोरोग को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है लेकिन जागरूकता का अभाव सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। मौजूदा समय में केवल एक तिहाई मरीज ही उपचार कराने के लिए चिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। इसके अतिरिक्त देश भर में मनोचिकित्सकों की भी भारी कमी बनी हुई है। सवा सौ करोड़ के देश में सिर्फ चार हजार मनोचिकित्सक ही उपलब्ध हैं।
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सीजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति के व्यवहार, विचार, भावनाएं, व्यक्तित्व व कार्य क्षमता पर असर पड़ने लगता है। यह बीमारी 15 से 30 वर्ष की उम्र के लोगों में अधिक होती है। सीजोफ्रेनिया सामान्यत: जैविक, आनुवांशिक, मनोवैज्ञानिक व सामाजिक कारणों से होती है।
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सीजोफ्रेनिया की पहचान
•व्यक्ति भयभीत और आशंकित रहता है और कहता है कि लोग उसका नुकसान कर देंगे अथवा उसके खिलाफ षडयंत्र रचा जा रहा है। उसको लगता है कि उसके परिजन, मित्र सभी उसके दुश्मन हैं।
•व्यक्ति अकेले बैठे- बैठे मुस्कराता, हंसता या बड़बड़ाता रहता है। उसे आवाजें आती हैं, जो उसे डराती, दोष या आदेश देतीं हैं और यह आवाजें किसी अन्य को सुनाई न देती है।
•व्यक्ति समाज से दूर, अकेला रहता है और बिना किसी कारण के काम पर नहीं जाना चाहता है। उसको अपनी साफ- सफाई का तनिक भी होश नहीं रहता है।
•व्यक्ति बिना किसी कारण के ज्यादा आक्रामक या उत्तेजित हो जाता है। इन हालात में वह परिजनों, दूसरों या खुद को चोट पहुंचा सकता है।
•व्यक्ति को शंका रहती है कि उसके भोजन में कुछ मिलाया जा रहा है। इस कारण भूख न लगना या भोजन ग्रहण करने से इन्कार कर बाहर भोजन करता है।

मरीज का न उड़ाएं मजाक
झांसी। मानसिक रोगी के लिए पागल शब्द का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए। मरीज का मजाक न उड़ाकर उसका उत्साह बढ़ाते रहना चाहिए। मानसिक रोग का इलाज लंबा चलता है, इसलिए बिना परामर्श दवा बंद नहीं करनी चाहिए। यदि मरीज सही से दवा नहीं लेता है, तो इसके दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। आत्महत्या प्रवृत्ति वाले मरीजों को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए।


बीमारी के लिए एंटी सायकेट्रिक दवाएं व ईसीटी फायदेमंद
झांसी। मेडिकल कॉलेज के मनोरोग चिकित्सा विभाग के हेड डा. ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि इस बीमारी में एंटी सायकेट्रिक दवाएं एवं ईसीटी (शॉक ट्रीटमेंट) बहुत फायदेमंद साबित होता है। उपचार में देरी या अनियमितता से बीमारी उग्र एवं लंबी अवधि की हो जाती है। तीन से छह माह के निरंतर उपचार के बाद ही इसका फायदा दिखता है। उन्होंने बताया कि जब बीमारी तेजी से प्रकट होती है, तब तुरंत उपचार से मरीज पूरी तरह स्वस्थ्य हो जाता है। वहीं, धीमी प्रकट होने वाली बीमारी में यदि मनोचिकित्सक से निरंतर परामर्श लेकर दवा ली जाए तो अधिकांश मरीज पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं और दवा भी बंद हो जाती है, जबकि कुछ केस में लंबे समय तक दवा चलाने पर ही मरीज ठीक हो पाता है। उन्होेंने बताया कि कई बार परिवार के लोग खुद पहल कर जबरदस्ती मरीजों को लेकर आते हैं।
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