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'जुगाड़ तकनीक' से चकराए IIT के वैज्ञानिक

Fri, 12 Dec 2014 10:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो/इलाहाबाद Updated Fri, 12 Dec 2014 10:51 AM IST
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IIt scientist workshop and child seminar
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) में चल रहे सातवें विज्ञान समागम के चौथे दिन बृहस्पतिवार को वैज्ञानिकों ने भारत में शोध को बढ़ावा देने के लिए नई संभावनाओं वाले क्षेत्र खोजने पर बल दिया। विज्ञान समागम में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि प्रो. जेसी बोस के शोध के शताब्दी बाद भी उस स्तर का कोई शोध नहीं हो सका है।
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विज्ञान समागम में आए नोबेल वैज्ञानिक प्रो. राबर्ट कर्ल ने अपने देश में विज्ञान के क्षेत्र में किए जाने वाले प्रयासों की जानकारी देने के साथ बताया कि अमेरिका में विवि में पेटेंट्स को स्थानांतरित करने की व्यवस्था है। उन्होंने बताया कि भारत में भी इस दिशा में जिज्ञासा बढ़ाने की आवश्यकता है। ट्यूरिंग एवार्डी प्रो. जोसेफ सिफाकिस ने छात्रों एवं शोधार्थियों से पर्यावरण के क्षेत्र काम करने पर बल दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया किया शोध गतिविधियों का नियंत्रण वैज्ञानिकों के हाथ में होना चाहिए। उनका कहना था कि आज नौकरशाहों को विज्ञान से जुड़ी संस्थाओं का नियंत्रण सौंप दिया गया है जो अन्वेषण की प्रक्रिया को हानि पहुंचा रहे हैं। उन्होंने उद्योग घरानों से भी विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले शोध में मदद के लिए आगे आने को कहा।
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जाने माने खगोल विज्ञानी डॉ. जयंत नार्लिकर ने शोध को बढ़ावा देने केलिए विश्वविद्यालयों में आपस में समन्वय स्थापित करने की बात कही। उन्होंने कहा कि इसके अंतरविश्वविद्यालयीय केन्द्र बनाए जाएं। पुक्यांग राष्ट्रीय विवि के वैज्ञानिक डॉ. मान-गॉन पर्क ने कोरिया में विज्ञान के क्षेत्र में किए गए काम का उल्लेख किया। डॉ. लीना नीलसन ने नवाचार को विकसित करने की बात कही। ओहियो विवि प्रो. अनीस अरोरा ने कहा कि असफलताओं से परेशान होकर शोध के क्षेत्र से विमुख नहीं होना चाहिए। डीपी अग्रवाल ने कहा कि अच्छे परिणाम के लिए जोखिम लेना चाहिए। डॉ. एचसी जोशी ने कहा कि जुगाड़ आर्थिक रूप से उत्तम नहीं होता वह केवल विशिष्ट अवस्था में लाभदायक होता है। बातचीत के दौरान प्रो. एम राधाकृष्णन, निदेशक सोमनाथ विश्वास ने छात्रों से गणित के मूल्यों की ओर से छात्रों को जुड़ने की बात कही।
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पोलियो की तरह फ्लूरोसिस से भी मुक्त होगा भारत
योगेंद्र पांडेय
इलाहाबाद। देश में फ्लूरोसिस नामक बीमारी की चपेट में आ चुके लोगों के लिए अच्छी खबर है। सही खान-पान और पानी में फ्लोराइड की मात्रा कम करके इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। देश के जाने-माने न्यूरो सर्जन एवं वैज्ञानिक डॉ. डी. राजा रेड्डी ने इसके लिए मध्य प्रदेश के ऐसे गांवों में सफल प्रयोग किया जहां फ्लूरोसिस के कारण बच्चों की जिंदगी तबाह होने के कगार पर थी। पानी के जरिए फ्लोराइड से उनकेशरीर के जोड़ों, हड्डियों में अकड़न आ गई थी। डॉ. डी राजा रेड्डी ने राष्ट्रीय आंकडों का हवाला देते हुए बताया कि देश के 20 प्रदेशों के 275 शहरों में 66 मिलियन लोग फ्लूरोसिस नामक बीमारी की चपेट में हैं। कहा कि इसके लिए मध्यप्रदेश के यशोदा कुमजी और मियाटी नामक दो गांव के फ्लूरोसिस से पीड़ित 24 बच्चों को लिया। बच्चों की यूरिन, ब्लड सहित कई तरह की जांचे की गईं। पानी चेक कराया गया। पता चला कि इलाके में दो कुएं के पानी में वन पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) फ्लोराइड है, बाकी सभी पीने के पानी के स्रोतों से वन पीपीएम से अधिक फ्लोराइड पाया गया। इससे बच्चे फ्लूरोसिस की चपेट में आए। इससे छुटकारा दिलाने के लिए एक विशेष किट तैयार कर बांटी गई। इस प्रक्रिया को लगातार डेढ़ साल अपनाई गई अब सभी फुटबाल खेल रहे हैं।
साइंस पावरफुल है या नेचर

छात्रों ने पूछे हतप्रभ करने वाले सवाल
‘साइंस पावरफुल है या नेचर’, ‘साइंस का चार्म क्या है’, ‘इमेजिनेशन को इनोवेशन में कैसे कन्वर्ट किया जा सकता है’, ‘जुगाड़ तकनीकी क्या है’, ‘साउथ कोरिया से क्या सीख सकते हैं’ सहित कई हतप्रभ करने वाले सवाल पैनल में बैठे 11 वैज्ञानिकों से किए। वैज्ञानिकों ने भी सवालों का जवाब बहुत ही सामान्य और सुलझे तरीके से दिया, जिससे कि छात्रों को समझने में जरा भी दिक्कत नही हुई। वैज्ञानिकों ने बताया कि साइंस और नेचर में पावरफुल जैसी कोई बात नहीं है, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। क्रिकेट में सचिन, बॉक्सिंग में मैरीकॉम की तरह साइंस में कोई चार्म नहीं है। यह अपने अंदर की चीज है जिसके लिए एप्रोच होना जरूरी है।


वैज्ञानिकों से मिल छात्रों ने खोजे गूढ़ सवालों के जवाब
इलाहाबाद (ब्यूरो)। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) में चल रहे सातवें विज्ञान समागम में भाग लेने आए छात्रों ने अपने सवालों से प्रतिभागी वैज्ञानिकों को भी चकरा दिया। छात्रों ने नोबेल वैज्ञानिक प्रो. राबर्ट कर्ल ने पूछा कि आखिर में नोबेल पुरस्कार पाने केलिए कितनी पढ़ाई करनी पड़ती है, क्या इसके लिए अधिक धन खर्च होता है। उनकी उपलब्धि पर सवाल पूछकर उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया। इन वैज्ञानिकों ने प्रतिभागी छात्रों से अधिक से अधिक समय प्रयोगशाला में बिताने की सीख दी।

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