देश की 8 आईआईटी के पास नहीं है स्थायी परिसर
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सरकारें राजनीतिक फायदे के लिए घोषणाएं तो कर देती है लेकिन इन पर अमल में सालों साल लग जाते हैं। इस लेट-लतीफी का सबसे बड़ा उदाहरण मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से 8 नए आईआईटी संस्थान के निर्माण का मामला है।
पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने साल 2008 में इन संस्थानों के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी लेकिन आज तक इनके लिए स्थायी परिसरों का निर्माण नहीं हो सका है। तीन आईआईटी की इमारत का काम तो अभी तक शुरू नहीं हो पाया है।
इसका नतीजा यह हुआ कि आठों संस्थानों की कुल कीमत जोकि 6080 करोड़ रुपये आंकी गई थी, वह अब बढ़कर 15664 करोड़ रुपये हो गई। करोड़ों के नुकसान के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी कम जिम्मेदार नहीं है, जिसने संशोधित लागत का सिर्फ 18 फीसदी फंड ही राज्यों को दिया है।
स्थायी परिसर नहीं होने का नुकसान छात्रों को भी उठाना पड़ता है। देश में आईआईटी के लिए हर साल लाखों बच्चे आवेदन करते है, लेकिन अस्थायी परिसर होने से तय क्षमता के मुताबिक छात्रों की भर्ती नहीं हो पा रही है।
2006 में शुरू हुई थी प्रक्रिया
वर्ष 2008 में बिहार, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और मध्य प्रदेश में आठ नए आईआईटी बनाने का प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूर हुआ था। इन सभी आईआईटी को छह साल में बनकर तैयार हो जाना चाहिए था।
आठ में से तीन रोपड़, इंदौर और राजस्थान की आईआईटी में तो इमारत का निर्माण बिल्कुल भी नहीं हुआ है। मंडी में स्थायी परिसर का सिर्फ नौ फीसदी निर्माण कार्य पूरा हो पाया है।
बिहार, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में आईआईटी बनाने की प्रक्रिया केंद्र स्तर पर 2006 से ही शुरू हो गई थी। इस पूरी परियोजना में विलंब का प्रमुख कारण लालफीताशाही ही है। योजना आयोग ने परियोजना को कम समय में पूरा करने के निर्देश दिए थे।
देरी की प्रमुख वजहों में राज्य सरकारों की ओर से भूमि की उपलब्धता, मास्टर प्लान तैयार करने और इमारत के निर्माण के लिए आर्किटेक्ट की नियुक्तियों में देरी रही है। साथ ही पर्यावरण मंजूरी में देरी और स्थानीय किसानों की ओर से आंदोलन भी एक अहम वजह रही है। कैग ने भी इस देरी के लिए मानव संसाधन मंत्रालय से जवाब तलब किया है।