'जांच पैनल में मुझे संदेह भरी निगाहों से देखा गया'

एजेंसी/अमर उजाला, दिल्ली Updated Tue, 26 Nov 2013 07:31 AM IST
विज्ञापन
sexual harassment victim questions enquiry panel

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
हाल में एक रिटायर्ड जज पर यौन प्रताड़ना का आरोप लगाने वाली इंटर्न ने एक बार फिर इस मुद्दे पर अपने जज्बातों का खुलासा किया है।
विज्ञापन

इस बार उसने इस मामले की जांच कर रहे तीन सदस्यीय पैनल के सामने पेश होने के दौरान हुए अहसास का जिक्र किया है। वॉल-स्ट्रीट जर्नल को दिए एक इंटरव्यू में उसने कहा कि पैनल के सामने पेश होते समय ऐसा लग रहा था कि उसे संदेह भरी निगाहों से देखा जा रहा है।
उसने यौन प्रताड़ना का आरोप लगाने में देरी की वजह का भी खुलासा किया है। उसने कहा है कि चूंकि भारतीय कानून इतने संवेदनशील नहीं हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों से ठीक तरह से निपट सकें इसलिए आरोप लगाने का फैसला करने में देरी हुई।
दरअसल इस युवती के ताजा खुलासों को ‘लीगली इंडिया’ वेबसाइट ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से उद्धृत किया है। यह वही वेबसाइट है, जिसने पहली बार युवती की यौन प्रताड़ना के प्रसंग का खुलासा किया था।

‘लीगली इंडिया’ के मुताबिक वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए इंटरव्यू में युवती ने कहा है कि जांच पैनल के सामने पेश होते समय उसे लगातार यह लगा कि उसे संदेह भरी निगाहों से देखा जा रहा है। उसे यह विश्वास दिलाना पड़ा कि वह झूठ नहीं बोल रही है। कहानी नहीं गढ़ रही है। पैनल के इस रवैये से उसने अपमानित महसूस किया।

वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए एक इंटरव्यू में उसने कहा, यह विडंबना ही है कि एक वकील होने के बावजूद मुझे यह लगता है कि हमारा (भारतीय) कानून या कानून व्यवस्था महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों से संवेदनशीलता के साथ निपटने में सक्षम नहीं है।

इंटरव्यू में उसने कहा, 'अपने ऊपर यौन हमले की सच्चाई को स्वीकार करने में मैंने देर लगाई। यही वजह थी कि इसका जिक्र करने में देर हुई। आखिरकार जब मैंने इसका फैसला लिया उस समय भी मैं अपनी चेतना से इसे मिटा देना चाहती थी। जिस आदमी ने मेरे साथ यह किया उसकी मैं प्रशंसक थी। उसे बेहद इज्जत के साथ देखती थी।'

उसने कहा, 'मैंने कानूनी रास्ता अख्तियार करने पर विचार किया लेकिन इससे मुझे फायदा होने के बजाय घाटा हो सकता था। पहली बात तो यह कि मेरा मामला बरसों अदालत में घिसटता रहता। दूसरी यह कि जिरह के दौरान बचाव पक्ष के वकील बार-बार मेरी उन यादों को कुरेदते रहते, जिन्हें मैं मिटा देना चाहती हूं।'

युवती ने बताया, 'तीसरी बात यह कि इस तरह के यौन हमले में जहां कोई दैहिक सबूत मौजूद नहीं हो, वहां सिर्फ एक दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप ही लगाए जाते रहते। मुझ जैसे लॉ स्टूडेंट के लिए एक बेदाग छवि वाले जज के खिलाफ जीतना मुश्किल लग रहा था। मिसाल के तौर पर अब भी, जब मैं पैनल के सामने हाजिर हुई तो ऐसा लगा कि मुझे संदेह भरी निगाहों से देखा जा रहा है।'

युवती ने कहा है कि अब ज्यादातर महिलाएं सड़कों, घरों और दफ्तरों में यौन प्रताड़ना के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं। वे इसे बरदाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। महिलाओं को लगता था अगर वह अपनी यौन प्रताड़ना के खिलाफ बोलेंगी तो उनका सामाजिक बहिष्कार हो सकता है लेकिन अब वे चुप रहने को तैयार नहीं हैं।

युवती ने जो कहा
:- जांच पैनल के सामने ऐसा लग रहा था कि मुझे संदेह भरी निगाहों से देखा जा रहा है। मुझे यह विश्वास दिलाना पड़ा कि मैं झूठ नहीं बोल रही। कहानी नहीं गढ़ रही। पैनल के इस रवैये से मैंने अपमानित महसूस किया।

:- एक वकील होने के बावजूद मुझे यह नहीं लगता कि भारतीय कानून या कानून व्यवस्था महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों से संवेदनशीलता के साथ निपटने में सक्षम है। यही वजह है कि मैंने यौन प्रताड़ना का आरोप लगाने में देर की।

:- अब ज्यादातर महिलाएं यौन शोषण बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। यौन प्रताड़ना के खिलाफ अब वे खुलकर बोलने को तैयार हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
  • Downloads

Follow Us