'एक बार नहीं, बार-बार हुआ मेरा बलात्कार'
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सारा उसका असली नाम नहीं है। 19 साल की इस युवती के मुताबिक़ उनका बलात्कार कई बार हो चुका है, और यह हरकत किसी और ने नहीं, उनके सौतेले पिता ने ही की है।
सारा का चेहरा मिज़ोरम की उस आबादी में कहीं दबा-छुपा है, जो इस राज्य को प्रति महिला बलात्कार की दर के मामले में सबसे आगे करता है।
सारा जहां पली-बढ़ीं, वहां ऐसे हादसों पर बात नहीं की जाती। न समाज इस स्याह सच को सामने आने देता है, न स्थानीय मीडिया इस तरह की रिपोर्ट करता है।
इसकी कलई नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में खुलती है, जहां बाक़ी भारतीय राज्यों के मुक़ाबले बलात्कार की दर सबसे ज़्यादा (20.81) मिज़ोरम में है।
'मेरी मर्ज़ी चलती तो मैं नहीं करती'
ये संख्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 10,97,206 की आबादी वाले राज्य के मतदाताओं में औरतों की तादाद मर्दों से 12,856 ज्यादा है।
ये इसलिए भी आश्चर्यजनक भी है क्योंकि मिज़ोरम में साक्षरता दर (89.27%) भी शीर्षस्थ राज्यों में तीसरे स्थान पर है।
सारा का जब पहली बार बलात्कार हुआ, तब वे 10 साल की थीं। उन्होंने अपनी मां को बताया भी था। मां ने तय किया था कि पिता के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं होगी।
सारा उसी पिता के साथ रहती रहीं। जब वे मुझे मिलीं तो बहुत सहमी-सकुचाई सी लगीं। उन्होंने मुझे बताया कि पिछले साल पिता ने फिर बलात्कार किया था, पर इस बार भी वही हुआ।
सारा बालिग़ हो गई हैं, पर परिवार फिर आड़े आ गया। उन्होंने बताया, “परिवार ने कहा-पिता को माफ़ कर दो, इसलिए मैंने कर दिया. मेरी मर्ज़ी चलती तो मैं नहीं करती।”
खुलेपन के बावजूद महिला हिंसा में कमी नहीं
मिज़ोरम में खुलेपन के बावजूद महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की कमी नहीं है। सारा की ही तरह मिज़ोरम की ज़्यादातर आबादी ईसाई है।
इन लोगों में हर तरह की हिंसा के मामले में हिंसा करने वाले को ‘माफ़ करने’ का चलन है। इसके पीछे मान्यता है कि अगर इंसान ख़ुद को बदलने की मंशा दिखाए, तो उसे दूसरा मौक़ा देना चाहिए।
सारा ने माफ़ी दी, पर वह यौन हिंसा का जुर्म कम न हुआ। उन्होंने मुझसे बहुत रुआंसी होकर कहा, “अपने पिता से तो डर लगता ही था, अब सभी मर्दों से लगता है।”
पिछले साल हुए बलात्कार के बाद अब सारा अपने मां-बाप से अलग किसी और घर में रहती हैं, जहां वह एक बच्ची की देख-रेख करती हैं।
इसके लिए उन्हें तनख़्वाह भी मिलती है। अपने पैसे कमाना सारा के लिए बहुत ज़रूरी है।
डर सड़क पर नहीं, घरों के भीतर है
मुझे कहती है कि स्कूल छूटने का दुख तो है पर अब वो ब्यूटीशन का काम करना चाहती है। सारा के मुताबिक, “मैं अपने मां-बाप पर निर्भर नहीं रहना चाहती, उनसे दूर रहकर खुश हूं।
अपने फ़ैसले लेना चाहती हूं।” सारा एक ग़रीब परिवार की लड़की है। इस पूरे समय में ‘आयको’ नाम के महिला संगठन ने उसकी मदद की।
छुआनतेई ‘आयको’ में काउंसलर हैं और बलात्कार पीड़ित लड़कियों को उनके क़ानूनी अधिकारों के बारे में बताती हैं। मिज़ोरम में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा है लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी बेहद कम है।
वे कहती हैं, “मिज़ोरम में बलात्कार के ज़्यादातर मामलों में परिवार माफ़ी का रास्ता चुनते हैं, लेकिन इसमें अक़्सर लड़की की मर्ज़ी नहीं ली जाती।
हम कोशिश करते हैं कि लड़की को हौसला और जानकारी दें ताकि वो अपने मन का फ़ैसला ले पाएं, पर कई बार ऐसा नहीं हो पाता।”
घर-परिवार की अंदरूनी हिंसा को लेकर चुप्पी
छुआनतेई के मुताबिक़ बलात्कार के ज़्यादातर मामले ग़रीब तबके के परिवारों में हो रहे हैं और इनमें हिंसा करने वाला पीड़ित लड़की का दोस्त या रिश्तेदार होता है।
ये तस्वीर उस मिज़ोरम से बहुत अलग है जो शहर में आम दिखाई पड़ती है। कॉलेज जाने वाली लड़कियां अकेले घूमते दिखती हैं और बाज़ार में ज़्यादातर व्यापारी भी महिलाएं ही हैं।
कैथरीन मिज़ोरम विश्वविद्यालय में सामाजिक कल्याण विभाग में पढ़ाई कर रही हैं। वो राजधानी आइज़ॉल में अकेले रहती हैं।
मुझसे वो कहती हैं, “सड़कों पर डर जैसा माहौल बिल्कुल नहीं है लेकिन घर-परिवार की अंदरूनी हिंसा को लेकर चुप्पी ज़रूर है। कोई नहीं मानना चाहता कि मिज़ो पुरुष हिंसा कर सकते हैं।”
संख्या है, पर सत्ता में हिस्सा नहीं
एक तरफ़ पढ़ी-लिखी अपनी रोज़ी कमाने वाली महिलाएं और एक तरफ़ हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठा पाने की बंदिश।
मैंने मिज़ोरम की राजधानी में जितना समय बिताया, इन्हीं दो तस्वीरों के बीच दूरी समझने की कोशिश करती रही, और आखिरकार एक तार मिला।
मिज़ोरम वह राज्य है, जहां से आज तक कोई महिला सांसद चुनकर संसद नहीं पहुंची। पिछले 25 साल से 40 सीटों वाली राज्य विधानसभा में भी कोई महिला नहीं चुनी गई।
किमतेई के मुताबिक़ मिज़ोरम में महिलाओं के लिए जो ख़ुलापन और आज़ादी दिखाई पड़ती है, वह भी मर्दों की शर्त पर ही है और जब तक वो पूरी तरह आज़ाद नहीं होंगी, तब तक सारा जैसी लड़कियों को इंसाफ़ पाने का मौक़ा नहीं मिलेगा और हिंसा जैसे मुद्दों पर चुप्पी बनी रहेगी।
(इस कहानी में इस्तेमाल की गई तस्वीरों में से कोई भी सारा की नहीं है.)