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रेप करने वाले ड्राइवर और उसके साथी को होगी फांसी

Sun, 10 May 2015 07:55 AM IST
Updated Sun, 10 May 2015 07:55 AM IST
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capital punishment for rape culprit

वर्ष 2007 में पुणे में बीपीओ कर्मी की बलात्कार के बाद हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक कैब ड्राइवर और उसके साथी को मिली फांसी की सजा को बरकरार रखा। अदालत ने दोषियों को समाज के लिए खतरा बताया है।

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मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली पीठ ने कैब ड्राइवर पुरुषोत्तम बोरटे और उसके दोस्त प्रदीप कोकटे की फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि दोनों को अपराध को अंजाम देते वक्त न तो कोई दुख था और न ही पछतावा।
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दोनों को अपराध को अंजाम देने के बाद भी अपराधबोध महसूस नहीं हुआ। उन्होंने बेहद योजनाबद्ध और सतर्कता के साथ इस क्रूरतापूर्ण अपराध को अंजाम दिया।

दोनों द्वारा किया गया अपराध मानवता को शर्मसार करने वाला है। इसकी भी पूरी-पूरी संभावना है कि ऐसे अपराधी भविष्य में फिर इस तरह के अपराध को अंजाम दे सकते हैं। अदालत ने इन दोनों के सुधरने की गुंजाइश की संभावना से भी इनकार किया।
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रेप के बाद की थी हत्या

capital punishment for rape culprit

पीठ ने कहा कि इस अपराध ने समाज और अदालत को झकझोर दिया है। पीठ ने इस मामले को धनंजय चटर्जी जैसा मामला बताया। धनंजय ने एक लड़की की बलात्कार के बाद हत्या कर दी थी।

इस मामले में उसे फांसी दी गई थी। मालूम हो, एक बीपीओ में कार्यरत 22 वर्षीय युवती कंपनी की कैब से जा रही थी। कैब ड्राइवर ने अपने एक दोस्त के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी।

निचली अदालत ने कैब ड्राइवर पुरुषोत्तम और प्रदीप को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा।

सुनियोजित तरीके से अपराध को अंजाम दिया

capital punishment for rape culprit

पीठ ने कहा कि कैब ड्राइवर और उसके दोस्त ने जिस सुनियोजित तरीके से अपराध को अंजाम दिया है, उनके लिए फांसी की सजा ही सही है। अदालत ने इस अपराध का समाज पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी गौर किया, खासकर पुणे में नाइट शिफ्ट में काम करने वाली महिला कर्मियों पर।

पुणे को सूचना प्रौद्योगिकी का हब माना जाता है। अदालत ने कहा कि महिलाओं के साथ बढ़ती घटनाओं को देखते हुए यह जरूरी है कि सजा ऐसी दी जानी चाहिए कि भविष्य में कोई व्यक्ति इस तरह के अपराध को अंजाम देने की सोचे तक नहीं।

पीठ ने कहा कि कई बार ऐसा देखा जाता है कि दोषियों को उनके द्वारा किए गए अपराध के अनुपात में सजा नहीं दी जाती, ऐसे में न्याय असफल हो जाता है। सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

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